'हमारी सारी बचत तो सऊदी सरकार ही ले लेगी'

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Image caption तेल से होने वाली आय में भारी कटौती के बाद सऊदी सरकार कमाई के नए अवसर तलाश रही है.

"ये टैक्स जमा करना हमारे बस से बाहर होगा, मजबूरन मुझे अपने बीवी बच्चों को वापस हिंदुस्तान भेजना पड़ेगा."

ये कहना है दक्षिण पश्चिमी सऊदी के अबा शहर में कार मैकेनिक का काम करने वाले मुख़्तार अहमद का. वो सऊदी सरकार के प्रवासियों पर लगाए जाने वाले टैक्स के नए प्रस्ताव को लेकर चिंतित हैं.

1996 में भारत के इलाहाबाद से काम करने के लिए सऊदी गए मुख़्तार अहमद के पांच बच्चे हैं, जिन्हें अब वो भारत भेजने की तैयारी कर रहे हैं.

दरअसल, सऊदी सरकार ने दिसंबर 2016 में जारी बजट में प्रवासियों पर नया 'परिवार कर' लगाने का प्रस्ताव पेश किया था.

सऊदी सरकार ने प्रत्येक प्रवासी से परिवार के हर निर्भर सदस्य पर जुलाई 2017 से सौ रियाल प्रति महीना (1720 रुपए, प्रति महीना, प्रति सदस्य) कर प्रस्तावित किया गया है, जो हर साल बढ़ेगा.

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Image caption सऊदी अरब के राजकोषीय संतुलन कार्यक्रम के तहत संतुलित बजट 2020 के दस्तावेज़ में एक्सेपट लेवी का ज़िक्र का है.

टैक्स प्रस्तावों को लेकर असमंजस

सऊदी अरब की सरकारी वेबसाइट पर जारी बजट में इस टैक्स का प्रस्ताव है जिसके तहत जुलाई 2017 से 100 रियाल प्रति महीना, जुलाई 2018 से 200 रियाल प्रति महीना, जुलाई 2019 से 300 रियाल प्रति महीना और जुलाई 2020 से 400 रियाल प्रति निर्भर व्यक्ति प्रति महीना टैक्स लिया जाना प्रस्तावित है.

दस्तावेज के मुताबिक ये प्रस्ताव 1 जुलाई 2017 से लागू होने हैं. लेकिन सऊदी अरब में रह रहे भारतीय मूल के लोग अभी असमंजस में हैं कि उन्हें ये टैक्स कब से और कैसे देना है.

इस संवाददाता ने सऊदी अरब में रह रहे कई लोगों से बात की लेकिन उनमें से किसी ने भी अभी ये टैक्स जमा नहीं कराया था.

हालांकि समाचार माध्यमों से उन्हें इसके बारे में जानकारी मिली है और इस टैक्स को लेकर भारतीय समुदाय में चर्चा आम है.

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Image caption नए टैक्स को लेकर जारी किया गया ये नोटिस सऊदी अरब में रह रहे भारतीय व्हाट्सएप ग्रुपों में शेयर कर रहे हैं. ये नोटिस सऊदी में रह रहे प्रवासियों की वेबसाइट पर सबसे पहले साझा किया गया था. बीबीसी ने इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है.

सरकार को चली जाएगी बचत

अली ईमान सिद्दीकी पंद्रह साल पहले काम करने भारत से सऊदी अरब गए थे. वो फिलहाल जुबैल शहर में रहते हैं. उनके परिवार में तीन बच्चे और पत्नी हैं.

ईमान कहते हैं, "इस नए टैक्स का हम सब पर असर होगा. हमारी जो भी बचत थी वो अब सऊदी सरकार के पास चली जाएगी."

ईमान कहते हैं, "अभी तक जो जानकारी हमें मिली है उसके मुताबिक ये टैक्स हमें ख़ुद ही जमा करना है. कंपनियां हमारे लिए ये टैक्स जमा करने से मना कर रही हैं. ये हमारी जेब से जाएगा तो हमारी बचत ख़त्म हो जाएगी. हमारे लिए बच्चों को रखना मुश्किल हो जाएगा. पहले साल तो शायद हम बीवी-बच्चों को रख भी ले लेकिन जब ये चार सौ रियाल महीना तक हो जाएगा तो शायद हम ये टैक्स जमा न कर पाएं."

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Image caption अली ईमान सिद्दीक़ी, ज़ियाउद्दीन और अब्दुरब अंसारी नए टैक्स को लेकर चिंतित हैं.

हालांकि ईमान कहते हैं कि अभी इस बारे में विश्वसनीय जानकारी नहीं मिल पा रही है.

