हमसे पूछिए: 'मुश्किल वक्त में आगे भी साथ होगा इसराइल'

नरेंद्र मोदी, इसराइल इमेज कॉपीरइट ABIR SULTAN/AFP/Getty Images

'हमसे पूछिए' के तहत बीबीसी हिंदी ने अपने पाठकों से पूछा था कि भारत-इसराइल संबंधों के किस पहलू पर वो अधिक जानना चाहते हैं?

कई पाठकों ने भारत और चीन के संबंधों में इसराइल की भूमिका से जुड़े सवाल पूछे.

इसे लेकर बीबीसी ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष वी पंत से बात की और पाठकों के सवाल को उनके सामने रखा.

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चार सवाल

1. भारत और इसराइल के रक्षा संबंध काफ़ी मजबूत हैं. चीन और इसराइल के रक्षा संबंध कैसे हैं? उनके बीच किस तरह के समझौते हुए हैं?

चीन और इसराइल के भी काफ़ी हद तक उसी तरह के रक्षा संबंध हैं जिस तरह के भारत और इसराइल के बीच में हैं. इसराइल रक्षा क्षेत्र में कटिंग एज टेक्नोलॉजी का लीडर है.

पश्चिमी देशों ने उच्च तकनीक के लिए काफ़ी समय तक चीन का बहिष्कार किया हुआ था. इसराइल चीन के लिए उच्च तकनीक हासिल करने का एक स्रोत था.

इसराइल के अमरीका के साथ बहुत क़रीबी संबंध हैं. चीन को कौन-सी रक्षा तकनीक दी जाए इसे लेकर अमरीका का हमेशा वीटो रहता है.

कई बार इसे लेकर मतभेद भी रहा है कि व्यावसायिक कारणों के तहत इसराइल किस तरह की रक्षा तकनीक चीन को देना चाहता है और रणनीतिक कारणों से अमरीका ने इसका विरोध किया है.

भारत और इसराइल के जो संबंध हैं, उनको अमरीका की मंज़ूरी हासिल है. इसलिए भविष्य में उनके ज़्यादा प्रगाढ़ होने की संभावना है.

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2- भारत और इसराइल के संबंधों में गर्मजोशी नज़र आती है. चीन और इसराइल के रिश्ते कैसे हैं? चीन की इसराइल में कितनी दिलचस्पी है?

चीन की दिलचस्पी काफी हद तक रक्षा तकनीक से जुड़ी रही है. उसे काफी सालों तक इसकी ज़रूरत थी और इसराइल एकमात्र स्रोत था जहां से उसे ये हासिल हो सकती थी.

अब जो देखने में आ रहा है कि चीन की जो मध्य पूर्व नीति है, उसके तहत चीन उस क्षेत्र के सभी देशों से अपने संबंध घनिष्ठ बनाना चाहता है.

चाहे वो सऊदी अरब हो, ईरान हो या फिर इसराइल हो. ये जो तीन स्तंभ हैं जो भारतीय विदेश नीति के भी तीन कोण हैं, वो मध्य पूर्व में चीन की विदेश नीति के भी महत्वपूर्ण स्तंभ हैं.

चीन और इसराइल के संबंधों में जो एक घनिष्ठता आई है, उसका बड़ा कारण ये था कि बराक ओबामा के अमरीका का राष्ट्रपति रहने के दौरान उनके और इसराइल के राजनीतिक नेतृत्व के बीच दरार थी.

चीन ने उसका फ़ायदा उठाया और अपने संबंध इसराइल के साथ मज़बूत किए.

अब डोनल्ड ट्रंप आ गए हैं और उन्होंने दोबारा इसराइल को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है तो मुझे लगता है कि अभी जो घनिष्ठता हमने पिछले कुछ सालों में देखी, उसके कम होने की संभावना है.

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3- भारत और चीन के परस्पर हित जब टकराते हैं तो तनाव की स्थिति बन जाती है. ऐसी स्थिति के बीच आप इसराइल की क्या भूमिका देखते हैं?

अगर हम ये कहें कि इसराइल को भारत और चीन में से किसी एक का चुनाव करना चाहिए तो हम इसराइल के साथ थोड़ी ज़्यादती करेंगे.

ये सवाल इसराइल भी हमसे कर सकता है कि कल को इसराइल और ईरान के बीच कोई समस्या आएगी तो भारत किसको चुनेगा? या कल इसराइल और सऊदी अरब के बीच समस्या आएगी तो भारत किसके पक्ष में जाएगा?

मेरे ख़्याल से जहां तक भारत और इसराइल के संबंध हैं और उनमें जो घनिष्ठता आ रही है उसका एक कारण ये है कि दोनों देश ये उम्मीद नहीं कर रहे हैं कि उन्हें किसी एक का चुनाव करना पड़े.

मुझे लगता है कि अगर हम इसराइल से ये सवाल करेंगे तो हम एक तरह से कठघरे में खड़ा करके उससे पूछ रहे होंगे कि बताइए आप इसके साथ होंगे या उसके साथ होंगे? यू आर विद अस और अगेंस्ट अस (आप हमारे साथ हैं या खिलाफ हैं)

मुझे लगता है कि भारत और इसराइल के संबंधों में अमरीका की अहम भूमिका है. भारत और इसराइल का संबंध दो लोकतांत्रिक और उदार समाजों के बीच का स्वाभाविक रिश्ता है.

चीन से जो इसराइल का रिश्ता है वो सरकारी स्तर पर हो सकता है, लेकिन उनके बीच समाज के स्तर पर और सांस्कृतिक संबंध नहीं हैं. भारत को इस विषय में कोई असुरक्षा नहीं होनी चाहिए. अगर हम राजनीति और रणनीतिक रिश्तों को देख रहे हैं तो भारत काफ़ी आगे है.

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4- व्यावसायिक हितों और पारस्परिक संबंधों के लिहाज़ से भारत और चीन में से इसराइल किस देश के ज़्यादाक़रीब नज़र आता है?

इसराइल तो भारत के काफ़ी नज़दीक है. भारत और इसराइल के रिश्तों में काफ़ी सारे फ़ैक्टर हैं जो चीन के साथ उसके रिश्तों में नहीं हैं.

इसराइल के काफ़ी युवा मिलिट्री सर्विस के बाद भारत आते हैं. वो भारत की आध्यात्मिकता और धार्मिक विचारों से काफ़ी प्रभावित हैं.

भारत और इसराइल का समाज काफ़ी हद तक पारंपरिक है जो तकनीक की तरफ़ अग्रसर हैं.

अगर आप राजनीतिक तौर पर देखें, रणनीतिक तौर पर देखें और सांस्कृतिक तौर पर देखें तो बहुत सारी समानताएं भारत और इसराइल को जोड़ती हैं.

जब भी कठिन समय आया है इसराइल ने हमेशा भारत की मदद की है.

भारत को इस विषय पर कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि अगर आने वाले समय में कभी उसे कोई ज़रूरत पड़ी तो चाहे वो चीन के ख़िलाफ़ क्यों न हो, इसराइल आगे भी मदद करता रहेगा.

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