मोदी पर क्यों मुग्ध हुआ चीन का सरकारी मीडिया?

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चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ में एक लेख छपा है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ़ की गई है.

इस लेख में 2017 को 'भारतीय राजनीति में ब्रांड मोदी का साल' कहा गया है.

लेख में लिखा है, 'इस साल हुए विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी बीजेपी के स्टार चेहरे और मास्टरस्ट्रोक की तरह उभरे, जो दिखाता है कि उनकी लोकप्रियता बीते कुछ साल में और बढ़ गई है.'

बीजिंग में छपे इस लेख में उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भाजपा की जीत का भी ज़िक्र किया गया है.

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देश हित में कठोर फैसले लेने वाली छवि

लेख कहता है, 'भारत के बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का मामला लीजिए. नोटबंदी के बाद हुआ इस राज्य का चुनाव मोदी सरकार के लिए एक इम्तेहान माना जा रहा था. इस राज्य के चुनाव इसलिए भी अहम थे क्योंकि लोकसभा की 80 और राज्यसभा की 31 सीटें इसी राज्य से आती हैं. यह संख्या राष्ट्रपति चुनाव में काफ़ी अहम भूमिका निभाती है. नोटबंदी के लिए मोदी सरकार की काफ़ी आलोचना की गई. कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने भी उन्हें घेरने की कोशिश की लेकिन बीजेपी ने 312 सीट के साथ शानदार जीत दर्ज की.'

भारत के तीन राजनीतिक विश्लेषकों की राय भी इस लेख में है. इसमें आगे कहा गया है, "मोदी बीजेपी का सबसे ताक़तवर हथियार इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने अपनी छवि एक ऐसे ज़बरदस्त टास्कमास्टर की बनाई है जो देश हित में कठोर फ़ैसले लेने से नहीं हिचकता."

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मोदी की तारीफ़ क्यों करेगा चीन?

भारत-चीन के रिश्ते इस साल डोकलाम को लेकर काफ़ी तनावपूर्ण रहे हैं. ऐसे में चीनी मीडिया की इस प्रशंसा के क्या कुछ कूटनीतिक अर्थ भी हो सकते हैं? हमने यही सवाल बीजिंग में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता से पूछा.

सैबल के मुताबिक़, ''बीजिंग को पता है कि जो सड़कें, ट्रेन वो बेचना चाहते हैं उनके लिए भारत से बड़ा कोई बाज़ार नहीं है. बीजिंग को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान, म्यांमार, नेपाल बांग्लादेश, भूटान जैसे देशों में वो समय बर्बाद कर रहे हैं.''

वह कहते हैं, ''उन्हें पता है कि जो पैसा वो लगा रहे हैं वो डूब रहा है, कभी वापस नहीं आएगा. पाकिस्तान अमरीका का पैसा नहीं चुका पाया, बीजिंग के 50 बिलियन डॉलर कैसे चुकाएगा. चीन का अमरीका और यूरोप में व्यापार घट रहा है. ऐसे में नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करके उन्हें फ़ायदा मिल सकता है.''

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'चीन की सरकार की सहमति रही होगी'

लेकिन क्या शिन्हुआ में छपे एक लेख को चीन की आधिकारिक राय माना जा सकता है?

जेएनयू की भारत-चीन मामलों की विशेषज्ञ अलका आचार्य के मुताबिक़, ''इसे सरकारी कहना ग़लत होगा लेकिन यह भी सच है कि चीन में सरकार की नज़र बचाकर ऐसा कोई लेख नहीं छापा जा सकता. इसलिए माना जा सकता है कि इस लेख में कही गई बातों पर सरकार की सहमति रही होगी.''

हालांकि यह पहला मौक़ा नहीं है जब चीन में नरेंद्र मोदी को ताक़तवर नेता कहा गया हो.

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'चीन में ताक़तवर नेता माने जाते हैं मोदी'

प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले चीन दौरे में नरेंद्र मोदी का ज़बरदस्त स्वागत किया गया था. सैबल दासगुप्ता बताते हैं कि ऐसा अक्सर नहीं होता है कि चीन में किसी का ऐसा 'राजा जैसा' स्वागत किया जाए.

वहां के मीडिया में नरेंद्र मोदी की शी जिनपिंग के साथ तुलना भी की गई. सैबल दासगुप्ता के मुताबिक़ ''चीन की कम्युनिस्ट सरकार कमज़ोर सरकारों के साथ डील नहीं कर सकती. चीन ने हमेशा मज़बूत सरकारों का समर्थन किया है. इसकी ताज़ा मिसाल ऑस्ट्रेलिया है.''

वह कहते हैं, ''ऑस्ट्रेलिया में एक टूटी हुई सरकार आई तो चीन के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए. 2014 में नरेंद्र मोदी जब पीएम बने, उस वक़्त उन्हें एक शक्तिशाली नेता के रूप में देखा गया. चीन में अब तक नरेंद्र मोदी की यही छवि चली आ रही है. इस लेख में भी मोदी सरकार की विदेश नीति पर बात नहीं की गई है. सिर्फ़ यह बताया गया है कि वे अपने विरोधियों को कैसे परास्त करते हैं. उनकी यह बात शी जिनपिंग से मिलती है.''

सैबल यह भी कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं समझना चाहिए कि इस एक लेख से भारत की विदेश नीति में कोई बदलाव आ जाएगा.

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