कोरिया में कैसे रहते हैं अफ़्रीकी मूल के लोग?

रवि जोनाथन और हान

तस्वीर में दिख रहे अफ़्रीकी मूल के इन तीन युवाओं के साथ ख़ास बात यह है कि ये सभी दक्षिण कोरिया में रहते हैं.

हान ह्यूं मिन सियोल के इतेवॉन में मॉडलिंग करते हैं.

हान के मुताबिक़ ''पहले इतेवॉन के प्राथमिक स्कूल में कोई विदेशी छात्र नहीं दिखता था लेकिन अब अगर आप उस स्कूल जाएं तो एक तिहाई छात्र अश्वेत हैं. मुझे तो एक बार के लिए लगा कि यह विदेशियों का स्कूल है.''

दक्षिण कोरिया में विदेशियों की संख्या पिछले कुछ साल में काफ़ी बढ़ी है.

साल 2012 में वहां 14 लाख 50 हज़ार विदेशी रहते थे जो 2016 तक बढ़कर 20 लाख से भी ज़्यादा हो गए. यानी पिछले पांच साल में कोरिया में विदेशियों की संख्या में 9.26 फ़ीसदी (सालाना) की दर से बढ़ोतरी हुई है.

हालांकि इनकी रिहाइश हर इलाक़े में एक जैसी नहीं है. कोरिया में रहने वाले दूसरे अश्वेत जोनाथन के मुताबिक़ ''हान ह्यूं मिन के शहर सिओल में 260,000 विदेशी रहते हैं लेकिन मेरे और रवि के शहर ग्वांगजू में सिर्फ़ 21 हज़ार.''

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कोरिया में रहने वाले अश्वेत लोगों को कई बार नस्ल से जुड़े तंज़ भी सुनने को मिलते हैं.

हान को लगता है कि लोगों को ऐसा कुछ भी कहने से पहले सोचना चाहिए कि क्या वो ऐसा सुनना पसंद करेंगे. ''लोग जब अश्वेत लोगों को देखते हैं तो वे और ज़्यादा ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. यह हम लोगों के लिए एक ख़राब शब्द है जिसे हम सुनना नहीं चाहते.''

ऐसा नहीं है कि इसे रोकने के लिए क़ानून नहीं है. अगर साबित हो जाए कि किसी बात से किसी व्यक्ति की सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचा है तो कहने वाले पर मानहानि का मुक़दमा चलाया जा सकता है.

''यहां हमारी हालत वैसी ही है जैसे अफ़्रीका में बीबीसी की या ब्रॉडकास्ट मीडिया या संगीत उद्योग की है.'' जोनाथन अफ़्रीका में प्रेस की कमज़ोर मौजूदगी का सहारा लेकर अपनी बात साफ़ करते हैं.

चैरिटी संस्था सेव द चिल्ड्रन के एक सर्वे के मुताबिक़ कोरिया के अख़बार और ब्रॉडकास्ट मीडिया ज़्यादातर पूर्व-आधुनिक राजनीति से प्रेरित हैं. जिससे वहां के लोगों के हालात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

डॉक्यूमेंट्री और चंदा मांगने वाले कार्यक्रमों में से 98 प्रतिशत से भी ज़्यादा कार्यक्रमों में लोगों की निजी कहानियां या कुछ ख़ास लोगों या परिवारों की कहानियां दिखाई जाती हैं.

लेकिन जोनाथन कहते हैं कि ''ऐसे कार्यक्रम ख़ास तौर पर चंदा मांगने वाले कार्यक्रमों में अफ़्रीकी लोगों को नाकारा और परेशानियों का हल ढूंढने में नाक़ाम लोगों की तरह दिखाया जाता है.''

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स्कूल से लौटते वक़्त परेशान करते थे बच्चे

रवि और जोनाथन के परिवार शरणार्थी परिवार हैं. उनके पिता योम्बी टोना कांगो से भागकर कोरिया आए थे. आज वे वहां ग्वांगजू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं.

सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट में रवि और जोनाथन के उन अनुभवों का भी ज़िक्र है जिसमें उन्होंने बताया कि स्कूल से लौटते वक़्त स्थानीय बच्चे उनका इंतज़ार करते थे जिससे उन्हें परेशान कर सकें या पीट सकें.

एक मेडिकल जर्नल में छपी डॉक्टर योन वू-टेक की रिसर्च के मुताबिक़ शरणार्थी लोगों को कई तरह की मानसिक परेशानियां हो जाती हैं.

एक और रिपोर्ट में सामने आया कि 18 फ़ीसदी शरणार्थी दिमागी बीमारी के शिकार हैं जिनमें से 5-5 फ़ीसदी गंभीर रूप से अवसाद में हैं.

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