रोहिंग्या पर मलाला के बयान से भड़का चीनी मीडिया

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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित पाकिस्तान की मलाला यूसुफ़ज़ई ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ जारी हिंसा पर चार सितंबर को एक बयान दिया था.

इस बयान में मलाला ने कहा था कि जब भी वह म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की पीड़ा की ख़बरें देखती हैं तो वह अंदर से दुखी हो जाती हैं.

मलाला ने अपने बयान में आगे लिखा, ''हिंसा थमनी चाहिए. मैंने म्यांमार के सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए छोटे बच्चे की एक तस्वीर देखी. इन बच्चों ने किसी पर हमला नहीं किया था लेकिन इन्हें बेघर कर दिया गया. अगर इनका घर म्यांमार नहीं है तो ये पीढ़ियों से कहां रह रहे थे?''

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मलाला ने आगे लिखा है, ''रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार नागरिकता दे. दूसरे देशों को भी जिसमें मेरा देश पाकिस्तान भी शामिल है. उसे बांग्लादेश की तरह विस्थापित रोहिंग्या मुस्लिमों को ज़रूरी चीज़ें मुहैया करानी चाहिए.''

मलाला ने लिखा है, ''मैं पिछले कई सालों से लगातार इस त्रासद और शर्मनाक व्यवहार की निंदा करती रही हूं. मैं अब भी नोबेल सम्मान से सम्मानित आंग सान सू ची की तरफ़ से कोई ठोस क़दम उठाए जाने का इंतज़ार कर रही हूं. इसके लिए पूरी दुनिया के साथ रोहिंग्या भी इंतज़ार कर रहे हैं.''

मलाला ने बयान ट्विटर पर जारी किया था. इस बयान की प्रतिक्रिया में उन्हें कई लोगों ने घेरा भी. कई लोगों ने कहा कि मलाला बिना हक़ीक़त जाने इस मसले पर बयान दे रही हैं. कुछ लोगों ने यह भी कहा कि क्यों नहीं वो पाकिस्तान सरकार से कहती हैं कि रोहिंग्या के लिए दरवाज़ा खोले.

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अब इस मामले में चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भी मलाला को घेरा है. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''मलाला को अपनी फेलो नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची की अलोचना करने से पहले रखाइन प्रांत में हिंसा से जुड़े तथ्यों को जानना चाहिए."

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''इस संकट को मुस्लिम चरमपंथियों ने पैदा किया है. इन्होंने म्यांमार में सरकारी बलों पर हमला शुरू किया था. आगे चलकर म्यांमार के सुरक्षाबलों को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी. अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिम और बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच जातीय और धार्मिक संघर्ष की ज़मीन लंबे समय से तैयार हो रही थी.''

ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि जिस तरह से मलाला को अपने देश के कई मुद्दों के बारे में पता नहीं रहता है उसी तरह से इस समस्या के बारे में भी उनकी अधूरी जानकारी है. चीन के इस सरकारी अख़बार ने लिखा है, ''म्यांमार में रोहिंग्या संकट काफ़ी जटिल है और इसका समाधान छोटे समय में नहीं किया जा सकता है.''

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ग्लोबल टाइम्स ने मलाला को लेकर आगे लिखा है, ''मलाला को तालिबान के साथ निडर होकर लड़ने के लिए नोबेल दिया गया था. मलाला ख़ुद ही आतंकवाद से पीड़ित रही हैं. उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर मुस्लिम आतंकवादियों के बारे में सोचना चाहिए. मुस्लिम अतिवादी समूह और कथित इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन दुनिया भर में कई हमलों के लिए ज़िम्मेदार हैं.''

ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है, ''म्यांमार में चरपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को लेकर मलाला बिल्कुल बेख़बर हैं. उन्हें म्यांमार की स्थिति के बारे में पढ़ना चाहिए. सू ची के ख़िलाफ़ मलाला की अलोचना बिल्कुल अनुचित है. शांति के अग्रदूत बनने के मुक़ाबले अभी मलाला को बहुत सीखने की ज़रूरत है. 2012 में मलाला की मुस्लिम चरपंथियों ने लगभग हत्या कर दी थी और उन्हें मुस्लिम चरमपंथियों को पहले निशाने पर लेना चाहिए.

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मलाला के इस बयान पर भारत में भी लोगों की प्रतिक्रिया सामने आई है. वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने मलाला पर निशाना साधते हुए लिखा है, ''अन्य नोबेल विजेताओं की तरह मलाला ने भी पाकिस्तानी आर्मी जो बलूचिस्तान में कर रही है उसकी निंदा करते कभी नहीं सुना.''

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