सऊदी अरब से एक झटके में 400 अरब का फ़ायदा और भारत से?

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जबसे डोनल्ड ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं, भारत के प्रधानमंत्री मोदी की यह पहली अमरीका यात्रा है.

उनके इस दौरे में ये बात स्पष्ट की गई है कि ट्रंप प्रशासन भारत को अभी भी उसी नज़र से देखता है जैसा अमरीका का रुख ओबामा प्रशासन के समय था.

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ओबामा के कार्यकाल में अमरीका भारत को एक 'इंटेलिजेंस सोर्स' के रूप में देखता था. उसे लगता था कि भारत उसका रक्षा सहयोगी भी बन सकता है.

इसके अलावा दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि पिछले दो दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था में काफ़ी सुधार आया है और अब भारत के बाज़ार को देख कर अमरीका को लालच आ रहा है. पहले ऐसा नहीं था.

लेकिन क्या अमरीका और भारत के बीच ताल्लुक़ात पिछले साल की तरह ही बेहतर हैं, ये बात मुकम्मल तौर पर नहीं कहा जा सकता है.

क्योंकि दोनों देशों के बीच कुछ नए मुद्दे पैदा हो गए हैं, जिनपर बात करना बहुत ज़रूरी हो गया है.

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पाकिस्तान के साथ अमरीका की मजबूरी

जहां तक पाकिस्तान के साथ रिश्तों की बात है तो अमरीका ये जानता है कि भारत के इस पड़ोसी मुल्क के साथ उसे संबंध बनाए रखना ज़रूरी है.

इसलिए भी कि ये सुरक्षा का मामला है और अगर पाकिस्तान के साथ अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों का तालमेल नहीं रहता है तो अमरीका के लिए काफ़ी मुश्किलें आ सकती हैं.

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ख़ास तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की मौजूदगी के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि वो पाकिस्तान के साथ अपने ताल्लुक़ात बेहतर रखे.

अगर ये रणनीतिक मज़बूरी न होती तो हो सकता है कि पाकिस्तान के साथ अमरीका के संबंध काफ़ी ख़राब हो जाते, क्योंकि पाकिस्तान ऐसा मुल्क है जहां बाकी दुनिया के मुक़ाबले अमरीका विरोध की भावना सबसे ज़्यादा है.

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ट्रंप का धर्मसंकट

भारत का मामला थोड़ा अलग है. अमरीका भारत के साथ संबंध रखना चाहता है लेकिन भारत की तरफ़ से कुछ बाधाएं हैं.

एक तो भारत खुद को सुपर पॉवर और एक प्राचीन सभ्यता समझता है. जबकि अमरीका उसे ऐसा नहीं देखता, उसकी नज़र में भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था और एक लोकतंत्र है.

दूसरी ओर भारत उन देशों से बेहतर संबंध बनाए रखना चाहता है जिनकी अमरीका के साथ प्रतिद्वंद्विता है जैसे, ईरान, रूस और चीन.

तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत के साथ अमरीका का व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है, जो कि हर महीने लगभग 40 अरब डॉलर के आस-पास तक हो गया है.

डोनल्ड ट्रंप प्रशासन के सामने ये एक बड़ी समस्या पेश आ रही है.

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व्यापार नहीं तो कुछ नहीं

चूंकि भारत और अमरीका के बीच मजबूत संबंध का मुख्य पहलू व्यापार है और अगर भारत के साथ अमरीका को व्यापारिक फायदा नहीं हुआ तो ट्रंप का रुझान भारत से हट भी सकता है.

मसलन अगर भारत की ओर से अमरीकी लड़ाकू विमान नहीं ख़रीदे गए, अमरीका को निवेश न मिले और एच1बी वीज़ा का मामला सही तरीक़े से नहीं सुलझा तो ट्रंप चीन, रूस और मध्यपूर्व की ओर अधिक ध्यान देना शुरू करें देंगे.

अभी सऊदी अरब के एक ही ट्रंप दौरे में अमरीका को 400 अरब डॉलर का फायदा हो गया, जबकि मोदी के साथ एक मुलाक़ात से अमरीका को क्या फ़ायदा हुआ, सिर्फ दो अरब डॉलर के ड्रोन बिके.

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(बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित.)

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