श्रीलंका में यूएन विफल रहा: आंतरिक रिपोर्ट

 बुधवार, 14 नवंबर, 2012 को 00:57 IST तक के समाचार
श्रीलंका में तमिल

युद्ध के दौरान हज़ारों तमिल नागरिक एक छोटी सी जगह में फंसे थे जिन्हें बाद में मार दिया गया था.

श्रीलंका में युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर कड़ी आलोचना करती हुई संयुक्त राष्ट्र की ही इस आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया है, ''श्रीलंका की घटना संयुक्त राष्ट्र की गंभीर विफलता को दर्शाती हैं.''

साल 2009 के मई महीने में श्रीलंका में युद्ध ख़त्म हुआ था लेकिन इसके लिए श्रीलंका की सरकारी सेना और तमिल छापामार गुट एलटीटीई दोनों पर ही युद्ध अपराधों का आरोप लगाया जाता है.

बीबीसी को मिली इस आंतरिक रिपोर्ट पर जब संयुक्त राष्ट्र से उनकी आधिकारिक प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई तो संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि वो किसी आंतरिक रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता और वो संपूर्ण रिपोर्ट जल्द ही जारी करेगा.

श्रीलंका में 26 साल तक चले युद्ध में लगभग एक लाख लोग मारे गए थे. लेकिन युद्ध के आख़िरी दिनों में मारे गए हज़ारों नागरिकों की संख्या के बारे में अभी तक दावे के साथ कुछ भी नही कहा जा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र की एक जांच रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि लगभग 40 हज़ार लोग युद्ध के अंतिम पांच महीनों में मारे गए थे. लेकिन कई दूसरी रिपोर्टों के अनुसार ये संख्या ज़्यादा भी हो सकती है.

"मेरा मानना है कि हमें श्रीलंका के दक्षिणी इलाक़े से नहीं हटना चाहिए था. ऐसा करके हमनें आम नागरिकों को बिना किसी सुरक्षा के अकेले छोड़ दिया था. एक मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते मेरे दिमाग़ मे हमेशा ये सवाल घूम रहा था कि हम ये क्या कर रहें हैं."

श्रीलंका में संयुक्त राष्ट्र दल का हिस्सा रहे बेनजामिन डिक्स

संयुक्त राष्ट्र की आंतरिक समीक्षा पैनल के अध्यक्ष चार्ल्स पेट्री ने बीबीसी को बताया कि बीबीसी के पास जो रिपोर्ट है, उनके पैनल ने भी लगभग वहीं सारी चीज़ें अपनी जांच में पाईं हैं.

चार्ल्स पेट्री इस समय न्यूयॉर्क में हैं जहां वो संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे.

संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता मार्टिन नेसिरकी ने बीबीसी को बताया कि वो इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे और बान की मून को रिपोर्ट मिल जाने के बाद उसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा.

'व्यवस्था की विफलता'

य़ुद्ध के आख़िरी कुछ महीनों में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका की समीक्षा करती हुई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में नागरिकों की सुरक्षा और दूसरी मानवीय ज़िम्मेदारियों को पूरी करने के लिए संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह तैयार रहना होगा.

"राजधानी कोलंबो में तैनात कई वरिष्ठ यूएन अधिकारी आम नागरिकों की जान बचाना अपनी ज़िम्मेदारियों का हिस्सा ही नहीं समझते थे और संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में बैठे अधिकारी भी उनको इस बारे में कोई निर्देश नहीं दे रहे थे."

आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में पूरी व्यवस्था की गड़बड़ी सामने आई है.

समीक्षा पैनल ने सितंबर 2008 में संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों के श्रीलंका से हटाए जाने के फ़ैसले पर सवाल उठाएं हैं.

उस समय श्रीलंका में संयुक्त राष्ट्र दल का हिस्सा रहे बेनजामिन डिक्स का कहना है कि वो कर्मचारियों के हटाए जाने के ख़िलाफ़ थे.

डिक्स ने बीबीसी से बातचीते क दौरान कहा, ''मेरा मानना है कि हमें श्रीलंका के दक्षिणी इलाक़े से नहीं हटना चाहिए था. ऐसा करके हमनें आम नागरिकों को बिना किसी सुरक्षा के अकेले छोड़ दिया था. एक मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते मेरे दिमाग़ मे हमेशा ये सवाल घूम रहा था कि हम ये क्या कर रहें हैं.''

