चीन के विस्तार के सामने कितना बेबस है भारत?

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इस साल की शुरुआत में एक चमकीली लाल रंग की मालगाड़ी ने दक्षिणी शंघाई के यिवू शहर से अपने सफ़र की शुरुआत की थी.

44 डिब्बों वाली ये मालगाड़ी सूटकेस, कपड़ों और दूसरे घरेलू सामानों से भरी हुई थी. ये मालगाड़ी एक ऐतिहासिक सफ़र पर रवाना हुई थी.

पूरे चीन से गुज़रते हुए, जब 18 दिनों बाद ये मालगाड़ी अपनी मंज़िल यानी ब्रिटेन पहुंची, तो इसका शानदार स्वागत हुआ. ट्रेन के स्वागत के लिए स्टेशन को ख़ास तरह से सजाया गया था. ये चीन से ब्रिटेन की पहली सीधी मालगाड़ी सेवा थी.

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सिर्फ़ 18 दिनों में हज़ारों किलोमीटर का सफ़र तय करके इस रेलगाड़ी ने कारोबार की दुनिया में एक नई इबारत लिख दी थी.

'वन बेल्ट, वन रोड'

ये ट्रेन, चीन की उस बेहद चर्चित, विवादित और महत्वाकांक्षी योजना का हिस्सा है, जिसे हम बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव या 'वन बेल्ट, वन रोड' (OBOR) के नाम से जानते हैं.

चीन इस विशाल परियोजना को ऐतिहासिक 'सिल्क रूट' का आधुनिक अवतार बताता है.

सिल्क रूट मध्य युग में वो रास्ता था, जो चीन को यूरोप और एशिया के बाक़ी देशों से जोड़ता था. इसके ज़रिए तमाम देशों का कारोबार होता था.

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आज की तारीख़ में चीन उसी तर्ज पर पूरी दुनिया में सड़कों, रेलवे लाइनों और समुद्री रास्तों का जाल बुनना चाहता है, जिसके ज़रिए वो पूरी दुनिया से आसानी से कारोबार कर सके.

भारत इसका विरोधी

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस योजना से पूरी दुनिया की तरक़्क़ी की बात करते हैं. मगर, कई जानकार कहते हैं कि इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से चीन, सुपरपावर बनने का अपना ख़्वाब पूरा करना चाहता है.

भारत भी इसका विरोध कर रहा है.

अगर चीन अपनी योजना के तहत, रेल-रोड का जाल बिछाने में कामयाब हुआ, तो इससे उसके लिए बाक़ी दुनिया से कारोबार करना काफ़ी आसान हो जाएगा.

वहीं भारत समेत कई देशों के जानकार, इसे चीन की गहरी साज़िश बताते हैं.

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वो कहते हैं कि आधुनिक सिल्क रूट की आड़ में असल में चीन अपनी महत्वाकांक्षाओं का विस्तार कर रहा है. वो पश्चिमी देशों की तर्ज पर आधुनिक युग में तमाम देशों को अपना आर्थिक गुलाम बनाना चाहता है.

आख़िर क्या है ये वन बेल्ट, वन रोड योजना? क्या था पुराना सिल्क रूट, जिसकी आज बहुत चर्चा होती है? और क्या हैं, चीन के इरादे?

इन सवालों का जवाब तलाशने की हमने कोशिश की. हमने बीबीसी की रेडियो सिरीज़ 'द इन्क्वायरी' में इस बाबत, कई विशेषज्ञों से बात की और सिल्क रूट के मिथक को समझने से लेकर चीन की नई योजना के बारे में जानकारी हासिल की.

सिल्क रूट से जुड़ा पहला ख़्याल

हमने सबसे पहले अमरीका की ब्रॉउन यूनिवर्सिटी की तमारा चिन से बात की.

चिन ने 'द इन्वेंशन ऑफ द सिल्क रोड' (The Invention of the Silk Road) नाम की क़िताब लिखी है.

तमारा कहती हैं सिल्क रोड का नाम सुनते ही हमारे ज़हन में तसव्वुर आता है मध्य युग के कारोबारियों का. हम सोचते हैं कि उस दौर के ये कारोबारी अरब देशों और यूरोप के सौदागरों को चीन का रेशम और भारतीय मसाले बेचने का कारोबार करते थे.

