जीभ चटकाकर दुनिया देखते हैं ये

 सोमवार, 1 अक्तूबर, 2012 को 16:31 IST तक के समाचार
डेनियल किश

हमारे या आपके जैसे किसी सामान्य व्यक्ति के लिए थोड़े समय के लिए भी आंखे बंद करके कुछ क़दम चलना भी मुश्किल से भरा काम होता है, ऐसे में किसी दृष्टिहीन व्यक्ति का पैदल लंबे सफ़र पर निकलना सुनने में शायद असंभव सा लगे.

लेकिन बचपन से दृष्टिहीन होने के बावजूद अमरीकी नागरिक डेनियल किश बेहद सक्रिय ज़िंदगी बिताते हैं. वो हाइकिंग यानी पैदल लंबा सफ़र करते हैं और माउंटेन बाइकिंग भी करते हैं.

डेनियल के लिए ऐसा कर पाना आसान इसलिए है, क्योंकि उनको जीभ के चटकाने में महारथ हासिल है.

इस कला को ह्यूमन इकोलोकेशन कहते हैं यानी मानवीय प्रतिध्वनिस्थापन का वो तरीक़ा जिसमें डेनियल वापस लौटती ध्वनि तरंगों की मदद से अपने आसपास के परिवेश की मानसिक छवि बना लेते हैं.

कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले डेनियल किश ने बचपन से ही एक सोनार तकनीक विकसित की, जिसमें उन्होंने जीभ चटकाने से होने वाली प्रतिध्वनि का इस्तेमाल किया. इसी हुनर की वजह से उन्हें 'असली ज़िंदगी के बैटमैन' की संज्ञा भी मिली है.

चमगादड़ वाला तरीक़ा

वे कहते हैं, "यही तरीक़ा चमगादड़ भी इस्तेमाल करते हैं. आप एक ध्वनि निकालते हैं या आवाज़ देते हैं तो ध्वनि तरंगें किसी भी ठोस सतह से टकरा कर वापस आ जाती हैं. इसलिए जब एक व्यक्ति जीभ चटकाता है और वो सजग है तो उसे तुरंत आसपास की चीज़ों का ठिकाना, उनकी संरचना का पता चल जाता है."

इस क्रिया से डेनियल अपने आसपास की चीज़ों की दूरी, आकार, बनावट और घनत्व का पता लगा लेते हैं.

"आप एक ध्वनि निकालते हैं या आवाज़ देते हैं तो ध्वनि तरंगें किसी भी ठोस सतह से टकरा कर वापिस आ जाती हैं. इसलिए जब एक व्यक्ति जीभ चटकाता है और वो सजग है तो उसे तुरंत आस-पास की चीज़ों का ठिकाना, उनकी संरचना का पता चल जाता है."

डेनियल किश

वो कहते हैं, "देखिए, मैं धातु या लकड़ी में फ़र्क नहीं बता सकता लेकिन मैं इनकी संरचना में फ़र्क बता सकता हूं. जैसे, धातु की बाड़ की तुलना में लकड़ी से बने बाड़ का ढांचा थोड़ा मोटा होगा और जब आसपास बहुत शांति हो तो लकड़ी से ज़्यादा उष्ण और क्षीण प्रतिध्वनि निकलती है."

लेकिन डेनियल ये भी कहते हैं कि इतनी सटीक पहचान के लिए हालात भी बिल्कुल सही होने चाहिए.

इस तकनीक का नाम डेनियल ने 'फ़्लैशसोनार' रखा है और वे अब अपना पूरा समय दूसरे दृष्टिहीनों को इस तकनीक में प्रशिक्षित करने में लगाते हैं.

ये कोर्स, 'वर्ल्ड ऐक्सैस फ़ॉर द ब्लाइंड' नाम की एक ग़ैर-सरकारी संस्था चला रही है और इसे लगभग 25 देशों के 500 छात्र सीख चुके हैं.

डेनियल का काम बहुत हद तक बच्चों के प्रशिक्षण पर केंद्रित है, जिससे ये बच्चे छड़ी के साथ ही इकोलोकेशन का इस्तेमाल कर आत्मविश्वास और आज़ादी हासिल कर सके.

कम इस्तेमाल

मानवीय प्रतिध्वनिस्थापन कोई नई तकनीक नहीं है.

डेनियल किश

डेनियल किश बेहद सक्रिय ज़िंदगी बिताते हैं. वे हाइकिंग और माउंटेन बाइकिंग भी करते हैं.

बीबीसी पर विकलांगता विषय पर ब्लॉग लिखने वाली जन्म से दृष्टिहीन, ऐमा ट्रेसी कहती हैं कि दृष्टिहीन लोग ध्वनि का इस्तेमाल अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में करते ही हैं.

ये आकस्मिक प्रतिध्वनि हो सकती है या फिर प्रतिध्वनि पैदा करने के लिए जीभ चटका कर या छड़ी ठोक कर किया जा सकता है.

लेकिन ऐमा कहती हैं कि ध्वनि का इस्तेमाल करने की अपनी सीमाएं हैं. वे कहती हैं, "अगर बर्फ़ पड़ रही है तो ऐसे में चलना-फिरना बेहद मुश्किल हो जाता है."

साथ ही ये भी देखा गया है कि बहुत कम दृष्टिहीन लोग ही एक्टिव या सक्रिय इकोलोकेशन का उतना इस्तेमाल कर रहे हैं जितना की डेनियल किश या उनके जैसे कुछ और लोग.

'द रॉयल लंदन सोसाइटी फ़ॉर ब्लाइंड पीपल' भी इकोलोकेशन का प्रशिक्षण देती है. लेकिन इससे जुड़े डॉक्टर टॉम पे मानते हैं कि ये तरीक़ा हर किसी के लिए नहीं है.

डॉक्टर पे कहते हैं, "हम सब वो नहीं कर सकते जो डेनियल कर रहे हैं लेकिन उन्होंने हमें दिखाया है कि क्या हो सकता है. मैं उनका सम्मान करता हूं. आगे भी वो इसी तरह से दृष्टिहीन लोगों को प्रेरित करते रहें."

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.