श्रीलंका में युद्ध

श्रीलंका में युद्ध के दौरान 26 वर्षों में एक लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

फ़िलहाल ब्रिटेन में शरण लिए हुए एक तमिल स्कूल शिक्षक ने अपना नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया, ''हमलोगों ने संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों से उस इलाक़े को नहीं छोड़ने के लिए उनके हाथ जोड़े लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी. अगर वे लोग वहां रूक जाते तो आज कुछ और लोग ज़िंदा होते.''

रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है, ''राजधानी कोलंबो में तैनात कई वरिष्ठ यूएन अधिकारी आम नागरिकों की जान बचाना अपनी ज़िम्मेदारियों का हिस्सा ही नहीं समझते थे और संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में बैठे अधिकारी भी उनको इस बारे में कोई निर्देश नहीं दे रहे थे.''

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र ने मारे जाने वाले नागरिकों की संख्या को भी सार्वजनिक नहीं किया और श्रीलंका सरकार के दबाव में इसने इस बात को भी दबा दिया कि मारे जाने वाले ज्यादातर लोगों की मौत सेना की गोलीबारी में हुई थी.

श्रीलंका में तेल नहीं

लेकिन सवाल ये है कि संयुक्त राष्ट्र श्रीलंका में विफल क्यों रहा?

रिपोर्ट में कहा गया है, कोलंबो में तैनात वरिष्ठ अधाकारियो को श्रीलंका की चुनौती से निबटने के लिए न तो कोई अनुभव था और न ही उनमें राजनीतिक दक्षता थी. उन्हें यूएन मुख्यालय से भी ज़रूरी मदद नहीं दी गई थी.

"श्रीलंका में लोगों को बचाने की संयुक्त राष्ट्र की ज़िम्मेदारी थी लेकिन दुर्भाग्यवश यहां इतना हंगामा नहीं मचा जितना लीबिया को लेकर हंगामा हुआ था. श्रीलंका में न तो ज्यादा तेल है और न ही वो भूमध्यसागर पर बसा हुआ है."

श्रीलंका कैंपेन फॉर पीस एंड जस्टिस' के अध्यक्ष एडवर्ड मॉरटाइमर

संयुक्त राष्ट्र के एक पूर्व अधिकारी और 'श्रीलंका कैंपेन फॉर पीस एंड जस्टिस' के अध्यक्ष एडवर्ड मॉरटाइमर के अनुसार संयुक्त राष्ट्र अधिकारियों ने उस समय श्रीलंका को छोड़ दिया जब लोगों को उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी.

एडवर्ड मॉरटाइमर का कहना है, ''श्रीलंका में लोगों को बचाने की संयुक्त राष्ट्र की ज़िम्मेदारी थी लेकिन दुर्भाग्यवश यहां इतना हंगामा नहीं मचा जितना लीबिया को लेकर हंगामा हुआ था. श्रीलंका में न तो ज्यादा तेल है और न ही वो भूमध्यसागर पर बसा हुआ है.''

श्रीलंका में युद्ध के अंतिम महीनों में सुरक्षा परिषद या संयुक्त राष्ट्र के किसी भी उच्च संस्था की एक भी बैठक नहीं हुई थी.

युद्ध के अंतिम दिनों पर 'स्टिल काउंटिंग द डेड' के नाम से एक किताब लिखने वाले फ़्रांसेस हैरिसन ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''श्रीलंका में संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को जो नुक़सान हआ है उसे बहाल करने के लिए बान की मून के पास अब एक ही रास्ता बचा है कि वे श्रीलंका में 2009 में हज़ारों लोंगों के मारे जाने की एक निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच कराने के आदेश दें.''

संयुक्त राष्ट्र के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि बेबाकी से अपनी बात रखने के लिए मशहूर चार्ल्स पेट्री की अध्यक्षता में समीक्षा पैनल का बनाया जाना इस बात का सबूत है कि संयुक्त राष्ट्र का एक धड़ा श्रीलंका में उसकी विफलता को लेकर बहुत गंभीर है.

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