हालांकि चीन और भारत के लोग सिल्क रोड को बुद्ध धर्म की तीर्थ यात्रा का रास्ता मानते रहे हैं.

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कोई बंदर के साथ चलने वाले एक भिक्षु की तस्वीर ज़हन में बनाता है, तो कोई कारोबारियों की. वहीं यूरोप के लोग ऐसे साहसी लोगों के सफ़र के क़िस्से सुनते आए हैं, जो तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए, यूरोप से चीन और जापान तक गए.

सिल्क रूट से जुड़ी दास्तानें

लेकिन तमारा चिन कहती हैं कि ऐसा कुछ था ही नहीं. सिल्क रूट कोई सीधी सड़क नहीं थी जो चीन को बाक़ी दुनिया से जोड़ती थी. ये तो अलग-अलग देशो से गुज़रने वाला रास्ता था. जिससे होकर मध्य युग में कारोबार हुआ करता था.

तमारा के मुताबिक़, छोटे-छोटे रास्ते थे. ये पहाड़ो, रेगिस्तानों और नदियों के किनारे होते हुए गुज़रते थे. हमेशा इस सफ़र की शुरुआत चीन से ही हो, ऐसा भी नहीं था.

हां, इस रास्ते से रेशम का कारोबार ज़रूर होता था.

तमारा बताती हैं कि चीन के रेशम के ईसा की पहली सदी में सीरिया का पलमायरा तक पहुंचने के सबूत मिलते हैं. हालांकि इस रूट से इतना कारोबार नहीं होता था, जितना हम आज सोचते हैं.

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तमारा के मुताबिक़ ये सिलसिला दो हज़ार साल पहले शुरू हुआ था. मगर, 1500वीं सदी आते-आते सिल्क रूट से आवाजाही और कारोबार बेहद कम हो गया. क्योंकि पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के लिए समुद्र के आसान रास्ते का पता चल चुका था.

चीन से यूरोप तक कोयले ढोने का रास्ता भी

आज के दौर में सिल्क रूट के मिथक को गढ़ने का बहुत बड़ा श्रेय जर्मनी के भूगोलविद् फर्डिनेंड वॉन रिक्थोफ़ेन को जाता है.

वो 1877 में चीन के सफ़र पर गए थे. उनका मक़सद था, चीन में कोयले के भंडारों का पता लगाना, जिसे ढोकर यूरोप के इस्तेमाल के लिए लाया जा सके.

फर्डिनेंड ने ही चीन से लौटकर सिल्क रूट के मिथक को बल दिया. वो चाहते थे कि चीन से यूरोप तक एक रेलवे लाइन बिछाई जाए, जिसके ज़रिए कोयला और दूसरे सामान यूरोप तक ढोए जा सकें.

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तमारा कहती हैं कि फर्डिनेंड के विचारों को किसी ने उस वक़्त बहुत गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन 1920 के दशक में स्वेन हेडिन नाम के फर्डिनेंड के एक शागिर्द ने सिल्क रूट के विचार को आगे बढ़ाया.

स्वेन ने जर्मनी और चीन की सरकारों के साथ मिलकर एक हवाई कंपनी के सहयोग से चीन से यूरोप तक के हवाई रास्ते को नक़्शे में उतारा.

स्वेन की 'द सिल्क रोड'

फिर स्वेन ने चीन से यूरोप को जोड़ने वाला सड़क का भी एक रास्ता खोज निकाला. इसे स्वेन ने द सिल्क रोड का नाम दिया.

तमारा चिन बताती हैं कि स्वेन ने अपने इस आइडिया का ख़ूब प्रचार किया. कई देशों में अख़बारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी.

तमारा के मुताबिक़ सिल्क रोड कोई ऐतिहासिक क़िस्सा नहीं, आज के दौर का ही मिथक है. इसे बड़े करीने से गढ़ा गया है.

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आज चीन इसे ब्रांड बनाकर बाक़ी दुनिया को बेच रहा है.

