ब्लॉग: 'ये रमज़ान कबाड़ी तो बहुत चालाक निकला'

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रमज़ान कबाड़ी कुछ दिन पहले अपनी दुकान पर बिछी चारपाई पर लेटे-लेटे मर गया. अपने पीछे वह बहुत सा काठ-कबाड़, काले शर्बत की चार शीशियां, एस्पिरिन की कुछ गोलियां, ज़ख़्मों पर बांधने वाली पट्टियों के चार बंडल, एक तालाबंद संदूकची और एक बेटी छोड़ गया.

इस बेटी की पूरी ज़िंदगी दुकान के साथ लगी कुटिया के अंदर-बाहर गुज़र गई.

इस बेटी का असल नाम कोई नहीं जानता. गूंगी का नाम भला कौन जानेगा? मां को किसी ने देखा नहीं था.

रमज़ान कबाड़ी भी हमेशा उसे बिटिया कहके पुकारता था.

मोहल्लेवालों ने अपनी आसानी के लिए उसका एक नाम रख दिया था- रमज़ानो, रमज़ान की रमज़ानो.

रमज़ानो बच्ची से बड़ी हुई और फिर बुढ़ापे में दाख़िल हो गई. मगर रमज़ान कबाड़ी की क्या उम्र थी?

तीन दिन पहले जब वह मरा तो मोहल्ले के बुज़ुर्गों ने उसकी दाढ़ी के सफ़ेद बालों, भौहों की सफ़ेदी, चेहरे और हाथों की झुर्रियों से अंदाज़ा लगाया कि बड़े मियां 80 साल से तो ज़्यादा के ही थे.

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दफ़नाने के बाद मोहल्ले की मस्जिद कमेटी के चार-पांच बुज़ुर्ग सिर जोड़कर बैठे ताकि यह फ़ैसला हो सके कि रमज़ान कबाड़ी की दुकान और सामान का क्या करना है.

क्या इसे बेचकर इसके पैसे रमज़ानो को दे दें या फिर किराये पर चढ़ा दें ताकि रमज़ानो का गुज़ारा चलता रहे.

मगर इससे भी अहम सवाल यह था कि यह मालूम तो हो कि यह दुकान किसकी मिल्कियत है और इसके काग़ज़ात कहां हैं.

ये बुज़ुर्ग रमज़ानो के पास गए, उसे ओढ़नी ओढ़ाई और कुछ सवालात किए. गूंगी समझी या न समझी मगर उसने दुकान में बिछाई चारपाई के नीचे से तालाबंद संदूकची निकालकर बुजुर्गों के आगे रख दी.

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ताला तोड़ दिया गया. इसमें कुछ तुड़े-मुड़े काग़ज़ात और कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें थीं.

गोरखपुर के किसी स्कूल का स्पोर्ट्स में हिस्सा लेने का तारीख़ी सर्टिफ़िकेट भी मिला, जिसपर रमज़ान अली ख़ान वल्द मुमताज़ अली ख़ान लिखा हुआ था. तारीख़ थी- 1936.

एक 15-16 साल के बच्चे की कोट-टाई वाली ब्लैक एंड व्हाइट पीली सी तस्वीर मिली. एक तस्वीर में जिन्ना साहब से कोई नौजवान बातें करता दिख रहा था.

एक लेटर जो इवेक्यू प्रॉपर्टी ट्रस्ट कराची के एडमिनिस्ट्रेटर के दफ़्तर से 16 अक्टूबर 1947 को जारी हुआ, जिसमें किसी मोहनलाल वासवानी के घर की रमज़ान अली ख़ान वल्द मुमताज़ अली ख़ान के नाम अलॉटमेंट की गई थी.

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मगर रमज़ान कबाड़ी की संदूकची में ये सब काग़ज़ किसके थे और क्यों थे?

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अचानक मस्जिद कमेटी के एक बुजुर्ग की आंखें चमक उठीं. 'यार ये साला तो बहुत चालाक निकला. हमें जिंदगी भर कबाड़ी होने के धोखे में रखा. चलो इसकी कब्र पर फूल चढ़ाकर आएं. अरे एक तख़्ती भी तो बनवानी होगी संगमरर की, कब्र पर लगाने के लिए. रमज़ान अली ख़ान वल्द मुमताज़ अली ख़ान, तहरीक़-ए-आज़ादी के अज़ीम रहनुमा.

और फिर सब गूंगी रमज़ानो को इस काठो-कबाड़ में छोड़कर कब्रिस्तान की ओर तेज़-तेज़ कदमों से चलने लगे.

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