चीन की 'चेक डिप्लोमेसी', चक्रव्यूह में भारत?

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श्रीलंका में बीते रविवार यानी 17 दिसंबर को राजधानी कोलंबो का एक विवाह समारोह पूरी दुनिया के लिए उत्सकुता की वजह बना हुआ था.

चीनी, पश्चिमी और श्रीलंका के पारंपरिक परिधान में सजीं पचास महिलाएं अपने मंगेतरों के साथ शादी करने चीन से कोलंबो आईं थीं.

समारोह में हिस्सा लेने के लिए चीनी अधिकारी और श्रीलंका के मंत्री मौजूद थे. श्रीलंका सरकार के एक मंत्री पटाली रानावाका ने कहा कि ऐसे आयोजनों से 'श्रीलंका और चीन के सांस्कृतिक संबंध मजबूत होंगे और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा.'

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दोस्ती का मक़सद?

चीन और श्रीलंका के कूटनीतिक संबंधों के साठ साल पूरे होने के मौके पर आयोजित सामूहिक शादी समारोह की टाइमिंग एक और लिहाज से अहम है.

शादी समारोह के ठीक एक हफ़्ते पहले यानी शनिवार, नौ दिसंबर को श्रीलंका ने चीन को 99 साल के पट्टे पर हंबनटोटा पोर्ट सौंप दिया.

ये बंदरगाह सामरिक नजरिए से बेहद अहम है. इसके एक तरफ मध्य पूर्व और अफ्रीका का रास्ता है तो दूसरी तरफ है दक्षिण पूर्व एशिया. ये दक्षिण एशिया को भी जोड़ता है.

इस बंदरगाह को लेकर हुए समझौते का श्रीलंका में बड़ा विरोध हुआ था जिसके बाद पट्टे की शर्तें बदलनी पड़ी.

सात साल पहले 1.3 अरब डॉलर की कीमत से तैयार पोर्ट के लिए रकम चीन ने मुहैया कराई थी.

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चीन की 'चेक डिप्लोमेसी'

पहले के समझौते के मुताबिक चीन की स्वामित्व वाली कंपनी की हिस्सेदारी अस्सी फ़ीसदी थी.

नई योजना का खाका जुलाई 2017 में तैयार किया गया. अब चीन की सरकारी नियंत्रण वाली कंपनी का सत्तर फीसद स्वामित्व है. इस संयुक्त उपक्रम में श्रीलंका की सरकारी पोर्ट्स अथॉरिटी भी शामिल है.

श्रीलंका का कहना है कि 1.1 अरब डॉलर के इस समझौते से उसे विदेशी कर्ज़ चुकाने में मदद मिलेगी तो चीन इसे अपनी महत्वाकांक्षी 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना के लिए अहम बता रहा है.

चीन की तरफ़ से श्रीलंका को आश्वासन दिया गया है कि वह बंदरगाह का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक रूप से करेगा. लेकिन विश्लेषक इसे हिंद महासागर में चीन के बढ़ते दबदबे के तौर पर देख रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सी राजामोहन कहते हैं, "छोटे छोटे देश जहां पर हैं, चीन वहां पर कूटनीतिक दबदबा बढ़ाने में लगा हुआ है. हमारे पड़ोस में भी और बाकी जगह भी."

वहीं, सामरिक मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन इस समझौते को चीन की 'चेक डिप्लोमेसी' बताते हैं.

वो कहते हैं, "चीन की रणनीति है कि इतना कर्ज़ दे दो कि दूसरा मुल्क कर्ज में डूब जाए और फिर जो चीन कहे, वही उस मुल्क को करना पड़े. ये जो कूटनीति है, ये भारत को निशाना बनाने के लिए नहीं है, ये उनकी अपनी सामरिक दृष्टि है, उसके हिसाब से ये हो रहा है. "

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Image caption बीती 7 दिसंबर को बीजिंग दौरे के दौरान मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने चीन के साथ संबंधों को अहम बताया

मालदीव में मुक्त व्यापार

हिंद महासागर में महज तीन सौ वर्ग किलोमीटर में फैले करीब 12 सौ द्वीपों वाले देश मालदीव से भी चीन की नजदीकी बढ़ रही है.

चीन मालदीव से आयात बढ़ा रहा है. चीन से पर्यटकों को मालदीव भेजकर अर्थव्यवस्था बेहतर बनाने में योगदान कर रहा है लेकिन ये मदद 'मुफ्त' नहीं.

