रोहिंग्या मुसलमानों पर भारत-चीन क्यों हुए साथ?

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डोकलाम संकट को अभी ज़्यादा समय नहीं बीता है जब दोनों देशों के बीच जमकर ज़ुबानी जंग हुई थी. लेकिन म्यांमार में रोहिंग्या के मुद्दे पर दोनों देश साथ आ गए हैं. अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद दोनों देशों ने म्यांमार के साथ सहानुभूति जताई है.

25 अगस्त को अराकन रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (एआरएसए) ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में 30 पुलिस चौकियों को निशाना बनाया था. इसमें कम से कम 10 पुलिस अधिकारियों, एक सैनिक और एक इमिग्रेशन अधिकारी की मौत हुई थी.

इस हमले के बाद म्यांमार सरकार ने एआरएसए को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था. म्यांमार ने ऐसा आतंक निरोधी क़ानून के सब-सेक्शन पांच और सेक्शन 6 के तहत किया था.

इसके बाद वहां की सरकार ने 'क्लियरेंस ऑपरेशन' चलाया था. कहा जा रहा है कि इस ऑपरेशन के कारण क़रीब तीन लाख रोहिंग्या मुसलमानों को विस्थापित होना पड़ा.

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10 सितंबर को एआरएसए ने एक महीने के लिए युद्धविराम की घोषणा की. हालांकि म्यांमार की सरकार ने इस युद्धविराम को ख़ारिज कर दिया. इस युद्धविराम पर म्यांमार के डायरेक्टर ऑफ़ द स्टेट काउंसलर ने ट्वीट कर कहा था, ''हम लोगों की आतंकियों से बातचीत की नीति नहीं है.''

11 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त ज़ेड राड अल-हुसैन ने रोहिंग्या संकट पर म्यांमार की कड़ी निंदा की. उन्होंने अपने बयान में कहा था, ''म्यांमार में जैसे हालात हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि यह किसी टेक्स्टबुक में मिसाल की तर्ज पर जातीय नरसंहार है. मैं म्यांमार की सरकार से अपील करता हूं कि वह वर्तमान में जिस क्रूर सैन्य कार्रवाई को अंजाम दे रहा है उसे तत्काल रोके.''

संयुक्त राष्ट्र की इतनी कड़ी आलोचना के बावजूद चीन म्यांमार के साथ बना हुआ है. 12 सितंबर चीन के विदेश मंत्रालय से नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोहिंग्या संकट पर चीन के रुख के बारे में पूछा गया था.

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इस पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने कहा था, ''म्यंमार के रखाइन प्रांत में हुए हिंसक हमले की चीन कड़ी निंदा करता है. हम म्यांमार की उन कोशिशों का समर्थन करते हैं जिसके तहत वह रखाइन में शांति और स्थिरता बहाल कर रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि रखाइन में जल्द ही जनजीवन पटरी पर आ जाएगा.''

इसके साथ ही गेंग ने ज़ोर देकर यह भी कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को म्यांमार का समर्थन करना चाहिए. चीन की तरह भारत भी इस मसले पर म्यांमार के साथ खड़ा दिखा. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी म्यांमार के दौर पर गए थे.

पीएम मोदी ने कहा था कि भारत उसकी चिंताओं के साथ खड़ा है. मोदी ने कहा था, ''रखाइन प्रांत में चरमपंथी हिंसा और ख़ासकर सुरक्षबलों के ख़िलाफ़ हमले में निर्दोष लोगों की जान गई है.'' इससे पहले पांच सितंबर को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजीजू ने कहा था कि भारत से रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजा जाएगा.

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आख़िर भारत और चीन दोनों रोहिंग्या के मसले पर म्यांमार के साथ क्यों हैं? रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में भारत के रुख का समर्थन करते हुए पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने बीबीसी से कहा था कि म्यांमार रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफ़ी अहम है.

सिब्बल का कहना है कि म्यांमार भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है. उनका कहना है कि म्यांमार में चीन का प्रभाव पहले से ही बढ़ चुका है ऐसे में भारत अब और देरी नहीं कर सकता है. सिब्बल का कहना है बौद्धों के कारण का भारत और म्यांमार के सांस्कृतिक संबंध भी हैं.

कई विश्लेषकों का मानना है कि म्यांमार से भारत और चीन दोनों के हित जुड़े हुए हैं. सिब्बल का कहना है कि 90 के दशक में म्यांमार और चीन के संबध गहराते गए और भारत पिछड़ता गया. आख़िर दोनों देशों के म्यांमार से हित क्या हैं? क्या म्यांमार में चीन से मुकाबला करने के लिए भारत रोहिंग्या मसले पर उसके साथ है?

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रोहिंग्या पर भारत के रुख की चर्चा बांग्लादेश में भी ख़ूब हो रही है. रोहिंग्या मुस्लिम संकट से सबसे ज़्यादा प्रभाव बांग्लादेश पर ही पड़ रहा है. बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और रिसर्चर अफसान चौधरी ने ढाका ट्रिब्यून से बातचीत में इसी बात का उल्लेख किया है कि चीन और भारत के म्यांमार से हित जुड़े हुए हैं.

चौधरी ने कहा, ''भारत म्यांमार में सामरिक और ट्रेड संबंधों को बढ़ाना चाहता है. आपका जब किसी देश से सैन्य संबंध अच्छा है, इसका मतलब यह कि आपका ट्रेड संबंध भी अच्छा होगा. चीन और भारत दोनों म्यांमार में ऐसा चाहते हैं. भारत चाहता है कि म्यांमार की सेना नगा विद्रोहियों के ख़़िलाफ़ काम करे.''

चौधरी कहते हैं, ''भारत म्यांमार की सेना को हथियार और वित्तीय मदद भी मुहैया करा रहा है. भारत चाहता है कि म्यांमार की मदद से नगा विद्रोहियों को निपटा दिया जाए. दूसरी तरफ़ चीन म्यांमार को इसलिए मदद कर रहा कि वह शान और कचेन्स समस्या को ख़त्म कर सके. शान और कचेन्स का चीन में काफ़ी प्रभाव है. भारत म्यांमार में पांव पसारने की कोशिश कर रहा है जबकि चीन पसार चुका है.''

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