मुसलमानों और बौद्धों के संघर्ष पर सू ची की चुप्पी

 रविवार, 4 नवंबर, 2012 को 00:22 IST तक के समाचार
रोहिंग्या मुसलमान

संयुक्त राष्ट्र ने भी रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति पर चिंता जताई है

बर्मा में विपक्ष की नेता ऑन्ग सान सू ची ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि वह देश में रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति को लेकर कुछ भी नहीं कह सकती हैं.

यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष जोज़े मैनुएल बरोज़ो से बर्मा की राजधानी नेपिडॉ में मुलाक़ात के बाद सू ची ने पश्चिमी रखाइन प्रांत में बौद्धों और मुसलमानों के बीच ज़्यादा सहिष्णुता की अपील की.

पिछले हफ़्ते वहाँ फिर भड़क गई क्लिक करें सांप्रदायिक हिंसा में लगभग 90 लोग मारे गए थे.

आम तौर पर आलोचनाओं का शिकार नहीं होने वाली ऑन्ग सान सू ची की बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति पर कुछ भी नहीं कहने के कारण आलोचना हुई है.

रोहिंग्या मुसलमानों को वहाँ की नागरिकता नहीं दी जा रही है और कई बर्मी लोग ये मानते हैं कि उन्हें देश से निकाल दिया जाना चाहिए. उधर क्लिक करें संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें 'धरती पर सबसे ज़्यादा सताए गए अल्पसंख्यक' बताया है.

सू ची से नाराज़गी

मगर बीबीसी से बातचीत में सू ची अपने रुख़ पर क़ायम दिखीं.

रखाइन प्रांत में सांप्रदायिक हिंसा में बौद्ध और मुसलमान दोनों ही समुदायों के लोग क्लिक करें मारे गए हैं मगर सू ची ने कहा कि वह इस स्थिति में नहीं है कि किसी एक पक्ष की बात रखें.

"मुझे नहीं लगता कि बिना समस्या की जड़ को देखे किसी को अपने नेतृत्त्व का इस्तेमाल किसी एक पक्ष की बात को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए"

सू ची, विपक्ष की नेता

उन्होंने कहा, "मैं लोगों से उदारता की अपील करती हूँ. मगर मुझे नहीं लगता कि बिना समस्या की जड़ को देखे किसी को अपने नेतृत्त्व का इस्तेमाल किसी एक पक्ष की बात को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए."

सू ची ने अपनी आलोचना पर कहा, "मैं जानती हूँ कि लोग मुझसे किसी एक का पक्ष लेने की अपेक्षा रखते हैं इसलिए मुझसे दोनों ही पक्ष नाराज़ हैं कि मैं उनके साथ नहीं खड़ी हो रही हूँ."

सू ची के मुताबिक़ उन्होंने ऐसा कोई आँकड़ा नहीं देखा है जो ये बताता है कि आठ लाख रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता नहीं मिल रही है.

उन्होंने कहा कि 1982 के जिस क़ानून की इतनी आलोचना होती है उसे देखा जाना चाहिए. मगर जिस तरह उन्होंने क्लिक करें रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर एहतियात बरता है उससे मानवाधिकार आंदोलन चलाने वालों को काफ़ी निराशा होगी.

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