अक्षर और भाषा शैली का गुस्से से नाता

 मंगलवार, 25 दिसंबर, 2012 को 19:26 IST तक के समाचार

बेहतर भाषा शैली से मुश्किलें आसान हो जाती हैं

अगर कोई मासूम अपने बचपने में तेजी से अक्षरों को पहचानना सीख रहा है, साफ साफ बोलने की कोशिश कर रहा है तो यकीन मानिए उसका दोहरा फायदा होने वाला है.

एक तो इससे वह खुद को बेहतर ढ़ंग से अभिव्यक्त कर पाएगा और दूसरे उम्र बढ़ने के साथ उसे गुस्सा कम आएगा.

जी हां, ये देखा गया है कि 2 साल के वैसे मासूम बच्चे जो अक्षरों को आसानी से पहचाने लगते हैं, अपनी बात पूरे वाक्यों में कहने की कोशिश करते हैं, वे 4 साल की उम्र में पहुंचने पर आम बच्चों के मुकाबले कम गुस्सा करते हैं.

इस शोध के दौरान यह भी देखा गया कि चार साल के वैसे मासूम जो तेजी से अपनी भाषा को बेहतर करने की कोशिश करते हैं उन्हें भी कम गुस्सा आता है.

आसान हो जाती है मुश्किल

लाइव साइंस में प्रकाशित शोध अध्ययन के मुताबिक 18 महीने के 120 बच्चों के व्यवहार का तब तक अध्ययन किया गया जब तक वे 4 साल के नहीं हो गए.

इस दौरान इन बच्चों के भाषा ज्ञान को आंकने वाले तमाम प्रयोग किए गए और उलक्षण पैदा करने वाले मुश्किल काम भी दिए गए.

इसमें एक काम ऐसा भी था जिसमें बच्चों को कहा गया था कि आप किसी उपहार को खोलने से पहले आठ मिनट तक इंतज़ार करें.

दरअसल ये देखा गया है कि बेहतर भाषा शैली मासूम बच्चों के गुस्से पर काबू पाने में दो तरह से मदद करती है.

पहली तो बच्चे जब मुसीबत या किसी उलक्षण में होते हैं तो बेहतर भाषा शैली होने के चलते वे अपने माता-पिता से मदद मांग लेते हैं. माता-पिता के नहीं होने पर अपने टीचर या अन्य किसी से मदद मांगने में भी नहीं हिचकते.

इसके अलावा बेहतर भाषा शैली वाले बच्चे खुद भी अपने गुस्से पर काबू पाने की कोशिश करते हैं.

पेनसेल्विनिया स्टेट विश्वविद्यालय की शोध दल की सदस्या पामेला कोल कहती हैं, बेहतर भाषा शैली वाले बच्चे अपनी उलक्षण और मुश्किलों के बारे में दूसरों को आसानी से बता पाते हैं.”

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