शाहिद ख़ाकान अब्बासी जिन्हें नवाज़ शरीफ़ जेल में ही छोड़ गए थे

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Image caption शाहिद ख़ाकान अब्बासी

पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ की जगह प्रधानमंत्री पद के लिए शाहिद ख़ाकान अब्बासी और शाहबाज़ शरीफ़ के चयन से पता चलता है कि मुस्लिम लीग (एन) फ़िलहाल किसी टकराव के मूड में नहीं है.

शाहबाज़ शरीफ़ के बारे में तो ये बात अब आम हो चुकी है कि वे कई अवसरों पर नवाज़ शरीफ को सेना के साथ टकराव से परहेज़ बरतने की सलाह देते रहे हैं. चाहे वो जनरल (रिटायर्ड) परवेज़ मुशर्रफ़ को नौकरी से बर्ख़ास्त करने का मामला हो या उनके ख़िलाफ़ विद्रोह के मामले में कार्रवाई की बात.

नेशनल असेंबली के लिए शाहबाज़ शरीफ़ के चुने जाने तक दूसरे उम्मीदवार शाहिद ख़ाकान अब्बासी अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करेंगे.

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नेशनल असेंबली

समाचार एजेंसी एफ़पी के मुताबिक शाहबाज़ के नेशनल असेंबली में चुन कर आने में 45 दिनों का वक्त लग सकता है. इसका मतलब ये हुआ कि शाहिद ख़ाकान अब्बासी को प्रधानमंत्री पद के ओहदे पर इतना ही वक्त मिलने वाला है.

शाहिद ख़ाकान अब्बासी भी अपने धीमे मिज़ाज और सुलहपसंद तबीयत के कारण संघीय मंत्रिमंडल के उन गिने-चुने सदस्यों में शामिल रहे हैं जिन्हें हमेशा ऐसे धीरज रखने वाले सियासी शख़्सियत के तौर पर देखा जाता है जो भावुकता और जल्दबाज़ी में यक़ीन नहीं रखता.

पाकिस्तान के पंजाब सूबे के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मरी से आने वाले शाहिद ख़ाकान अब्बासी के अब्बा ख़ाकान अब्बासी ज़ियाउल हक़ के क़रीबी सहयोगियों में थे.

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Image caption तख़्तापलट से पहले इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान मुशर्रफ़ के साथ नवाज़

मुशर्रफ़ से समझौते के बाद

1988 में अपने पिता की रावलपिंडी में एक हादसे में मौत के बाद शाहिद ख़ाकान अब्बासी संसदीय राजनीति में दाखिल हुए और इसी साल हुए नेशनल असेंबली के चुनाव में जीते. इसके बाद से वे छह बार नेशनल असेंबली के लिए जीत चुके हैं. उन्हें केवल 2002 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

नवाज़ शरीफ़ के दूसरे कार्यकाल में वे नेशनल एयरलाइंस कंपनी 'पीआईए' के अध्यक्ष बने और 12 अक्टूबर 1999 के तख़्तापलट के मौके पर आर्मी चीफ़ जनरल परवेज़ मुशर्रफ के विमान अपहरण करने की कोशिश के जुर्म में नवाज शरीफ़ के साथ गिरफ्तार हुए.

नवाज़ शरीफ़ परवेज़ मुशर्रफ के साथ एक समझौते के बाद परिजनों के साथ सऊदी अरब रवाना हुए, लेकिन शाहिद ख़ाकान अब्बासी को जेल में ही छोड़ गए.

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Image caption नवाज़ शरीफ़ और शाहबाज़ शरीफ़

नवाज़ शरीफ़ के वफ़ादार

क़रीब दो साल जेल में बिताने के बाद जब वे रिहा हुए तो उन्होंने पीएमएल (एन) के टिकट पर अपने क्षेत्र से चुनाव तो लड़ा, लेकिन उनके क्षेत्र के लोग कहते हैं कि उन्होंने ये इतने बेमन से लड़ा कि हार गए.

इसके बाद कुछ साल तक उनका सारा ध्यान अपनी एयरलाइंस कंपनी 'एयर ब्लू' पर रहा जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष हैं. इस दौरान वे मुख्यधारा की राजनीति से फ़ासला बरतते रहे.

कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि शाहिद ख़ाकान अब्बासी इस दौरान सत्तारूढ़ पार्टी के प्रमुख चौधरी शुजात हुसैन के क़रीबी रहे और जिनसे उन्होंने अपनी एयरलाइंस के लिए फ़ायदा उठाया. नवाज़ शरीफ़ के वफ़ादार से परवेज़ मुशर्रफ के तरफ़दार बने चौधरी शुजात हुसैन ने 1999 के तख़्तापलट का समर्थन किया था.

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मुस्लिम लीग (नवाज़)

लेकिन जब नवाज़ शरीफ़ देश और मुख्यधारा की राजनीति में वापस आए तो शाहिद ख़ाकान अब्बासी एक बार फिर उनके साथ खड़े थे.

इस समय शाहिद ख़ाकान अब्बासी की गिनती मुस्लिम लीग (एन) के उन नेताओं में होती है जिनके सेना से लिंक थे. इन संपर्कों और रिश्तों का उन्होंने अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कैसे इस्तेमाल किया, इसके कोई सबूत नहीं मिलते, लेकिन उन्होंने कुछ जनरलों के नाम का कुछ हद तक इस्तेमाल ज़रूर किया.

शाहिद ख़ाकान अब्बासी नेशनल असेंबली के मेंबर और उनकी बहन सादिया अब्बासी मुस्लिम लीग के टिकट पर सीनेटर बनीं, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने के बाद जब उन्हें सीनेट के लिए फिर से टिकट नहीं मिली तो वो मुस्लिम लीग से तल्खी के बाद अलग हो गईं.

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समझौते की बात

नवाज शरीफ़ ने तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद शाहिद ख़ाकान को महत्वपूर्ण पेट्रोलियम और प्राकृतिक संसाधन जैसे मंत्रालयों का वज़ीर बनाया.

उन्हें ख़्वाजा आसिफ़, शाहबाज़ शरीफ़ और इसहाक डार के साथ देश के ऊर्जा संकट को खत्म करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. वो पिछले कुछ सालों से नवाज़ और शाहबाज़ शरीफ के बेहद क़रीब रहने वाले मंत्रियों में शामिल रहे.

वे केवल ऊर्जा मामलों में ही नहीं बल्कि राजनीतिक सलाह-मशविरे में भी हमेशा शामिल रहे और मुस्लिम लीग के कुछ सूत्रों के अनुसार अधिकांश मौकों पर उनकी और शाहबाज़ शरीफ़ की राय में खासी समानता पाई जाती थी, यानी दोनों ही संघर्ष के बजाय समझौते की बात करते दिखाई देते.

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तटस्थता की राजनीति

शाहिद ख़ाकान अब्बासी की एक ख़ूबी बहुत हद तक उनका तटस्थ होना भी है. वे पाकिस्तान में सबसे 'फ़ायदेमंद' समझे जाने वाले मंत्रालय के प्रमुख रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद किसी बड़े राजनीतिक या वित्तीय आरोप की चपेट में नहीं आए.

वह अपने साथी राजनेताओं में भी अच्छी प्रतिष्ठा रखते हैं और सुलहपसंद स्वभाव के कारण लोकप्रिय भी हैं. हाल ही में जब गृहमंत्री चौधरी निसार अली ख़ान ने प्रधानमंत्री से नाराज़गी जताई तो जिन लोगों को उन्हें मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उनमें शाहिद ख़ाकान अब्बासी भी शामिल थे.

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