राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा- 'अफ़ग़ानिस्तान से वापस नहीं आएगी अमरीकी सेना'

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप

अमरीका ने कहा है कि वो फिलहाल अफ़ग़ानिस्तान से सेना वापस नहीं बुलाएगा.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि जल्दबाज़ी में अफ़ग़ानिस्तान से सेना की वापसी आतंकवादियों को मौका दे देगी. उन्होंने कहा शुरुआत में उन्हें यह लगता था कि अमरीकी सेना को वापस बुलाया जाना चाहिए, लेकिन इराक में की गई गलतियों से बचने के लिए उन्होंने सेना को वहां "जीत पाने तक" बनाए रखने का निर्णय लिया.

अमरीकी सेना की अफगानिस्तान से कब वापसी होगी, इस पर ट्रंप ने कहा कि वो इसकी समयसीमा तय नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि वो समय और जमीनी स्थितियों के आधार पर बदलाव करना चाहते हैं.

राष्ट्रपति ट्रंप ने साथ ही कहा, "अमरीका वहां अफ़ग़ानिस्तान सरकार के साथ ही काम करता रहेगा, हम उनकी प्रतिबद्धता और प्रगति देखेंगे."

हालांकि, अमरीकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि यह अफ़ग़ानिस्तान के लिए "ब्लैंक चेक" नहीं है.

अमरीकी राष्ट्रपति के इस फ़ैसले पर तालिबान ने यह कहते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की कि अगर अमरीकी सेना की वापसी नहीं हुई तो अफ़ग़ानिस्तान "एक और कब्र" बन जाएगा.

अफगानिस्तान-पाकिस्तान का झगड़ा क्या है

तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में की पेड़ लगाने की अपील

अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट का कितना रौब

इमेज कॉपीरइट Reuters

क्या है नई रणनीति?

राष्ट्रपति ट्रंप अफगानिस्तान में अमरीकी सेना के कामों को लेकर बहुत प्रतिबद्ध हैं, लेकिन इसकी उन्होंने ज़्यादा जानकारी नहीं दी.

उन्होंने कहा कि उनका यह नया दृष्टिकोण आदर्शवादी और अधिक व्यावहारिक होगा, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वहां कितने अतिरिक्त सैनिक तैनात किए जाएंगे और साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना की उपस्थिति को ख़त्म करने की समय सीमा भी नहीं दी.

हालांकि, उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान पर दबाव डालते हुए चेतावनी दी कि अमरीका अब इसे चरमपंथियों के लिए "सुरक्षित पनाहगाह" के तौर पर बर्दाश्त नहीं करेगा, इस आरोप को पाकिस्तानी सेना ने फ़ौरन ही ख़ारिज कर दिया.

इसके साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने पहली बार तालिबान के लिए शांति समझौते के लिए दरवाजा खुला रख दिया. उन्होंने कहा, "प्रभावी सैन्य प्रयासों के बाद संभव है कि किसी दिन इसका राजनीतिक समाधान भी हो जिसमें अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद तालिबान भी रहे."

ट्रंप ने यह भी कहा कि अल क़ायदा और तथाकथिक इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में और तेज़ी आएगी. उन्होंने कहा, "वो यह जान लें कि उनके पास छुपने की जगह नहीं होगी, अमरीकी हथियारों से बचा नहीं जा सकता."

इस बीच, ट्रंप ने भारत की ओर इशारा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि वो अपने वर्तमान सहयोगियों से इस नई रणनीति का समर्थन करने की उम्मीद करते हैं, और साथ ही इन सहयोगी देशों को योगदान बढ़ाने पर भी जोर दिया.

क्या ट्रंप अचानक पलट गए हैं?

