मिस्र में बढ़ता कट्टरपंथी इस्लाम

मिस्र
Image caption मिस्र में सलाफियों का असर बढ़ा है जिसे लेकर कई हलकों में चिंता है

अमरीका में बनी एक विवादित इस्लाम-विरोधी फ़िल्म के ख़िलाफ़ दुनिया भर में पिछले दिनों काफ़ी प्रदर्शन हुए. इनमें से कई प्रदर्शनों का नेतृत्व सलफ़ी आंदोलनकारियों ने किया था. मिस्र में सलफ़ियों का ज़बरदस्त बोलबाला रहा है. यहाँ तक कि उनकी पहुँच अब राजनीतिक गलियारों तक है.

राबिया रहीम के लिए परिवार के 15 सदस्यों का पालन करना आसान काम नहीं है. हर चीज़ के दाम बढ़ रहे हैं और जीना मुश्किल हो चला है. मिस्र की अल-कोम अल अहमर इलाक़े की रहने वाली राबिया कहती हैं कि कोई भी ग़रीबों की नहीं सुनता.

क़ाहिरा से एक घंटे की दूरी पर स्थित उनके इलाक़े में आधारभूत सुविधाओं की कमी है. यहाँ ज़्यादातर बुज़ुर्ग अनपढ़ हैं और यातायात के लिए अभी भी गधों या बैलगाड़ी का इस्तेमाल किया जाता है.

मिस्र के आर्थिक संकट के कारण भले ही राजधानी क़ाहिरा की सड़कों पर लोग विरोध प्रदर्शन करते हों लेकिन राबिया के इलाक़े में लोग हर चीज़ के लिए भगवान से ही उम्मीद लगाए रहते हैं.

और तभी राबिया की मदद के लिए उनके घर सलफ़ियों का एक गुट पहुँचता है. उनके पास कूपन थे जिनके बदले कम दामों में ईंधन मिल जाएगा.

सलफ़ियों का गुट अपने 'परोपकारी कामों' के लिए बेहद लोकप्रिय है. छुट्टियों के दिन वो ऊँट, भेड़ आदि जानवरों का मांस ग़रीबों में बांटते हैं. वो ग़रीब बच्चों के लिए स्कूल की किताबें और दवाएं भी मुफ़्त बांटते हैं. यहां तक की ग़रीब दम्पित के लिए रोज़मर्रा की चीज़े भी तोहफ़े में देते हैं.

इन्हीं में से एक मोहम्मद गोमाह इस गुट की सामाजिक गतिविधियों को संभालते हैं. उनका कहना है कि सलफ़ी इस्लाम के आदेशों का पालन करते हैं.

बीबीसी के एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान गोमाह का कहना था, “हमें अपने लोगों की ज़रूर मदद करनी चाहिए. हम अल्लाह के लिए काम करते हैं, लेकिन लोग हमें भूलते नहीं हैं. वो हमारा आदर करते हैं.”

मक़सद

सलफ़ियों का कहना है कि वो पैगंबर मोहम्मद और उनके अनुयायियों के समय के इस्लाम को वापस लाना चाहते हैं.

सलफ़ियों का असर मिस्र के बाहर लीबिया और ट्यूनीशिया जैसे देशों में भी दिख रहा है. बेनगाज़ी के अमरीकी वाणिज्य दूतावास और ट्यूनिस के दूतावास पर हुए हमलों के लिए सलफ़ियों को दोषी ठहराया जाता है.

इन दोनो देशों में सलफ़ियों और उदारवादी मुसलमानों के बीच तनाव की झलक साफ़ दिखती है.

मिस्र के शहर ऑसिम में मेरी मुलाक़ात शेख़ हसन घिदान से हुई जिन्होंने क़ाहिरा के अल-अज़हर विश्वविद्यालय में पढ़ाई की है.

जुमे की नमाज़ के बाद उन्होंने मुझे बताया कि वो बदलते हुए समाज में विश्वास रखते हैं लेकिन वो समाज को बदलने के लिए सलफ़ी-समर्थित उग्र जेहाद के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ हैं, हालाँकि वो मानते हैं कि उनका और सलफ़ियों का मक़सद एक ही है.

वो कहते हैं, “ख़िलाफ़त यानि कि इस्लामी शासन की स्थापना के लिए ग़ैर-मुसलमानों द्वारा क़ब्ज़ा की गई ज़मीनों को आज़ाद करवाना होगा.”

शेख हसन फलस्तीन, इराक़, बर्मा, चेचन्या और स्पेन के ऐंडलूसिया इलाक़े का नाम गिनाते हैं जो कभी मुसलमानों के क़ब्ज़े में थे लेकिन अब ग़ैर-मुस्लिमों के पास हैं और वे उन्हें आज़ाज कराना चाहते हैं.

Image caption बेनगाजी़ में हुए हमलों के लिए सलाफियों को जिम्मेदर ठहराया जाता है

उन्होंने बताया कि मिस्र में शरिया लागू होने के बाद व्यभिचार में लिप्त ग़ैर-शादीशुदा महिलाओं को 100 कोड़ो को सज़ा दी जाएगी, जबकि शादीशुदा महिलाओं को पत्थरों से मार दिया जाएगा. साथ ही शराब का सेवन करने वालों को 80 कोड़ों की सज़ा दी जाएगी.

नए राज़ का डर

सलफ़ियों ने ख़ुद को राजनीति से दूर रखा है क्योंकि उनका मानना रहा है कि राजनीति अशुद्द होती है, लेकिन होस्नी मुबारक के सत्ता से बाहर किए जाने के बाद से सलफ़ियों ने राजनीतिक दल बना लिए हैं.

चुनाव में उन्हें क़रीब 20 प्रतिशत वोट मिले हैं जिससे संविधान बनाने के लिए हो रहे बहस के दौरान वे अपनी बात को मनवाने के लिए दबाव बना सकते हैं.

इससे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भी चिंता बढ़ी है. मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच की निदेशक हेबा मोरायफ को डर है कि मिस्र ईरान की शासन पद्दति की तरफ बढ़ रहा है.

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