क़तर पर संकट से क्या ईरान की होगी चांदी?

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सऊदी अरब और सहयोगी देशों ने क़तर से प्रतिबंध हटाने के लिए जो शर्तें रखी हैं, उसमें पहली शर्त है ईरान के साथ कूटनीतिक रिश्ते खत्म करना और दोहा में ईरानी दूतावास को बंद करना.

अरब जगत पर नज़र रखने वाले कई जानकारों का कहना है कि सऊदी अरब और क़तर के बीच झगड़े की सबसे बड़ी वजह ईरान है. हालांकि अल-जज़ीरा चैनल की गतिविधियां और मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ क़तर के रिश्ते भी दूसरी वजहों में शुमार हैं.

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र ने क़तर की सरहदों और हवाई रास्तों पर पाबंदी लगा दी है.

हाल तक क़तर एयरवेज़ का नाम दुनिया की सबसे अच्छी एयरलाइंस में शुमार होता था. अब उसे मजबूरन लंबे रास्तों से होकर अपना सफर पूरा करना पड़ रहा है क्योंकि अरब देशों के वायु क्षेत्र में दाखिल होने पर उस पर रोक है.

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ईरान का सहारा

क़तर के लिए एक और संकट खड़ा हो गया है कि दुनिया के बाजारों में उसकी क्रेडिट रेटिंग कम कर दी गई है.

ताजा रिपोर्ट ये भी कहा जा रहा है कि क़तर को पर्सियन गल्फ़ कॉर्पोरेशन से भी बेदखल किया जा सकता है. इस संगठन में फारस की खाड़ी से जुड़े छह देश शामिल हैं.

सऊदी अरब ने यहां तक कहा है कि मांगे न माने जाने की सूरत में संकट सुलझाने के कूटनीतिक रास्ते बंद हो चुके हैं.

विरोधी देशों की मांग रखे जाने के बाद क़तर को ईरान की तरफ से सहारा मिला.

राष्ट्रपति हसन रूहानी ने 37 वर्षीय आमिर शेख तामिम बिन हमाद अल थानी को भरोसा दिलाया कि ईरान का समंदर, ज़मीन और हवाई रास्ते क़तर के लिए खुले हुए हैं.

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सऊदी मुहिम

प्रतिबंधों की शुरुआत से ईरान हवा और समंदर के रास्ते क़तर को खाने का सामान भेज रहा है जबकि क़तर एयरवेज़ ईरान के आसमान से होकर यूरोप जा पा रहा है.

लेकिन क़तर के ख़िलाफ़ सऊदी अरब की मुहिम बदस्तूर जारी है. अपनी मांगों को वाजिब ठहराने के लिए उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन हासिल करने की कोशिश भी की है.

सऊदी अरब का कहना है कि क़तर उन संगठनों को भी समर्थन देता है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र चरमपंथी समूह मानता है.

हालांकि कुछ ही दिनों पहले ब्रितानी थिंकटैंक हेनरी जैकसन सोसायटी ने अपनी एक रिपोर्ट में सऊदी अरब को चरमपंथ को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख देश माना है.

थिंक टैंक के मुताबिक खाड़ी के देश और ईरान चरमपंथ को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं और इसमें कोई शक नहीं कि सऊदी अरब इस लिस्ट में सबसे ऊपर है.

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क़तर सरेंडर करेगा?

एक ऐसे देश में जहां अतीत में सत्ता हासिल करने के लिए बगावत और तख्तापलट का सहारा लिया जाता रहा है, वहां सऊदी अरब के सामने झुकने का मतलब होगा, एक और तख्तापलट.

जाहिर है क़तर के अमीर इस कदर कमजोर पड़ जाएंगे कि उनके लिए सत्ता संभालना मुश्किल हो जाएगा.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो क़तर में एक और तख्तापलट और साथ में सैनिक कार्रवाई के बिना सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों की शर्तों को मानना क़तर की हुकूमत के लिए मुमकिन नहीं लगता.

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ईरान का फ़ायदा

ये ईरान के लिए एक बहुत बड़ी जीत है. ईरान के ख़िलाफ़ अरब देशों का एक संयुक्त मोर्चा गठित करने की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं.

दूसरी तरफ, शिया मुल्क ईरान के ख़िलाफ़ क्षेत्रीय गठबंधन बनाने की अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की योजना भी खटाई में पड़ती दिख रही है.

ईरान के साथ अच्छे रिश्ते रखने की क़तर की चाह के पीछे मुख्यतः आर्थिक वजहें हैं. दोनों देशों के पास फारस की खाड़ी में गैस का बहुत बड़ा खजाना है.

रूस के बाद ईरान और क़तर के पास दुनिया का दूसरा और तीसरा सबसे बड़ा गैस भंडार है.

ईरान को लेकर आक्रामक रुख रखना क़तर के लिए कभी भी आसान नहीं था. उसकी गैस सप्लाई के रास्ते ईरान से होकर जाते हैं और ईरान से झगड़ा क़तर के लिए समझदारी नहीं कहा जाएगा.

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फ़ीफ़ा कप

इसके अलावा क़तर के मौजूदा संकट ने ईरान के लिए आर्थिक फ़ायदे के रास्ते भी खोल दिए हैं.

2022 के फ़ीफ़ा फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप से जुड़े प्रोजेक्ट को वक्त पर पूरा करने के लिए क़तर ईरान की मदद मांग सकता है.

एसोसिएशन ऑफ ईरानियन एक्सपोर्टर्स के हेड मोहम्मद रज़ा अंसारी का कहना है कि तकनीकी और इंजिनियरिंग सेवाओं के बदले ईरान को दो अरब डॉलर हासिल हो सकते हैं और आगे चलकर ये 25 अरब डॉलर सालाना की रकम बन सकती है.

दूसरे शब्दों में कहें तो ईरान पर निशाना रखकर क़तर को टारगेट करने की सऊदी अरब की रणनीति से ईरान को राजनीतिक और आर्थिक फायदे दोनों मिल रहे हैं.

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