ग्राउंड रिपोर्ट: सऊदी अरब के अवामिया खंडहरों में कब लौटेगी ज़िंदगी?

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सऊदी अरब के अवामिया में सुरक्षाबलों और शिया लड़ाकों के बीच कई महीनों से चली आ रही खूनी लड़ाई के बीच बीबीसी की सल्ली नबील ने इस क्षेत्र में जाने के लिए किसी तरह अनुमति पा ली.

हिंसा में यहां की पुरानी इमारतें तहस-नहस हो चुकी हैं. अवामिया सुन्नी मुस्लिम शासित राष्ट्र के पूर्व में स्थित कस्बा है.

अवामिया को जानी वाली हथियारों से लैश जीप के साथ हमें जाने की अनुमति मिली.

एक सऊदी पुलिस अधिकारी ने कहा, ''आपके पास सिर्फ कुछ मिनट होंगे ग्राउंड पर. जब हम कहें 'जाओ' तो आपको तुरंत वहां से निकल जाना होगा.''

स्पेशल फोर्स के साथ जैसे-जैसे हम कस्बे में बढ़ते गए, उनके अधिकारी अपने कमांडरों से फ़ोन पर लगातार संपर्क में थे. वे यह सुनिश्चित कर रहे थे कि हमारा गश्ती दल सुरक्षित आगे बढ़ रहा है.

अवामिया में सुरक्षा के हालात अस्थिर बने हुए हैंज, जबकि सरकार सबकुछ नियंत्रण में होने के दावे करती है.

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जब हम अवामिया में पहुंचे तो वहां की तबाही देखकर हैरान थे. वहां का नजारा किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं था.

तेल के भंडार से भरे पूर्व प्रांत के कासिफ़ क्षेत्र में बसे इस कस्बे में 30000 लोग रहते थे. उनमें से ज़्यादातर शिया थे.

बड़ी लड़ाई की निशानी

जहां पहले अलीशान घर होते थे अब वहां गोलियों से छिदी दीवारों, जली हुई कारों और दुकानों के अलावा कुछ नहीं बचा. यह एक बड़ी लड़ाई की निशानी है.

सऊदी अरब के शिया समुदाय के लोग सालों से शिकायत करते रहे कि सुन्नी शासन में उनके साथ भेदभाव और उत्पीड़न हो रहा है. लेकिन प्रदर्शनों को हमेशा जबरन शांत करा दिया गया.

बर्लिन स्थित यूरोपीय-सऊदी मानवाधिकार संगठन के डायरेक्टर अली अदुबिसी ने कहा, ''सऊदी अरब के शासक विपक्ष को नहीं मानते चाहे वह शिया हो या सुन्नी. वे सिर्फ असहिष्णु हैं.''

जैसे मैं अवामिया में घूमी, मैंने खंडहरों के पास कुछ बुलडोज़र खड़े देखे.

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मई में, प्रशासन ने 400 साल पुराने अल-मुसावरा इलाक़े को ढहाना शुरू किया था. इसे 'विकास प्रोजेक्ट' नाम दिया गया था.

कार्यकारी मेयर इस्साम अब्दुल्लातिफ़ अल-मुल्ला ने मुझे बताया, ''80 घर गिरा दिए गए. अभी 400 और हैं जो गिराए जाने हैं. ये काफी पुरानी इमारतें थी, इन्हें आधुनिक बनाना ज़रूरी था.''

उन्होंने कहा,''परिवारों को मुआवजा और बदले में घर देकर फिलहाल यहां से हटा दिया गया है.''

सील कर दिए गए थे रास्ते

जैसे ही घरों को गिराए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई, अवामिया में हिंसा भड़क उठी. शिया समुदाय ने पुलिस पर लोगों को ज़बरन निकलने को मज़बूर करने का आरोप लगाया.

एक्टिविस्ट कहते हैं कि पुलिस ने कस्बे में आने-जाने के रास्ते जुलाई में सील कर दिए और बचे हुए लोगों को दवा जैसी ज़रूरी चीज़ों के लिए भी मना कर दिया गया.

हिंसा में 20 से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए हैं, उनमें से एक तीन साल का बच्चा भी है जो बुधवार को जान गवां बैठा. इनके अलावा पांच लड़ाके भी मारे गए.

