वेनेज़ुएला संकट में क्या कर सकती है मोदी सरकार

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Image caption रूस उन कुछ देशों में से है जिसने खुलकर वेनेज़ुएला का समर्थन किया है

वेनेज़ुएला में हालिया हुए चुनाव के नतीज़ों की चर्चा अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है.

एक तरफ़ तो वे देश हैं जिन्होंने नई सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया है तो दूसरी तरफ़ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने वेनेज़ुएला के प्रति समर्थन ज़ाहिर किया है और किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल न देने की अपील की है.

इस बीच वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो अपने रवैये पर अड़े हुए हैं. बोलीविया, क्यूबा, अल-सल्वाडोर और निकारागुआ जैसे देशों से मिला समर्थन अन्य देशों की तरफ से लगाए जाने वाले संभावित प्रतिबंधों की क्षतिपूर्ति शायद ही कर सके.

जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रवक्ता ने कहा कि वे वेनेज़ुएला की नई संसद को मान्यता नहीं देते तो निकोलस मादुरो ने कहा, "ट्रंप क्या कहते हैं, हमें इसकी परवाह नहीं है. वेनेज़ुएला के लोग क्या कहते हैं, हमें केवल इसकी परवाह है."

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Image caption मोदी सरकार ने वेनेज़ुएला से तेल की ख़रीद बढ़ा दी है

भारत से उम्मीद

वेनेज़ुएला को न केवल अमरीका की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है बल्कि मेक्सिको, ब्राजील, अर्जेंटीना, चिली, स्पेन और यूरोपीयन यूनियन की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

हालात ऐसे बन रहे हैं कि वेनेज़ुएला को चीन और रूस के साथ-साथ भारत की तरफ़ भी देखना पड़ सकता है. अभी तक केवल रूस ने उन देशों से बात की है जो वेनेज़ुएला के इस संकट में उसका साथ दे रहे हैं.

हालांकि चीन और भारत वेनेज़ुएला के मसले पर ख़ामोश हैं. अमरीका के अलावा केवल भारत ही एक ऐसा देश है जो वेनेज़ुएला से नकदी देकर तेल ख़रीदता है. यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि रूस, चीन और भारत से वेनेज़ुएला क्या उम्मीद रख सकता है?

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Image caption वेनेज़ुएला रूस से नैतिक समर्थन की उम्मीद तो कर सकता है, लेकिन उसे कोई ठोस मदद शायद ही मिले

रूस का राजनीतिक समर्थन

रूस की तरफ़ से सोमवार को वेनेज़ुएला के समर्थन का औपचारिक तौर पर एलान कर दिया गया. इसके साथ ही रूस ने वेनेज़ुएला की मुख़ालफत कर रहे देशों की आलोचना भी की है.

बीबीसी की रूसी सेवा के संपादक फ़ामिल इस्माइलोव का कहना है कि वेनेज़ुएला रूस से राजनीतिक समर्थन की उम्मीद तो रख सकता है, लेकिन उसे क्रेमलिन से शायद ही कोई ठोस मदद मिल सके.

वे कहते हैं, "वेनेज़ुएला की आर्थिक मदद करने की रूस की ज़्यादा क्षमता भी नहीं है. लेकिन रूस आख़िर तक वेनेज़ुएला का साथ निभाएगा क्योंकि राष्ट्रपति पुतिन अपने लोगों का साथ कभी छोड़ते नहीं हैं."

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चीन का रुख़

वेनेज़ुएला पर चीन के 65 अरब डॉलर का कर्ज़ा है और ये कोई मामूली रकम नहीं है. हाल के वर्षों में इससे दोनों देशों के रिश्तों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. लेकिन अगर वेनेज़ुएला से तेय निर्यात पर अमरीका रोक लगाता है तो चीन इसका वैकल्पिक बाज़ार नहीं बन सकता.

चीन को तेल बेचकर वेनेज़ुएला को ज़्यादा कुछ हासिल नहीं होने वाला है क्योंकि उससे मिलने वाला पैसा कर्ज़ चुकाने में ही चला जाएगा. इस बारे में भी स्थिति साफ़ नहीं है कि चीन अपने कर्ज़ में कोई राहत देने वाला है, लेकिन एक बात तय है कि बीजिंग वेनेज़ुएला के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा.

पिछले साल जून में चीन के प्रतिनिधियों ने वेनेज़ुएला के विपक्षी नेताओं से मुलाकात की थी. इसका मकसद ये था कि सरकार बदलने की सूरत में उनका कर्ज़ सुरक्षित रहे.

और इससे भी अहम बात ये है कि चीन के अच्छे रिश्ते वेनेज़ुएला के उन पड़ोसी देशों से भी हैं जो उसकी नई सरकार को मान्यता नहीं दे रहे हैं. इन बातों से ये संकेत मिलते हैं कि चीन अपने आर्थिक हितों को बचाने के लिए जो भी ज़रूरी होगा वो करेगा.

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Image caption उगो शावेज़ के भारत दौरे के बाद वेनेज़ुएला की नई दिल्ली में राजनीतिक अहमियत बढ़ी है

भारत: दूरियां और ख़ामोशी

वेनेज़ुएला के पूर्व राष्ट्रपति उगो शावेज़ के भारत दौरों की वजह से ये उम्मीद की जा रही है कि भारत को वहां के हालात की ख़बर होगी.

पूर्व राजदूत नीलन देव कहते हैं, ''वामपंथी समर्थकों के अलावा भारत में तेल उद्योग और दवा इंडस्ट्री के लोग वेनेज़ुएला पर नज़र रखे हुए हैं. भारत के दवा उद्योग के लिए वेनेज़ुएला महत्वपूर्ण बाज़ार है. हालांकि देर से भुगतान की वजह से उन्हें नुकसान ज़रूर हो रहा है.''

इसके साथ ही भारत को तेल की बिक्री से होने वाली आमदनी भी निकोलस मादुरो की सरकार के लिए विदेशी मुद्रा की कमाई का बड़ा ज़रिया है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों की वजह से ये कमाई अब गिरकर आधी रह गई है.

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ईरान से भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बाद ही तेल ख़रीदना शुरू किया था, वैसे अब ये प्रतिबंध हटा लिए गए हैं. नीलन देव का कहना है कि नए हालात में भारत वेनेज़ुएला से तेल खरीदने में कोई बड़ी कटौती नहीं करने वाला है, लेकिन इससे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में कोई तरक्की भी नहीं होने वाली है.

वेनेज़ुएला के आंतरिक मसलों पर भारत की तरफ़ से कोई आधिकारिक स्टैंड लेने की भी फ़िलहाल कोई तस्वीर नहीं बनती दिखती.

पिछले बरस सितंबर में वेनेज़ुएला में गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत नहीं की थी. इसका ये मतलब निकाला जा रहा है कि भारत वेनेज़ुएला से फ़ासला बरत रहा है.

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