क्या है नीतीश कुमार पर हत्या के आरोप का मामला?

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करीब 26 साल पुराना एक हत्याकांड बिहार में 26 जुलाई को हुए राजनीतिक उठापटक के बाद से चर्चा के केंद्र में है. इस हत्याकांड में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नामज़द अभियुक्त हैं.

मामला पटना ज़िले के पंडारक थाने का है. साल 1991 में 16 नवंबर लोकसभा चुनाव के मतदान का दिन था. उस दिन इस थाने के ढीवर गांव के प्राइमरी स्कूल में सीताराम सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. इसमें कुछ लोग घायल भी हुए थे.

'नीतीश कुमार नामज़द अभियुक्त'

इस हत्याकांड से संबंधित एफ़आईआर घटना के अगले दिन 17 नवंबर को दर्ज हुई थी. इसमें नीतीश कुमार सहित पांच लोगों को नामज़द अभियुक्त बनाया गया था. यह इलाक़ा बाढ़ लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है. तब नीतीश इस सीट पर जनता दल के उम्मीदवार थे. उस समय बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे और नीतीश कुमार लालू प्रसाद के क़रीबी सहयोगी थे.

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हत्या के चंद महीनों पहले सीताराम सिंह की शादी हुई थी. सीताराम सिंह चार भाई थे. उनके एक भाई राधाकृष्ण सिंह बताते हैं कि वे घटना के समय सीताराम सिंह के साथ थे.

उस दिन के बारे में वो बताते हैं, ''हम अपने भाई के साथ क़रीब शाम चार बजे वोट डालने निकले. वोट डालने के पहले भी इस बात पर कहासुनी हुई कि हमारे बूथ पर किसे वोट पड़ा है. इसके बाद हमने अपना वोट डाला.''

'मतदान केंद्र पर हुई थी कहासुनी'

Image caption नीतीश कुमार ने 2012 के विधान परिषद चुनाव में ये हलफ़नामा दिया था जिसमें इस केस का ज़िक्र था

राधाकृष्ण आगे बताते हैं, ''हमारे वोट डालने के बाद क़रीब 10 लोग पहुंचे. उनमें नीतीश कुमार भी थे. नीतीश ने पूछा कि केकरा देलहीं वोट हो (वोट किसे दिया). हमने कहा कि कांग्रेस को. यही बात मेरे भाई ने भी कही. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को वोट दिया है तो आप क्या कर लेंगे. इसके बाद नीतीश कुमार ने मेरे भाई पर गोली चलाई और चलते बने. भाई आगे थे हम पीछे. मेरे मुंह से निकला कि हमरा भाई के मार दिया.''

वरिष्ठ वकील दीनू कुमार पटना हाई कोर्ट में इस मामले में राधाकृष्ण सिंह के वकील हैं. उनके मुताबिक राधाकृष्ण ने नीतीश कुमार द्वारा गोली चलाने की बात पटना हाई कोर्ट में दिए अपने हलफ़नामे में भी कही है.

उन्होंने इस मामले में हुई जांच और इसकी वर्तमान स्थिति के बारे में कहा, ''जांच के दौरान पुलिस ने कहा कि तीन अभियुक्त ऐसे हैं जिनके डर से कोई गवाही देने के लिए तैयार नहीं है. इसके बाद पुलिस ने यह कहते हुए जांच रिपोर्ट जमा कर दिया कि केस सही है, लेकिन साक्ष्य की कमी है.''

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दफ़ा 302 और आर्म्स एक्ट

उन्होंने आगे कहा, ''रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अशोक सिंह ने शिकायत याचिका दायर की. इसके आधार पर साल 2009 में नीतीश कुमार पर दफ़ा 302 और आर्म्स एक्ट के तहत संज्ञान ले लिया गया. नीतीश कुमार ने संज्ञान लेने के मामले को हाई कोर्ट में चुनौती दी है और वहां यह मामला लंबित है. इस आपराधिक मामले में नीतीश कुमार को बरी नहीं किया गया है.''

शिकायत याचिका दायर करने वाले अशोक सिंह सीताराम सिंह के मौसेरे भाई हैं और 16 नवंबर की वारदात में वो भी घायल हुए थे. वहीं नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू का कहना है कि नीतीश कुमार को बरी किए जाने के बाद राजनीतिक दुर्भावना से यह शिकायत याचिका दायर करवाई गई है. 27 जुलाई को नीतीश कुमार के छठी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जेडीयू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मसले पर विस्तार से अपना पक्ष रखा था.

नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ साज़िश

तब पार्टी नेता और वर्तमान में बिहार सरकार के मंत्री ललन सिंह ने कहा था, ''अशोक सिंह ने निचली अदालत द्वारा नीतीश कुमार को बरी किए जाने के बाद इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ एक शिकायत याचिका दायर की थी. अशोक सिंह न तो मामले की जानकारी देने वाले थे और न गवाह.''

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ललन सिंह ने इसके पीछे की राजनीतिक साज़िश का इशारा करते हुए कहा था, ''अशोक सिंह ने बाद में अदालत में हलफ़नामा दायर कर यह कहा कि अपहरण कर मुझसे सादे काग़ज़ पर दस्तख़त कराया गया और इस दस्तख़त के सहारे शिकायत याचिका दायर की गई. ज़रूर कोई न कोई पीछे होगा जिन्होंने अशोक को खड़ा किया होगा.''

दूसरी ओर 26 जुलाई से ही लालू प्रसाद यादव भी रह-रह कर इस मामले के बहाने नीतीश कुमार पर निशाना साध रहे हैं. पिछले दिनों में उन्होंने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा, ''नीतीश पर 302, हत्या और आर्म्स एक्ट का केस है, लेकिन फिर भी कंबल ओढ़कर और दूसरों को मायावी छवि का सफ़ेद कंबल ओढ़ाकर 'गॉड ऑफ़ मोरालिटी' बना हुआ है.''

इसी फ़ेसबुक पोस्ट में उन्होंने यह सवाल भी किया, ''मित्रों, क्या हत्या जैसे संगीन जुर्म में अभियुक्त मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बैठने का नैतिक अधिकार है. जहां केस ही मुख्यमंत्री बनाम बिहार राज्य का हो?''

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