फिलहाल भारत के साथ कर्नाटक में चल रहे 'एकुवरिन' यानी मैत्री नाम के आठवें संयुक्त सैन्य अभ्यास की शुरुआत के सिर्फ एक हफ्ते पहले यानी 7 दिसंबर को मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन बीजिंग में थे.

अपने पहले चीन दौरे के दौरान यामीन ने चीन के साथ मुक्त व्यापार संधि पर दस्तख़्त किए.

राष्ट्रपति यामीन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तारीफ करते हुए कहा, "आपके कुशल नेतृत्व में चीन ने कई अहम पहलकदमी की हैं. खासकर वन बेल्ट वन रोड मालदीव जैसे छोटे देशों के लिए उम्मीद की वजह है. हम इस दिशा में चीन के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं."

मालदीव के सबसे पुराने कूटनीतिक संबंध भारत के साथ हैं लेकिन मुक्त व्यापार संधि के लिए उसने चीन को तरजीह दी.

ऐसा क्यों, इस सवाल के जवाब में सी राजा मोहन कहते हैं, "छोटे-छोटे देश ये सीख गए हैं कि चीन से लेनदेन में उनका फ़ायदा है. गुटनिरपेक्षता का जो खेल पहले हम करते थे अमरीका और रूस के बीच में, अब हमारे छोटे पड़ोसी वही कर रहे हैं. ये दोस्ती की बात नहीं बल्कि कूटनीति है."

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संतुलन के लिए चीन का सहारा!

हालांकि सामरिक मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन इसे मालदीव की आंतरिक राजनीति से जोड़कर देखते हैं.

सरीन कहते हैं, " जब से यामीन आए हैं तब से वो चीन को ऐसे ही लुभाने में जुटे हैं. हमको याद रखना चाहिए कि एक एयरपोर्ट ठेका भी भारतीय कंपनी से छीन लिया गया था. हालांकि उसका मुआवज़ा उन्हें देना पड़ा था. उन्होंने चीन को एक द्वीप भी दे दिया है. यामीन के बारे में माना जाता है कि वो शायद पाकिस्तान के साथ साठगांठ करते हैं. कुछ हद तक वो चीन को भारत के खिलाफ संतुलन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन जब भी मालदीव को जरुरत पड़ती है तो उसे भारत की ओर देखना पड़ता है."

जरूरत के वक़्त मालदीव की मदद का भारत का पुराना इतिहास है.

साल 1988 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन कैक्टस के जरिए तत्कालीन राष्ट्रपति मामून अब्दुल गयूम की सरकार के तख्ता पलट की कोशिश को नाकाम किया था. उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे.

सी राजा मोहन कहते हैं कि अब वक्त काफी बदल गया है. " उस समय चीन कहां था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. ये सिर्फ मालदीव नहीं भारत के हर पड़ोसी देश में यही समस्या है. पहले सिर्फ पाकिस्तान में दिक्कत थी."

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Image caption साल 2015 में पाकिस्तान दौरे के दौरान इस्लामाबाद एयरपोर्ट पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

बढ़ी भारत की चिंता?

गौरतलब है कि पाकिस्तान के बाद चीन के साथ मुक्त व्यापार संधि करने वाला मालदीव दूसरा देश है.

भारत के आसपास समंदर में चीन की बढ़ती नजदीकी को लेकर सुशांत सरीन कहते हैं, "अगर चीन का एक बेस मालदीव में बन जाए एक ऐसे वक्त में जब वो ग्वादर में भी बेस बनाने की तरफ बढ़ रहा है. जिबूती में वो पहले ही बेस बना चुके हैं. तो भारत के लिए चिंता की बात तो है. इससे सारे अरब सागर और हिंद महासागर में उनका प्रभाव होगा."

मालदीव चीन के बीच समझौते की रणनीति अहमियत का भारत को भी अंदाज़ा है और शायद यही वजह है कि भारत को पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया देने में हफ़्ते भर का वक़्त लग गया.

हालांकि, मालदीव में संसद 'मजलिस' में 29 नवंबर को महज 10 मिनट में पास करा लिए गए इस बिल को लेकर पूर्व राष्ट्रपति और विपक्ष के नेता मोहम्मद नशीद सवाल उठा रहे हैं.

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Image caption ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ब्रिटेन और चीन के बीच 1 अरब डॉलर फंड वाले उपक्रम की अगुवाई करेंगे.