लेकिन शुरुआत में चीन के जानकारों ने भी इसे बहुत ज़्यादा भाव नहीं दिया था. यहां तक कि स्वेन हेडिन के आइडिया का भी चीन के मीडिया में उस वक़्त बहुत ज़िक्र नहीं मिलता. असल में सिल्क रूट हमेशा से यूरोपीय मिथक रहा.

खुले व्यापार के मोर्चे पर चीन

लेकिन, 1950 के दशक से चीन ने भी सिल्क रूट को अपने शानदार इतिहास का हिस्सा बताना शुरू कर दिया.

सिल्क रोड की कल्पना के ज़रिए चीन असल में खुले व्यापार के मोर्चे पर पश्चिमी ताक़तों को चुनौती देना चाहता है. इसीलिए 1950-60 के दशक में चीन ने अपने पड़ोसी देशों, पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान से लेकर, दूर स्थित सीरिया तक से कारोबार को नए सिरे से शुरू किया.

इसी अतीत के सहारे आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी महत्वाकांक्षी वन बेल्ट, वन रोड परियोजना को अंजाम तक पहुंचाने में जुट गए हैं.

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Image caption चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

आज की तारीख़ में सिल्क रोड, चीन का एक कारोबारी ब्रांड भर नहीं. आज सिल्क रोड चीन की विदेश नीति का केंद्र बन गया है.

ऑस्ट्रेलिया की जेन गॉली ने चीन की अर्थव्यवस्था, इसकी तरक़्क़ी की गहराई से पढ़ाई की है. जेन गॉली ऑस्ट्रेलिया की नेशनल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

जेन कहती हैं कि चीन, अपने पैसे से तमाम देशों में सड़कों और रेलवे लाइनों जैसे बुनियादी ढांचे का जाल बिछा रहा है. इसके ज़रिए वो यूरेशिया को दुनिया के कारोबार का केंद्र बनाने का इरादा रखता है. ताकि, यूरोप और अमरीका के बीच होने वाले कारोबार के बरक्स एक नया कारोबारी केंद्र खड़ा किया जा सके.

60 देश चीन के साथ

अब तक 60 देशों ने इस योजना में शामिल होने के लिए दस्तख़त किया है.

इन देशों में दुनिया की 60 फ़ीसद आबादी रहती है. इन देशों को उम्मीद है कि चीन की इस योजना से उन्हें नई सड़कें, रेलवे लाइनें, बंदरगाह, गैस पाइपलाइन और दूसरी सुविधाएं मिलेंगी.

मगर इसके लिए इतना पैसा कहां से आएगा?

जेन गॉली कहती हैं कि इस योजना में पूरा पैसा चीन ही लगा रहा है. वो मदद, निवेश और क़र्ज़ के नाम पर इस योजना का विकास करेगा. चीन की सरकार दुनिया की सबसे अमीर सरकार है. कहते हैं कि चीन की सरकार के पास 960 अरब डॉलर का ख़ज़ाना है.

पर, सवाल ये है कि चीन आख़िर दूसरे देशों में इतना निवेश क्यों कर रहा है?

इस सवाल के जवाब में जेन गॉली कहती हैं कि चीन को इससे बहुत फ़ायदा होगा. चीन को दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है. यहां इतने सामान का उत्पादन होता है, जिसे खपाने के लिए बड़ा बाज़ार चाहिए.

इन रास्तों से चीन को एक नया बाज़ार मिलेगा.

फिर इस योजना के विकास के लिए चीन के इंजीनियरों, स्टील और दूसरे संसाधनों का भी इस्तेमाल होगा. यानी ये योजना तो चीन की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान बन जाएगी.

जैसे चीन के सुदूर पश्चिम में स्थित काशगर शहर एक वीरान, अलसाया हुआ शहर हुआ करता था. मगर जैसे ही ऐलान हुआ कि काशगर चीन के सिल्क रूट का शुरुआती प्वाइंट होगा, काशगर का नक़्शा रातों-रात बदल गया.

मगर, चीन की वन बेल्ट-वन रोड योजना में सब-कुछ अच्छा ही हो ये ज़रूरी नहीं. चीन जिन देशों से होकर इन रास्तों का विकास कर रहा है, उनमें से कई बेहद भ्रष्ट देश हैं. इन देशों में चीन की विकास की योजना तबाह भी हो सकती है.

