लंदन की सड़कों पर 'घूमते थे आदमखोर बाघ'

  • 11 नवंबर 2012

लंदन की सड़कें दुनिया में सबसे व्यवस्थित और सुरक्षित मानी जाती हैं लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. दिन दहाड़े एक दिन एक बच्चे को एक बाघ ने दबोच लिया था.

साल था 1857, वही साल जब ब्रिटेन के अखबार भारत में बगावत की ख़बरों से रंगे हुए थे.

दरअसल ब्रिटेन महारानी विक्टोरिया के ज़माने में दुनिया भर के अनोखे पशु-पक्षियों की सबसे बड़ी मंडी था. ब्रिटेन में उस ज़माने में दरियाई घोड़ों से लेकर अफ्रीकी और एशियाई हाथियों तक हर किस्म के जानवर ख़रीदे जा सकते थे.

साल 1895 के अकेले लंदन में 118 जंगली जानवरों की दुकाने थीं जहाँ लोग महज़ दुकान के भीतर घुस कर हाथी से लेकर कंगारू तक कुछ भी खरीद सकते थे.

साल 1857 में उस वक़्त के सबसे मशहूर जानवरों के दलालों में से एक थे चार्ल्स जैमरेक. इन साहब का दावा था कि वो दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी किस्म का, कोई भी जानवर मंगा सकते हैं.

भाग निकला बाघ

पूर्वी लंदन में इन्हीं सज्जन की दुकान में लाते वक़्त एक बाघ अपने पिंजरे को तोड़ कर निकल भागा था. बाघ भागा और उसने जॉन वेड नाक के एक बच्चे को दबोच लिया.

आखिरकार किसी तरह से जैमरैक ने उस बच्चे को बाघ के मुँह से निकाला. उन्हें उस ज़माने में इसका 300 पाउंड जुर्माना देना पड़ा था जो आज के ज़माने के करीब 30000 पाउंड या करीब 25 लाख भारतीय रुपयों के बराबर था.

हालाँकि ये बाघ उन्होंने लगभग इसी कीमत पर एक सर्कस कंपनी को बेच दिया था. जिस कंपनी ने बाघ बेचा था उसने इसे आदमखोर बाघ कहकर प्रदर्शित किया और खूब पैसे कमाए.

ग़दर से तुलना

उस ज़माने के अखबारों ने इस बाघ की तुलना भारत में चल रही सैन्य बगावात से की.

जैमरैक जो कि खुद एक अपना अखबार निकालते थे- जिसमें सच्चे-झूठे किस्से छपा करते थे. उस अखबार में उनकी वीरता के बारे में लंबा चौड़ा लेख छपा कि किस तरह से उन्होंने उस बाघ को गर्दन से दबोचा और बच्चे को बचा लिया.

ब्रिटेन में जंगली जानवरों की मांग का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वान इगेन एंड वान ईगेन कंपनी ने साल 1900 से 1950 के बीच 43000 बाघों औत तेंदुओं की खालों में भूसा भरा और उन्हें ब्रिटेन और भारत के बाजारों में बेचा.

संबंधित समाचार