नज़रिया- पाकिस्तानी फ़ौज के इस्लामीकरण का किसे फ़ायदा हुआ?

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(सेना के कथित राजनीतिकरण पर बीबीसी हिंदी की विशेष सिरीज़ में आज पढ़िए पाकिस्तान में फ़ौज को विचारधारा के रंग में रंगने के क्या नतीजे निकले)

पाकिस्तान में समाज के पहले फ़ौज का इस्लामीकरण हुआ लेकिन भारत में ये प्रक्रिया दूसरी तरफ़ से शुरू हुई है. वहां पहले समाज को हिंदुत्व में रंगा जा रहा है और सेना पर इसका असर बाद में दिख रहा है.

आज़ादी के बाद पाकिस्तान में बहुत ही जल्द फ़ौज को एक ख़ास तरह की संस्था बना दिया गया और ये संकेत दिया गया कि मुल्क के सिद्धांतों के रखवाले फ़ौज वाले ही हैं.

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लेकिन ये बातें बाहर-बाहर सियासी तौर पर होती रहती थीं. लेकिन फ़ौज के अंदर जो रिवाज़ था, उठना-बैठना था, वो खुली सोच वाला था.

जब ज़िया-उल-हक़ सत्ता में आए तो विचारों में मज़हब का ज़ोर बढ़ गया. ऐसे में फ़ौज की जो रिवायतें थीं, सेना में लोगों का जैसा उठना-बैठना था, सोचना था, सब पर मज़हब भारी पड़ने लगा.

यहां तक कि भर्तियां भी सारी मज़हबी आधार पर होने लगीं.

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अमरीका के अफ़ग़ानिस्तान में जिहाद के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू करने के बाद उनके लिए लाज़िमी हो गया कि पाकिस्तानी फ़ौज की सोच बदली जाए.

ये सोच बदलनी इसलिए ज़रूरी थी ताकि वो इस 'प्रॉक्सी वॉर' को पूरी तरह से समर्थन दे सके.

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पाक फ़ौज के साथ जो हुआ वो किसकी ज़रूरत थी?

वो मुल्क की ज़रूरत थी या नहीं थी, इस पर विचार नहीं किया गया.

पाकिस्तान में तो लोकतंत्र रहा ही नहीं पर मुझे इस बात का अफ़सोस होता है कि हिंदुस्तान अपनी धर्मनिरपेक्षता को सँभाल नहीं पाया.

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पाकिस्तान में रहते हुए मैंने भारतीय लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता का खुल कर समर्थन किया. मैं उसे अपनी विरासत का हिस्सा मानती रही.

लेकिन हिंदुस्तान में लोग जम्हूरियत संभाल नहीं पाए. इन जगहों पर धर्मनिरपेक्षता की जड़ों को गहरा नहीं किया गया.

आहिस्ता-आहिस्ता हिंदुत्व, अगर भारतीय समाज से लेकर भारतीय सेना में भी चला जाए वो बहुत तकलीफ़देह साबित होगा क्योंकि भारत में कई ऐसे प्रांत हैं जहाँ मुसलमान बड़ी तादाद में हैं जैसे कि कश्मीर.

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क्या लोगों की यही सोच है?

फ़र्क़ ये है कि पाकिस्तान में ये संकीर्ण सोच पहले फ़ौज में और फिर सरकारों और समाज में आई.

जबकि हिंदुस्तान में ये इसका उल्टा होता नज़र आ रहा है.

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भारत में पहले ये सोच समाज में फिर सरकार में और अब फ़ौज में आ रही है.

लेकिन पाकिस्तान में सियासी तौर पर शिद्दत पसंद (कट्टरपंथी) या तंग नज़रिए वाली मज़हबी और सियासी जमातें हमेशा कम वोट पाती रही हैं.

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पाकिस्तान में लोग मज़हबी होते हैं या अपने ईमान की हिफ़ाज़त करते हैं लेकिन सियासत में अगर लोगों को मौका मिले तो धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टियों को पसंद करते हैं.

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल(एन) ज़रूर दक्षिणपंथी रुझान की पार्टी रही है लेकिन अब चुनावों का तकाज़ा है, तो वो भी मध्यमार्गीय पार्टी होने की तरफ़ बढ़ी है.

पाकिस्तान में 80 फ़ीसदी लोग यही कहेंगे कि पाकिस्तानी फ़ौज के इस्लामीकरण का कोई फ़ायदा नहीं हुआ है.

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मज़हब के नाम पर पाकिस्तान में लोगों को उकसाया गया, आतंकवाद फैलाया गया, मज़हब के नाम पर विदेश नीति की धज्जियां उड़ीं.

इसी के आधार पर देश के दुश्मन और दोस्त बनने लगे.

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Image caption इस्लामाबाद से ग़ायब हुए पाकिस्तानी ब्लॉगर सलमान हैदर क़रीब बीस दिनों इस साल जनवरी में वापस अपने घर लौटे,

मज़हब के नाम पर एक ऐसा सैनिक तानाशाह लोगों पर थोपा गया जिसका मज़हब से कोई ताल्लुक नहीं था.

उस तानाशाह ने मज़हब के नाम पर बहुत सारे पैसे बनाए. मज़हब के नाम पर लोगों को खूब दबाया.

पाकिस्तान में बोलने की आज़ादी?

पाकिस्तान में बोलने की आज़ादी ज़रूर है लेकिन ये इस पर निर्भर करता है कि कब और कौन बोला.

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पाकिस्तान में फ़ौज के खिलाफ़ बोलने वाले लोगों को कई बार उठा लिया गया और अब भी फ़ौज की निंदा करने वाले कई लोग उठवाए जा रहे हैं.

मगर एक बात मैं दावे से कह सकती हूं कि पाकिस्तानी समाज ने बहुत चोटें खाईं हैं और पाकिस्तानी समाज ने बड़ी जद्दोजहद की है.

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इतनी परेशानियां झेलने के बावजूद पाकिस्तान में लोग बेधड़क बोलते रहे. पाकिस्तान में लोग मज़हब का दुरुपयोग करने के खिलाफ़ प्रदर्शन करते हैं, अपनी बात रखते हैं.

जब-जब पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगा लोग उसके खिलाफ़ कई बार सड़कों पर उतरे. कई लोग आपको मिलेंगे जो सियासी क़ैदी रहे हैं.

जब विरोध प्रदर्शन होते हैं तो उसमें अगुवा नेता ही नहीं उनके पीछे बहुत बड़ी संख्या में आम लोग होते हैं.

इसका नतीजा है कि फ़ौज आम लोगों पर हाथ डालने से पहले सोचेगी, उसे अपने ही लोगों का डर है.

कई बार मैं हिंदुस्तान आती रही हूं और भारत के लोकतंत्र की बहुत बड़ी फ़ैन रही हूं. मैंने कभी ये बात छुपाई भी नहीं हैं.

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Image caption सांकेतिर तस्वीर

हिंदुस्तान में पहले भीड़ धर्म के नाम पर हिंसा करने निकलती थी तो सरकार उन्हें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर रोका करती थी लेकिन अब वो मामला नहीं रहा है.

अब धर्मनिरपेक्षता का नाम लेना यूं है जैसे कि आपने राष्ट्रीय एकता को ललकारा है.

भारत में जो राष्ट्रवाद हमेशा से था, उसे ऐसा मोड़ दिया गया है कि वो प्रगतिशील पार्टियों के लिए नहीं बल्कि एक ख़ास धर्म के लिए बन चुका है.

और ये एक चिंताजनक बात है.

(अस्मा जहांगीरकी बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित. ये उनके निजी विचार हैं.)

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