तो क्या चीन की अर्थव्यवस्था डूबने के कगार पर है?

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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि चीन का क्रेडिट ग्रोथ यानी वित्तीय संस्थाओं के कर्ज बांटने की रफ्तार ख़तरनाक रास्ते पर है.

एक ताज़ा रिपोर्ट में आईएमएफ ने कहा कि इससे चीन की अर्थव्यवस्था का हिसाब-किताब गड़बड़ा सकता है औरआर्थिक विकास की रफ़्तार भी धीमी पड़ सकती है.

आईएमएफ़ ने कर्ज बांटने की वित्तीय संस्थाओं की तेज रफ्तार (क्रेडिट बूम) में कमी लाने के लिए निर्णायक क़दम उठाने की अपील की है.

रिपोर्ट में कहा गया कि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो हाल में चीन की अर्थव्यवस्था का जिस तरह से विस्तार हुआ है, वो काफी धीमा रहता.

दुनिया भर में आए वित्तीय संकट के बाद चीन में आर्थिक विकास की दर धीमी हुई है.

बीते तीन दशकों से चीन की अर्थव्यवस्था 10 फीसदी के औसत दर से हर साल बढ़ रही थी लेकिन पिछले साल ये घटकर 6.7 फीसदी पर रह गई.

हालांकि चीन की सरकार को भी मंदी की आशंका थी क्योंकि दो अंकों वाला विकास दर लंबे समय तक बरकरार नहीं रहने वाला था.

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चीन की स्थिति

धीमी होती विकास दर को संभालने के लिए चीन अलग ढंग से कोशिश कर रहा है. एक तरीका ये अपनाया गया कि इंडस्ट्री और निर्यात पर निर्भरता कम हो और घरेलू चीजों और सर्विस सेक्टर में उपभोक्ता खर्च की भूमिका बढ़ाई जाए.

हालांकि आईएमएफ का कहना है कि मंदी की स्थिति अधिक मुश्किल पैदा करती अगर वित्तीय संस्थाओं की तरफ से ज्यादा कर्ज न बांटा जाता.

रिपोर्ट कहती है कि साल 2012-16 के दरमियान बैंकिंग अर्थव्यवस्था के और टिकाऊ होने से आर्थिक विकास को रफ्तार मिलती जो अब दो फीसदी तक कम हो गई है.

आईएमएफ ने बीते सालों में तेज़ी से कर्ज़ बांटने वाली बैंकिंग अर्थव्यवस्थाओं के हैरान कर देने वाले आंकड़े पेश किए हैं. आईएमफ़ के मुताबिक चीन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही बनती दिख रही है.

आंकड़ों में बताया गया है कि 43 में से सिर्फ 5 देश ऐसे थे जो आर्थिक संकट या अर्थव्यवस्था में मंदी के ख़तरे से बच पाए.

रिपोर्ट में चीन की स्थिति के बारे में विस्तार से बताया गया है और ख़तरा कम करने को कहा गया है. इसका एक उदाहरण को चीन का चालू खाते (करेंट अकाउंट) का सरप्लस है जो उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कुछ वित्तीय लेन-देन के बराबर है.

इससे विदेशों से मिलने वाले कर्ज पर चीन की निर्भरता कम होती है. और अगर विदेशी कर्जदाताओं का अचानक भरोसा उठ भी जाता है तो इसका असर उतना नहीं पड़ेगा. दुनिया के कुछ उभरते हुए बाजारों में वित्तीय संकट पैदा होने के बाद ऐसा हो चुका है.

चीन में कर्ज़दारों की लिस्ट में सबसे बड़े ग्रुप के तौर पर सरकारी कंपनियां हैं. हालांकि सरकार के अलावा दूसरे बिजनेस और आम लोगों द्वारा लिए गए कर्ज़ में भी काफी इजाफा हुआ है.

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चीन को मिली सलाह

सरकारी कंपनियां चीन के लिए बड़ी चुनौती हैं. इनमें से कई कंपनियां कर्ज़ में डूबी हुई हैं और सरकारी मदद के आसरे पर चल रही हैं. इन कंपनियों की माली हालत ठीक नहीं है और ये इकॉनमी के ऐसे सेक्टर्स में काम कर रही हैं जहां पहले ही भीड़ ज्यादा है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, ऐसी कंपनियां बढ़े हुए कर्ज़ के लिए ज़्यादा जिम्मेदार हैं. इसके साथ हाउसिंग मार्केट के लिए भी चेतावनी जारी की गई है. कीमतों में अगर अचानक कोई गिरावट हुई तो आर्थिक स्थिरता ख़तरे में पड़ जाएगी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके लिए निर्णायक फैसले लेने की ज़रूरत है.

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