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption ट्रंप की बेटी इवांका, पत्नी मेलानिया और उप-राष्ट्रपति माइक पेंस ने यह भाषण देखा

राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रंप ने अफगान नीति पर अपने पूर्ववर्तियों की आलोचना करने में कभी कोताही नहीं बरती. उन्होंने पहले अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाए जाने का समर्थन किया था, जो अमरीका में 9/11 के आतंकी हमलों के बाद 2001 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल से ही वहां हैं.

राष्ट्रपति अभियान के अपने शुरुआती दौर में, उन्होंने स्वीकार किया कि अफ़ग़ान सरकार को पूरी तरह से पतन से बचाने के लिए वहां अमरीकी सैनिकों को रहना होगा.

राष्ट्रपति ट्रंप की यह दीर्घप्रतीक्षित घोषणा एक महीने की लंबी समीक्षा के बाद आई है, राष्ट्रपति ने ख़ुद स्वीकार करते हुए कहा कि उन्होंने सेना वापस बुलाने की अपनी मूल सोच को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ विचार के बाद पलट दिया है.

क्या ट्रंप को होगा नुकसान?

अलीम मक़बूल, बीबीसी उत्तर अमरीका के वाशिंगटन में संवाददाता

कागज़ पर, वो अमरीकी जिन्हें राष्ट्रपति ट्रंप की इन नई रणनीति से बड़ी समस्या हो सकती है, वो लोग हैं जिन्होंने उनके पक्ष में मतदान किया था.

उन्हें बताया गया था कि डोनल्ड ट्रंप "अमरीका फ़र्स्ट" की नीति पर ध्यान देंगे, लेकिन अब वो कह रहे हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में एक जीत चाहते हैं जिससे अब तक के सभी बलिदान सार्थक हों.

वो इस लक्ष्य को कैसे पाएंगे इस पर भी उन्होंने स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा.

यह जानना भी मुश्किल है कि मामूली रूप से सेना को बढ़ाने से ऐसा क्या हासिल होगा जो बराक ओबामा के समय में नहीं हुआ था.

यह भी स्पष्ट नहीं है कि वो किस आधार पर एक ओर तो भारत से अफ़ग़ानिस्तान में अपनी भूमिका बढ़ाने को कहते हुए दूसरी ओर पाकिस्तान से अधिक सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं.

क्या हैं प्रतिक्रियाएं?

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption राष्ट्रपति ट्रंप की घोषणा को अफगानिस्तान में भी देखा गया

अमरीकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने एक बयान में कहा कि कई अमरीकी सहयोगी वहां सैनिकों की संख्या बढ़ाए जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

उनके ब्रिटिश समकक्ष सर माइकल फ़ॉलन ने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी प्रतिबद्धता का "बहुत स्वागत" है. इसके साथ ही उन्होंने कहा, "हमें अफ़ग़ानिस्तान के दुर्बल लोकतंत्र की मज़बूती और पश्चिम में चरमपंथ के ख़तरे को रोकने में मदद करने के लिए वहां रहना है."

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी और अंतरराष्ट्रीय सेनाओं के प्रमुख जनरल जॉन निकोलसन ने कहा, "नई रणनीति का मतलब है कि तालिबान सैन्य ताकत के बल पर नहीं जीत सकता."

लेकिन तालिबान के प्रवक्ता ज़बैउल्लाह मुजाहिद ने ट्रंप की नीतियों को "कुछ भी नया नहीं" कहते हुए ख़ारिज कर दिया. उन्होंने एएफपी से कहा कि अमरीका को युद्ध के बजाय बाहर निकलने की रणनीति पर सोचना चाहिए.

तालिबान के ख़िलाफ़ अमरीकी कार्रवाई 2014 में ही आधिकारिक तौर पर ख़त्म हो गई थी, इसके बाद अफगान सेनाओं को सहयोग करने के लिए यहां 8,000 के करीब स्पेशल फ़ोर्स बने रहे.

तब से यहां विद्रोही समूहों के ख़िलाफ़ अफ़ग़ान सरकार की लड़ाई जारी है और केवल आधे देश पर उसका नियंत्रण है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)