मिस्र:विपक्ष सशर्त जनमत संग्रह के पक्ष में

  • 13 दिसंबर 2012
मिस्र

मिस्र में विपक्षी नेताओं ने कहा है कि उन्होंने शनिवार को देश के नए संविधान के मसौदे पर होने वाले जनमत संग्रह के बहिष्कार का विचार त्याग दिया है.

विपक्ष का कहना है कि वो बहिष्कार तो नही करेंगे लेकिन कुछ शर्तों पर ही. उनका कहना है कि वो चाहते हैं कि जनमत संग्रह अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगरानी में हो.

इससे पहले, मिस्र के विपक्षी गठबंधन 'राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा' ने अपने समर्थकों से कहा था कि जनमत संग्रह में वो विवादास्पद संविधान का मसौदे के पक्ष में मतदान न करें और इसके ख़िलाफ वोट दें.

हालांकि, ये भी कहा गया है कि अगर उनकी मांगे पूरी न हुई तो वो इसका बहिष्कार कर सकते हैं.

विपक्ष का कहना है कि दस्तावेज़ का मसौदा राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी और उनके समर्थकों द्वारा बनाया गया है जो बहुत ज्यादा इस्लामी है.

भारी प्रदर्शन

इस विवाद के चलते पूरे मिस्र भर में जनप्रदर्शन हुए है.

विपक्षी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने बुधवार को जनमत संग्रह पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि मिस्र की जनता मतदान केंद्रों पर जाएं और प्रस्तावित मसौदे के खिलाफ वोट दे.

विपक्ष के नेता और पूर्व अरब लीग प्रमुख अम्र मूसा ने रॉयटर समाचार एजेंसी से कहा कि वो मतदान में ‘नही’ विकल्प के पक्ष में हैं.

लेकिन एक दूसरे प्रमुख विरोधी नेता हमदीन सब्बाही ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अगर कुछ शर्तों को पूरा नही किया गया तो मोर्चा अभी भी इसका बहिष्कार कर सकता है.

उन्होंने कहा कि कि अगर जनमत संग्रह के दिन शर्तें पूरी नही हुईं तो वो इस मतदान मे हिस्सा नही लेंगें.

इन शर्तों के मुताबिक मतदान पर न्यायपालिका नजर रखेगी. मतदान स्थानिय और गैर सरकार अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मौजूदगी में हो. पर्याप्त सुरक्षा बल मौजूद हो. मतदान पूरा होने के बाद विस्तृत नतीजे घोषित किए जाएं और मतदान सिर्फ एक दिन में हो.

संवाददाताओं का कहना है कि इन सभी शर्तों का पूरा किया जाना असंभव सा है. क्योंकि हजारों की तादाद में न्यायाधीशों ने पहले से ही इस मतदान मे भाग लेने से इनकार कर दिया है.

विदेशों में मिस्र के दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों में मसौदे पर मतदान पहले से ही शुरु हो चुका है, लेकिन देश के भीतर इस पर बहुत असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

गौरतलब है कि विपक्ष का आरोप है कि नए संविधान में मानवाधिकारों को सही तौर पर संरक्षण नहीं मिला है औऱ महिलाओं के अधिकारों की रक्षा नहीं की गई है.

हांलाकि राष्ट्रपति मोर्सी ने लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश तो की है लेकिन वो इसमें सफल नहीं हो पाए हैं.

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