ईमान कहते हैं, "अभी यहां नौकरियां भी स्थिर नहीं हैं, ऐसे में अगर ये नया टैक्स लगा तो हम जैसे लोगों के लिए हालात बहुत मुश्किल हो जाएंगे."

ईमान के साथ मौजूद प्रवासी ज़ियाउद्दीन कहते हैं, "परिवारों को रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा, ज़्यादातर लोगों को अपने परिवारों को वापस भेजना होगा. यदि हालात इसी तरह रहे तो शायद लोगों का रहना भी मुश्किल हो जाए."

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प्रवासियों की उल्टी गिनती शुरू

ज़ियादउद्दीन कहते हैं, "मेरा मानना है कि शुरुआत में इससे सऊदी सरकार को फ़ायदा होगा लेकिन बाद में इसके असर नकारात्मक ही होंगे."

इलाहाबाद से सऊदी गए अब्दुरब अंसारी कहते हैं, "सरकार की नीयत साफ़ है, वो ज़्यादा प्रवासियों को अब रखना नहीं चाहती है. मेरा मानना है कि सऊदी से प्रवासियों के वापस जाने की उल्टी गिनती शुरू हो गई है. पहले वो अपने परिवार को भेजेंगे और फिर ख़ुद भी अपने देश लौटना चाहेंगे."

अच्छी तनख़्वाह पर किंग ख़ालिद यूनिवर्सिटी में एक लेक्चरर ने नाम न छापने की ग़ुज़ारिश करते हुए कहा, "मैंने अपना आवासीय परमिट रिन्यू कराया है, लेकिन मुझसे ये टैक्स नहीं वसूल किया गया है. ऐसे में अभी ये स्पष्ट नहीं है कि हमें ये टैक्स कब से देना है"

वो कहते हैं, "आम प्रवासी इसे लेकर परेशान है, हालांकि ज़्यादातर लोग पहले एक साल इस टैक्स को अदा करके देखना चाहते हैं लेकिन उसके बाद इसे जमा करना मुश्किल हो जाएगा. जो लोग पांच-छह हज़ार रियाल महीना कमा रहे हैं वो ये मान कर चल रहे हैं कि अब उन्हें वापस अपने वतन लौटना होगा."

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Image caption अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमते गिरने से सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है जिसकी भरपाई सरकार टैक्स लगाकर करना चाहती है.

सऊदी अरब में भारतीय दूतावास के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि अभी इस बारे में दूतावास की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है. सऊदी अरब में तीस लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं.

हालांकि बहुत से लोगों का ये भी कहना है कि इस टैक्स के बावजूद वो सऊदी में ही रहेंगे क्योंकि भारत लौटने पर उनके पास रोजगार के बहुत अवसर नहीं होंगे.

एक साल से सऊदी अरब में अकेले रह रहे अब्दुल मोइन ने कहा, "यहां के मुक़ाबले भारत में रोजगार कम है, ऐसे में नए टैक्स के बावजूद लोग सऊदी में जब तक रह सकते हैं, रहेंगे."

कारोबारी भी असहज

अभी ये टैक्स प्रस्ताव लागू नहीं हुए हैं लेकिन इनका असर भारतीय समुदाय पर दिखने लगा है.

एक भारतीय ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "भारतीय अभिभावक स्कूलों से अपने बच्चों के नाम कटवा रहे हैं. सिर्फ़ नौकरी पेशा ही नहीं बल्कि अपने कारोबार में लगे लोग भी नए टैक्स प्रावधानों को लेकर सहज नहीं हैं."

वो कहते हैं, "यहां हालात मुश्किल हो रहे हैं. मैं ऐसे कई नौजवानों को जानता हूं जिन्हें महीनों से तन्ख़्वाह नहीं मिली है."

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम होने के कारण सऊदी की अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान हुआ है और सरकार अब टैक्स लगाकर आमदनी के नए ज़रिए तलाश रही है.

सऊदी में स्थनीय नागरिकों या प्रवासियों से किसी भी तरह का आयकर नहीं लिया जाता है.

जुलाई का इंतज़ार

रिज़वानउद्दीन ने हाल ही में अपने परिवार का आवासीय परमिट रिन्यू कराया है लेकिन उनसे नया टैक्स भरने के लिए नहीं कहा गया. वो कहते हैं कि अभी इस नए टैक्स को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है बेहतर है जुलाई तक का इंतज़ार किया जाए.

बजट प्रस्ताव के बाद से सऊदी सरकार ने इस बारे में कोई आदेश जारी नहीं किया है. ऐसे में बहुत से प्रवासियों को ये उम्मीद भी है कि हो सकता है सरकार इसे माफ़ कर दे या कुछ क्षेत्रों को राहत दे दे.

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