अफगानिस्तान की 'हत्या नगरी'

  • 29 अक्तूबर 2012
कंधार
Image caption अफगानिस्तान में लोगों को धमकाने के लिए तालिबान तरह-तरह के तरीके अपनाता है.

अफगानिस्तान के दक्षिणी शहर कंधार में हिंसा की घटनाएं आम बात हैं.

कंधार ही तालिबान की जन्मस्थली जो है. लेकिन हाल में यहां जिस तरह से नेताओं को निशाना बनाया गया है, उससे आम आदमी ही नहीं बल्कि अफगान मामलों के जानकार भी हैरान हैं.

कंधार, अफगानिस्तान की ऐतिहासिक राजधानी रहा है और इतिहास बताता है कि जिसने कंधार जीत लिया, उसी ने पूरे देश पर राज किया.

ये शहर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का गृह-नगर भी है. इसके अलावा मुल्ला मोहम्मद उमर समेत तालिबान के तमाम बड़े नेता देश के इसी इलाके से आते हैं. इसे पश्तो सभ्यता के केंद्र के तौर पर भी जाना जाता है.

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि यही इलाका देश में जंग का प्रमुख मैदान है जहां तालिबान विद्रोहियों का सबसे भीषण रूप सामने आता रहा है.

पूरी पीढ़ी तबाह

आंकड़े बताते हैं कि कंधार में बीते दस वर्षों में 500 से ज्यादा बड़े नेताओं और प्रभावशाली कबाइली नेताओं की हत्याएं हुई हैं.

इनमें सबसे कुख्यात मामला राष्ट्रपति के भाई वली करज़ई की हत्या का है जिन्हें उनके अपने अंगरक्षकों ने गोलियों से भून दिया था.

तालिबान की गोलियों की शिकार हुए अन्य लोगों में कई प्रांतीय पुलिस प्रमुख, मेयर, जिला गवर्नर, मजहबी नेता, ग्राम-प्रधान, शिक्षक, डॉक्टर और आम नागरिक शामिल हैं जिन्हें अफगान सरकार और नैटो के समर्थक के तौर पर देखा जाता है.

अफगानिस्तान के अन्य हिस्सों में भी लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया है. लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि कंधार में जितने लोग मारे गए हैं, उनकी संख्या पूरे देश में मारे गए लोगों से कहीं अधिक हो सकती है.

हाल के वर्षों में देखा गया है कि कंधार में कोई हफ्ता ऐसा नहीं बीता जब किसी की हत्या ना हुई हो. कंधार के लोगों को लगता है कि नेताओं की जैसे एक पूरी पीढ़ी का सफाया कर दिया गया है.

हत्याओं का ये सिलसिला तब और तेज़ हो गया जब अमरीकी और नैटो सैनिकों ने साल 2010 में इलाके से तालिबान विद्रोहियों को निकालने की मुहिम शुरू की.

उनका मूलमंत्र था, ''जो कंधार में होता है, वहीं अफगानिस्तान में होता है. यदि कंधार का पतन होता है तो अफगानिस्तान का पतन होता है.''

Image caption राष्ट्रपति हामिद करजई के लिए देश की सुरक्षा स्थिति एक बड़ी चुनौती है

तालिबान लड़ाकों के खिलाफ इस मुहिम को चरमपंथ से निपटने की एक अहम रणनीति माना गया.

कंधार प्रांत के गवर्नर तोरियालई वेसा कहते हैं, ''सुरक्षा के हालात थोड़े बेहतर हुए हैं, इसे और बेहतर बनाने के उपाए किए जा रहे हैं. यही वजह है कि शत्रु अब सरकार को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि बेहतरी की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके.''

साजिश और संदेह

दक्षिणी अफगानिस्तान में हुई लगभग सभी हत्याओं की जिम्मेदारी तालिबान ने ली है जो 'विदेशी आक्रमणकारियों के समर्थकों' और अफगान अधिकारियों को निशाना बनाने की लगातार धमकी देता रहा है.

वैसे इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि तालिबान को इन हत्याओं से मनोवैज्ञानिक बढ़त और खूब प्रचार भी मिला. एक के बाद एक हत्याओं ने देश के राजनीतिक वर्ग को हिलाकर रख दिया है. पूरे माहौल पर जैसे साजिश और संदेह के बादल छाए हैं.

ज्यादातर स्थानीय लोग अफगानिस्तान के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को इन हत्याओं का जिम्मेदार मानते हैं. ये आरोप बार-बार दोहराया जाता है और पाकिस्तान हर बार इससे इनकार करता है.

अपना नाम जाहिर नहीं करने के इच्छुक एक स्थानीय ग्रामीण बताते हैं, ''अफगानिस्तान में 40 से ज्यादा देशों के सैनिकों ने डेरा डाला है और उनमें से अधिकतर जासूसी नेटवर्क हैं जो कंधार पर केंद्रित हैं. हमें नहीं पता कि कौन यहां क्या कर रहा है और इन सबके पीछे किसका हाथ है.''

कंधार में रहने वाले अब्दुल हामिद कहते हैं, ''हर दिन जब मैं घर से बाहर निकलता हूं, मुझे पता नहीं होता कि मैं शाम को जीवित घर लौटूंगा या नहीं.''

तालिबान लड़ाके लोगों के धमकाने के लिए एक तरीका और अपनाते हैं. वे लोगों के घरों के बाहर रात के वक्त अपना लिखित संदेश चिपका जाते हैं कि सरकारी नौकरी छोड़ो, वरना जान से मारे जाओगे.

यही वजह है कि लोगो तालिबान, अमरीका, पड़ोसी मुल्क और ऐसे ही दूसरे मसलों पर एक शब्द भी बोलने से पहले हज़ार बार सोचते हैं.

अपराधियों के गुट, मादक पदार्थों के तस्कर और आपसी रंजिश निकालने के लिए मौका तलाश रहे लोग भी इस स्थिति से फायदा उठा रहे हैं.

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