क़तर पर उल्टा पड़ रहा है सऊदी अरब का दांव

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सऊदी अरब ने क़तर पर आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए उसके साथ सभी राजनायिक संबंध समाप्त कर दिए थे, लेकिन क़तर पर इस क़दम का ज़्यादा असर पड़ता नहीं दिख रहा है.

सऊदी अरब के साथ संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन और मिस्र ने भी क़तर के साथ अपने राजनायिक संबंध तोड़े थे. इसके बाद यमन, लीबिया और मालदीव ने भी क़तर से दूरी बना ली थी.

सऊदी अरब ने क़तर को 13 शर्तें मानने के लिए कहा था, जिसमें आतंकी संगठनों के साथ गठजोड़ समाप्त करने से लेकर अल-जज़ीरा टीवी को बंद करना शामिल था.

हालांकि क़तर ने किसी भी शर्त को मानने से इनकार कर दिया है और वह अपनी ज़रूरतों का सामान ईरान और तुर्की से आयात करने लगा.

माना जा रहा है कि जिस उद्देश्य के साथ अरब देशों ने क़तर के साथ अपने संबंध समाप्त किए थे वह उल्टा असर करने लगे हैं.

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Image caption क़तर की ज्यादातर खाद्य सामग्री आयात पर ही निर्भर है

ईरान और तुर्की का साथ

क़तर की 27 लाख जनता के लिए ज़्यादातर ज़रूरी सामान आयात पर ही निर्भर रहता है. उसकी लगभग 40 प्रतिशत खाद्य सामग्री सऊदी अरब बॉर्डर से आती है.

सऊदी अरब के क़तर से रिश्ते समाप्त करने के बाद तुर्की और ईरान उसकी सहायता के लिए सामने आ गए. इस वजह से एक तरफ़ तो ईरान के व्यापार को फ़ायदा मिला वहीं दोहा और तेहरान के बीच राजनयिक रिश्ते भी अच्छे होने लगे.

क़तर की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रोरी मिलर के अनुसार क़तर पर लगा प्रतिबंध पूरी तरह से विफल रहा. सऊदी अरब और यूएई ने जिस गठजोड़ की मंशा के साथ खाड़ी क्षेत्र में अपना एकाधिकार जमाने का प्रयास किया था, उसमें वह सफल नही हो सके. इसके उलट तुर्की ने क़तर के साथ अपने रिश्ते अधिक मजबूत कर लिए हैं.

स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया

लंदन में रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेश्नल अफेयर्स के अरब प्रायद्वीप के विशेषज्ञ पीटर सेलिसबरी की माने तो इन हालातों को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जा रहा है.

उनके अनुसार सऊदी अरब को अपनी योजना में ज्यादा सफलता नहीं मिली लेकिन यह कहना कि क़तर और ईरान बेहद क़रीब आ गए हैं, यह भी पूरी सच्चाई नहीं है.

क़तर और ईरान के बीच हमेशा से एक अविश्वास बना रहा है. इस वक़्त ईरान क़तर को खाद्य सामग्री सिर्फ़ इसलिए मुहैया करवा रहा है क्योंकि वह खाड़ी क्षेत्र में सऊदी अरब की स्थिति को ख़राब करना चाहता है.

आतंकी संगठन पर लगाम

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Image caption अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिस्र के राष्ट्रपति और सऊदी अरब के किंग से मई में की मुलाकात

क़तर के सामने रखी शर्तों में एक प्रमुख शर्त मुस्लिम ब्रदरहुड, हमास, अन्य इस्लामिक संगठनों और ईरान द्वारा समर्थित सैन्य संगठनों के साथ संबंध तोड़ना शामिल था.

रोरी मिलर ने बीबीसी को बताया कि अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता को बचाए रखने के लिए क़तर इन संगठनों के ख़िलाफ़ ज़्यादा कड़ा रुख नहीं अपना सकता.

मिलर के अनुसार इस हफ़्ते अमेरिका और क़तर के बीच हुआ आतंकवाद विरोधी समझौता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

दूसरी किसी योजना की कमी

सऊदी अरब, बहरीन, मिस्र और यूएई के क़तर द्वारा किसी प्रकार की प्रतिक्रिया ना देने की स्थिति में उचित समय पर अलग क़दम उठाने की बात कही गई है. हालांकि रोरी मिलर का मानना है कि सऊदी अरब और उसके साथी देशों के पास क़तर के लिए कोई प्लान बी तैयार नहीं है.

रोरी का कहना है, 'क़तर विरोधी राष्ट्र अब ज़्यादा कड़े क़दम नहीं उठा सकते, क्योंकि उनके ऊपर भी अंतरराष्ट्रीय दबाव बन गया है. इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र में ईरान और तुर्की की बढ़ती मौजूदगी भी उनके क़दम रोक रही है.'

तेल की मांग

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Image caption क़तर दूसरे देशों को गैस निर्यात कर अपनी जरूरतें पूरी कर रहा है

सेलिसबरी के अनुसार सऊदी अरब और उसके सहयोगी राष्ट्र क़तर पर लगे प्रतिबंधों को ज़ारी रखकर उसे आर्थिक रूप से कमज़ोर बनाने की सोच रहे हैं. वही दूसरी तरफ क़तर अपने प्राकृतिक तेल भंडार का निर्यात कर अपनी ज़रूरतों को पूरा कर रहा है.

सेलिसबरी कहते हैं कि जब तक गैस की मांग और उसकी कीमतें बढ़ती रहेंगी, क़तर अपनी ज़रूरतें पूरी करता रहेगा और उस पर लगने वाले प्रतिबंध पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाएंगे.

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