हर तरफ चीन का दम

लेकिन सी राजा मोहन की राय है कि इस विरोध के ज्यादा मायने नहीं. वो कहते हैं कि चीन की आर्थिक और सैन्य ताकत बहुत बढ़ गई है. उसका दबदबा ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय यूनियन तक है. अब ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री को अपना सलाहकार बनाकर चीन अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर रहा है.

सी राजमोहन कहते हैं, "जब आप डेविड कैमरन को अपना सलाहकार बना सकते हैं तो बताइये तो मालदीव या फिर श्रीलंका के राष्ट्रपति क्या होते हैं? वो यूरोप में जाकर सिक्सटीन प्लस वन डायलॉग कर रहे हैं. वो यूरोपीय यूनियन को तोड़ने में लगे हैं. मध्य एशिया में उनका प्रभाव बढ़ गया. पनामा नहर के नीचे निकरागुआ में एक नहर निकालना चाहते हैं. चीन जब दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन गया तो भारत के खिलाफ नहीं बल्कि हर जगह अपने प्रभाव को बढ़ाने में लगा हुआ है."

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सावधान हुआ श्रीलंका

लेकिन, जब बंगाल की खाड़ी में भारत, अमरीका और जापान के संयुक्त अभ्यास पर चीन नज़र रखता है तो क्या ये नई दिल्ली के लिए चिंता की बात नहीं?

इस सवाल पर सुशांत सरीन कहते हैं, "वो जो पनडुब्बियों से निगरानी करता है या अभ्यास देखता है, ये तो सारे देश करते हैं, लेकिन अगर चीन हिंद महासागर में ऐसा करता है तो क्षेत्र में वो अपनी पहुंच स्थापित कर लेता है. वो सारी दुनिया में वर्चस्व बनाने के लिए अमरीका के साथ मुक़ाबला कर रहा है, लेकिन भारत की सुरक्षा पर खतरा तो बनता है."

कई विश्लेषक दलाई लामा के हवाले से कहते हैं कि चीन के मुक़ाबले भारत की रणनीति सुस्त है लेकिन सुशांत सरीन की राय है कि भारत ने श्रीलंका को समझाया था कि हंबनटोटा समझौता उसके हित में नहीं है. अब श्रीलंका संतुलन साधने में लगा है.

वो कहते हैं, " हंबनटोटा प्रोजेक्ट को लेकर भारत की लंका को सलाह थी कि आप समझौता न करें. लेकिन चीन ने श्रीलंका को कर्ज़ के जाल में फंसा लिया. अब श्रीलंका संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. भारत को त्रिनकोमाली एयरपोर्ट का प्रोजक्ट दिया जा रहा है."

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क्या हो भारत की रणनीति?

चीन की परियोजनाओं का विरोध पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दूसरे सार्क देशों में भी हो रहा है. लेकिन सी राजा मोहन की राय में भारत से तीन गुना रक्षा बजट और पांच गुना जीडीपी वाले चीन का मुक़ाबला सही रणनीति से ही हो सकता है.

वो कहते हैं, "इस सरकार (नरेंद्र मोदी सरकार) ने कहा है कि पड़ोसी देश प्राथमिकता हैं लेकिन हम पड़ोसी देशों की आंतरिक राजनीति में दखल देने लगते हैं. श्रीलंका में तमिल का मुद्दा है. मालदीव में नशीद भारत के दोस्त हैं. नेपाल में मधेसियों के अधिकार बेहतर करना चाहते हैं. जब (पड़ोसी देश के) अंदर की जब बात होती है तो चीन के लिए जगह बन जाती है."

उधर, सुशांत सरीन की राय है कि भारत के पड़ोसी अब भी उस पर निर्भर हैं, लेकिन भविष्य में स्थितियां न बदलें इसके लिए कोशिश जरूरी है.

सरीन कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि चीन ने भारत की श्रीलंका, नेपाल या बांग्लादेश से दोस्ती पर सेंध लगाई है. आगे चलकर उनकी कोई और मजबूरी बने उसके पहले हमें संतुलन बनाने की कोशिश करनी पड़ेगी और ये देखना होगा कि वो हमारी तरफ झुकें."

लेकिन जिस वक्त दुनिया की तमाम दूसरी महाशक्तियां चीन के बढ़ते कदम रोकने में बेबस हैं, क्या भारत के पास कोई ऐसी रणनीति है जो चीन की आर्थिक मदद के समंदर में गोते लगाने को बेताब सार्क देशों के अपने दोस्तों को साथ रख सके. ये देखना अहम होगा.

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