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सऊदी प्रशासन के मुताबिक़, हिंसा में अब तक आठ पुलिस अधिकारी और स्पेशल फोर्स के चार जवान मारे गए हैं. हालांकि प्रशासन ने आम नागरिकों या लड़कों के मारे जाने के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी.

गृह मंत्रालय ने अशांति के लिए ''इलाक़े में सालों से रह रहे आतंकी संगठनों'' को ज़िम्मेदार ठहराया है.

एक बयान में कहा गया कि सरकारी फ़ोर्सेज पर लगातार रॉकेट के जरिए ग्रेनेड और मशीन गन से हमला किया गया. आतंकियों ने लगातार आम नागरिकों की हत्या की और उन्हें ढाल बनाया.

सरकार ने कहा कि लोग इसलिए आरोप लगा रहे हैं क्योंकि लड़ाकों ने उन्हें धमका रखा है. लेकिन कहानी दूसरा पहलू भी है.

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मैं किसी तरह एक व्यक्ति तक पहुंचने में कामयाब रही जो हाल ही में अलामिया से भागे हैं और अब जर्मनी में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ''सुरक्षाबल सबको मार देंगे. पुरुष, महिला, बुजुर्ग और यहां तक कि बच्चे भी. कई दिन तक मैं घर से बाहर नहीं निकला. मैं काफी डरा हुआ था.''

उन्होंने हमसे गुजारिश की कि हम उनकी पहचान न ज़ाहिर करें क्योंकि उनको अपनी जान का ख़तरा है.

उन्होंने मुझे बताया कि निजी तौर पर उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाए लेकिन उन्हें यह पता है कि कुछ लोगों ने यह रास्ता क्यों चुना.

''आपको सऊदी अरब में फांसी की सज़ा सिर्फ इसलिए भी दी जा सकती है कि आप शिया हो और आपकी मज़हबी मान्यताएं अलग है.''

''लोग अपनी आज़ादी और इज्ज़त के लिए घबराए हुए हैं और एकतरफ़ा सुनवाई में किसी को मौत की सजा भी दी जा सकती है. वे हमेशा चुप नहीं रहेंगे, आप मुड़कर फायर करेंगे.''

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उस शख्स ने बताया कि शिया समुदाय के प्रदर्शन की शुरुआत 2011 में हुई थी, जब अरब की सड़कों पर शासन के ख़िलाफ़ एक साथ लोग सड़क पर उतर आए.

उन्होंने कहा, ''हम शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन सुरक्षाबलों ने हथियारों का प्रयोग करके हमें हटाने की कोशिश की.''

तभी से, सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार किया गया. मानवाधिकार समूह कहते हैं आतंकवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के लिए विशेष आपराधिक अदालतें बनाई गईं जिन्होंने तीन दर्जन पुरुषों और लड़कों को झूठे आरोपों में दोषी ठहराकर मौत की सज़ा दे दी गई.

ज़िंदगी का वापस आना बेहद मुश्किल

एक्टिविस्ट मानने हैं कि 14 प्रदर्शनकारी जिनमें से चार को उन आरोपों में दोषी ठहराया गया जो उन्होंने नाबालिग होने के समय किए थे, उन्हें कभी भी मौत दी जा सकती है.

इनमें से एक जाने-माने शिया धर्मगुरु और सरकार के आलोचक शेख निमर बक़ीर अल-निमर के भतीजे का भी नाम शामिल है. उन्हें जनवरी 2016 में आतंकवाद का दोषी ठहराया गया था और मौत की सजा दी गई थी.

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असामिया की हमारी छोटी यात्रा गोलीबारी की वजह से प्रभावित हुई. ये फायरिंग थोड़ी दूर से की गई थी. हमें नहीं पता कि फायरिंग पुलिस ने की या किसी और ने लेकिन हमें वो जगह छोड़नी पड़ी. जैसा कि कमांडर ने हमें कहा था.

रास्ते में मैंने कार की खिड़की से देखा तो हैरान रह गई कि क्या कभी इन खंडहरों में ज़िंदगी वापस आ पाएगी. यह कहना बहुत मुश्किल है क्योंकि हिंसा के कारण अब भी यहां मौजूद हैं.

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