सीमा विवाद: '1962 के मुक़ाबले भारत से बहुत ताक़तवर है चीन'

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Image caption हाल के दशकों में चीन की सेना बहुत ताक़तवर हो गई है.

सीमा विवाद के कारण भारत और चीन के बीच करीब 4 हफ़्तों से तनाव की स्थिति बनी हुई है. सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच एक युद्ध हो चुका है और कई मौकों पर सेनाएं आमने-सामने आ चुकी हैं.

बावजूद इसके दोनों देश इस समस्या का स्थायी हल ढूंढने में नाकाम हैं. ताज़ा विवाद के बाद चीन और भारत के बीच ज़ुबानी जंग भी जारी है. पहले चीन ने कहा कि भारत 1962 की हार को याद रखे तो भारत के रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि यह 2017 का भारत है, 1962 का नहीं. इस पर चीन ने कहा कि चीन भी 1962 वाला चीन नहीं है.

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1962 में भारत और चीन की सैन्य शक्ति के बीच ज़्यादा फ़र्क नहीं था. उनकी सैन्य क्षमता लगभग बराबर थी. भारत को आजाद हुए 15 साल हुए थे और चीन की स्थापना भी 1949 में ही हुई.

भारत के पास ब्रिटिश उपकरण और हथियार थे और चीन के पास रूसी. इस मामले में दोनों देशों की सैन्य ताकत में ज़्यादा फ़ासला नहीं था. लेकिन आज इनके बीच बहुत फ़र्क आ गया है.

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Image caption भारत-चीन सीमा पर तैनात भारतीय जवान. फ़ाइल तस्वीर

सीमा पर चीन के पास हैं मज़बूत बुनियादी सुविधाएं

1962 में चीन ने सैन्य ताक़त के दम पर भारत को हराया और फिर पीछे हट गया. इसके बाद 1967 और फिर 1986 में दोनों देशों के बीच तनातनी हुई. इसमें भारत ने सैन्य ताक़त के दम पर अड़े रहते हुए चीन को पीछे हटने के लिए कहा और चीन पीछे हटा भी.

लेकिन आज सैन्य ताक़त के मामले में चीन काफी ताक़तवर हो गया है. इसकी वजह यह है कि उसने पूरे इलाके में मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया है और इसे वह और बढ़ाना चाहता है.

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Image caption 1962 के युद्ध के दौरान नाथू ला दर्रे पर तैनात चीनी सैनिक.

इसी कवायद में सिक्किम के पास उस जगह पर विवाद हुआ है जिसे ट्राइजंक्शन कहते हैं. जिस क्षेत्र में यह विवाद चल रहा है, वहां चीन का रेल और एयरफील्ड इंफ़्रास्ट्रक्चर काफ़ी मज़बूत है.

वह एक हफ़्ते में 6 डिवीज़न यानी एक से सवा लाख सैनिक इस इलाक़े में भेज सकता है. भारत की इतनी क्षमता नहीं है. भारत वाले हिस्से में बहुत कम सड़कें बनी हैं और रेल का तो नाम ही नहीं है. एडवांस लैंडिंग ग्राउंड भी 7-8 ही हैं जो नाकाफ़ी हैं.

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Image caption भारत-चीन सीमा पर चीनी जवान. फ़ाइल फ़ोटो

चीन से काफ़ी पीछे है भारत

सैनिकों की संख्या, हथियारों या टैंकों वगैरह की बात हो या रक्षा बजट की, चीन हर मामले में हिंदुस्तान से आगे है. सबसे अहम बात यह है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर तिब्बत क्षेत्र में चीन के पास जो मूलभूत सुविधाएं हैं, वे भारत के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा हैं.

भारत इस मामले में अभी काफ़ी पीछे है. भारत वाले हिस्से में इंफ़्रास्ट्रक्चर अभी विकसित ही हो रहा है. इस लिहाज से देखा जाए तो भारत और चीन के बीच 10 से 15 साल का फ़र्क है.

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लगातार ताक़त बढ़ा रहा है चीन

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चीन को आज कोई भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता क्योंकि वह एक आर्थिक और सैन्य शक्ति बनकर उभरा है. चीन की सैन्य ताकत लगातार बढ़ रही है. हिंद महासागर में भी वह ताकतवर हो रहा है. वह पूरी दुनिया की उपेक्षा कर रहा है.

वन बेल्ट, वन रोड (OBOR ) कार्यक्रम को भी उसने आर्थिक और कूटनीतिक तौर पर मज़बूत बनाने के लिए ही शुरू किया है. आज अफ़्रीका, दक्षिण एशिया, लैटिन अमरीका और मिडल-ईस्ट तक उसकी पहुंच है.

इसलिए चीन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. इसकी तुलना में भारत की कूटनीति पुराने ढर्रे पर चल रही है, क्योंकि उसकी आर्थिक और सैन्य क्षमता इतनी ज़्यादा नहीं है.

दरअसल भारत उप-महाद्वीपीय शक्ति है जबकि चीन पिछले 10 सालों में ग्लोबल और अंतरमहाद्वीपीय शक्ति बनकर उभर रहा है. दोनों में यह बुनियादी फर्क ही भारत को प्रतिकूल परिस्थितियों में डालता है.

(बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर से बातचीत पर आधारित)

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