लेकिन अभी इन चिंताओं को दरकिनार करके चीन सिल्क रूट को अमली जामा पहनाने की दिशा में बढ़ रहा है.

चीन का इरादा अपनी करेंसी को अमरीका के डॉलर के बराबर ताक़तवर बनाने का है.

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टॉम मिलर ने चाइनाज़ एशियन ड्रीम्ज़ नाम की क़िताब लिखी है. उन्होंने पूरे एशिया में घूम-घूमकर चीन के सिल्क रूट योजना के बारे में लोगों से बात की है.

भारी कीमत वसूलेगा चीन

टॉम कहते हैं कि चीन की सेनाओं के किसी और देश पर क़ब्ज़ा करने का डर तो बेमानी है. मगर, चीन आर्थिक मदद के नाम पर इन देशों को अपना गुलाम बनाने की कोशिश ज़रूर कर रहा है.

टॉम, छोटे से पूर्वी एशियाई देश लाओस की मिसाल देते हैं. लाओस की कुल अर्थव्यवस्था दस अरब डॉलर की है. वहीं, चीन 7 अरब डॉलर की मदद से लाओस में रेलवे का नेटवर्क बिछा रहा है. अब लाओस इसके बदले में अपने क़ुदरती संसाधन चीन को देगा. जो रेलवे लाइन चीन आज बिछा रहा है, उसी के ज़रिए लाओस से कच्चा माल, चीन को निर्यात करेगा.

यानी, आज OBOR से कई देशों को फौरी फ़ायदा तो मिल जाएगा. मगर आगे चलकर उन्हें चीन को इसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी.

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जैसे पाकिस्तान में ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विकास किया जा रहा है. इसके बदले में चीन भी पाकिस्तान से तमाम तरह की चीज़ें हासिल करेगा.

चीन, अपनी योजना के तहत तमाम देशों के साथ ऐसे ही सौदे कर रहा है.

चीन के छिपे मकसद

वैसे कई देश ऐसे भी हैं, जो चीन की इस योजना का विरोध भी कर रहे हैं. भारत इनमें से एक है.

भारत का कहना है कि चीन बुनियादी ढांचे के विकास की आड़ में साम्राज्यवादी नीतियां अपना रहा है. वो दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहा है.

भारत को लगता है कि श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में बंदरगाहों का विकास करके असल में चीन उसकी घेरेबंदी कर रहा है. इनकी आड़ में चीन अपने सैनिक अड्डे स्थापित कर रहा है.

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टॉम मिलर के मुताबिक़, वन बेल्ट-वन रोड योजना सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि सियासी और सामरिक योजना भी है. इससे कई देशों में चीन की सीधी पहुंच हो जाएगी. चीन ख़ुद को दुनिया का केंद्र बनाने में जुटा हुआ है.

रोलैंड के मुताबिक़ सिल्क रूट योजना असल में एक खिड़की है, जिसके ज़रिए हम चीन के दिल में झांक सकते हैं. हम ये देख सकते हैं कि चीन के अंदर सुपर पावर बनने की कितनी बेताबी है.

आज चीन नहीं चाहता कि उसे कोई चुनौती दे. कोई उसकी राह में रोड़ा बने. वो आज दुनिया की राजनीति का रुख़ बदलना चाहता है.

असल में अमरीका की खाली की गई जगह को चीन ही भरने की कोशिश कर रहा है.

चीन का टारगेट 2049

इसीलिए चीन आज खुले व्यापार की वक़ालत करता है. हर मंच से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, बेरोक-टोक कारोबार की बात उठाते हैं.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस प्रोजेक्ट को अपना राजनैतिक मिशन बना लिया है. उन्होंने इसे पूरा करने के लिए 2049 तक का लक्ष्य रखा है.

हालांकि सिल्क रूट योजना की कामयाबी, चीन के अलावा दूसरे देशों पर भी निर्भर है. वो कितना सहयोग करते हैं.

मगर ये तय है कि इस योजना पर जैसे-जैसे चीन आगे बढ़ेगा, दो विचारधाराओं का टकराव होगा. एक तरफ़ भारत जैसी लोकतांत्रिक ताक़तें होंगी. तो दूसरी तरफ़ चीन जैसी तानाशाही सरकारें.

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