क्यों ब्रिटेन में भारतीय आबादी सबसे ज़्यादा?

 शुक्रवार, 28 दिसंबर, 2012 को 13:15 IST तक के समाचार

हो सकता है कि लंदन से आप अपरिचित ना हों, टीवी-सिनेमा में ख़ूब देखी हो इसकी झलक, पर फिर भी, जब कोई पहली-पहली बार लंदन आता है तो मन में एक कौतूहल तो होता ही है– कि एक अनजाना देश होगा, अपरिचित विदेशी होंगे.

मगर लंदन के व्यस्त हवाई अड्डे- हीथ्रो - पर पाँव रखे ज़्यादा समय नहीं होगा जब आपको एक दूसरी तस्वीर दिखाई देगी – जाने-पहचाने चेहरे, जानी-पहचानी बोली.

फिर आप कुछ दिन शहर में बिताएँ, बाज़ार-दुकान के चक्कर लगाएँ, तो आपको पता चलेगा कि ये कोई ऐसा विदेश नहीं जहाँ आप किसी विदेशी की तरह दिखाई दें.

आप उन विदेशियों की तरह कतई अलग नहीं लगने वाले जो भारत पहुँचने पर कौतूहल का केंद्र बन जाते हैं, जिस कौतूहल को शहरी भद्रजन भले ही तिरछी आँखों से निहारकर दूर कर लेते हों, छोटे शहरों-कस्बों में छोटी-मोटी भीड़ लग ही जाती है.

पर लंदन में आपके साथ ऐसा कुछ नहीं होगा, हर दो क़दम पर अपने जैसे चेहरे दिखाई दे जाएँगे. कहीं स्टेशन पर टिकट काटते तो कहीं बस-ट्रेन चलाते, कहीं पुलिस की वर्दी में तो कहीं कॉलेजों के कैम्पस में, कहीं दुकानों पर पेप्सी-पित्ज़ा-माचिस-चॉकलेट बेचते तो कहीं कंप्यूटर-मोबाइल की गुत्थियाँ सुलझाते – हर तरफ़ अपने जैसे चेहरे.

बल्कि कुछ इलाक़ों में चले जाएँ तो ऐसा लगेगा मानो आप ही अपने देश में हैं, और बीच-बीच में कहीं किसी जगह दिख जाने वाले गोरे– विदेशी.

लंदन ऐसा क्यों दिखता है? इस रहस्य से अब पर्दा उठ चुका है – लंदन में आबादी में गोरे अंग्रेज़ों का हिस्सा घटकर आधे से कम हो गया है, पहली बार सब मिलाकर दूसरे देशों के लोग यहाँ बहुसंख्यक हो गए हैं जिनमें भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश-श्रीलंका जैसे देशों के लोग सबसे ज़्यादा हैं.

जनगणना

ब्रिटेनः जनसंख्या 2011

  • ब्रिटेनः 6 करोड़ 32 लाख
  • भारतीयः 2.5%
  • लंदन में गोरे अंग्रेज़ः 45%
  • ब्रिटेन में गोरे अंग्रेज़ः 80%

(स्रोतःऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स)

ब्रिटेन में जनगणना करने वाले विभाग ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स के अनुसार ब्रिटेन की जनसंख्या अभी 6 करोड़ 32 लाख है.

2011 में हुई जनगणना के अंतिम आँकड़े हाल ही में जारी किए गए हैं जिसके अनुसार लंदन में गोरे अंग्रेज़ों की आबादी घटकर 45% रह गई है, जो दस साल पहले 58% हुआ करती थी.

यानी अभी लंदन में 55% लोग विदेशों के या विदेशी मूल के हैं जो एशियाई, यूरोप के दूसरे देशों, कैरीबियाई देशों और अन्य देशों से आए हैं. सबसे बड़ी संख्या एशियाई लोगों की है जिनमें भारतीय सबसे अधिक हैं.

वैसे लंदन के बाहर, पूरे ब्रिटेन में अभी भी गोरे अंग्रेज़ ही बहुसंख्यक हैं. हालाँकि आबादी में उनका अनुपात दस साल में घटा है. 2001 में ये 87 फ़ीसदी था, अभी 80 फ़ीसदी रह गया है.

ब्रिटेन के जनसंख्या अनुपात में पिछले 10 सालों में आए बदलाव के लिए मुख्य कारण आप्रवासियों का ब्रिटेन आना बताया जा रहा है.

आँकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के मुख्य प्रांतों इंग्लैंड और वेल्स में हर आठवाँ व्यक्ति विदेश में जन्मा व्यक्ति है.

भारतीय सबसे ज़्यादा

"ये कोई नई बात नहीं है, जब से मैं आया हूँ तबसे हर जनगणना में मैं यही देखता रहा हूँ, ये ज़रूर है कि पहले हमारे लोगों की संख्या कम थी, पर आप्रवासियों में हिन्दुस्तानी हमेशा से सबसे अधिक थे"

लॉर्ड भीखू पारेख

ब्रिटेन में आप्रवासियों में सबसे अधिक हैं भारत से जुड़े लोग – यानी ऐसे लोग जो या तो ब्रिटेन की नागरिकता प्राप्त भारतीय हैं, या यहाँ रह रहे भारतीय.

जगगणना आँकड़ों के अनुसार पिछले दस साल में ब्रिटेन की आबादी में भारतीय और भारतीय मूल के लोगों का हिस्सा दो प्रतिशत से बढ़कर ढाई प्रतिशत हो गया है.

इस हिसाब से ब्रिटेन में भारतीय और भारतीय मूल के लोगों की संख्या लगभग 16 लाख होती है.

इनमें से सात लाख, यानी लगभग आधे ऐसे भारतीय हैं जिनका जन्म ब्रिटेन से बाहर हुआ और जो अब ब्रिटेन में रह रहे हैं.

वैसे ब्रिटेन में आप्रवासियों में भारतीयों की संख्या सबसे अधिक होने को ब्रिटेन में 53 साल से रह रहे लॉर्ड भीखू पारेख कोई नई बात नहीं बताते.

क्लिक करें (लॉर्ड भीखू पारेख के साथ बीबीसी ग्लोबल इंडिया में प्रसारित बातचीत)

1959 में उच्च शिक्षा के लिए लंदन आए और फिर ब्रिटेन में अध्यापन करनेवाले लॉर्ड पारेख ने कहा,"ये कोई नई बात नहीं है, जब से मैं आया हूँ तबसे हर जनगणना में मैं यही देखता रहा हूँ, ये ज़रूर है कि पहले हमारे लोगों की संख्या कम थी, पर आप्रवासियों में हिन्दुस्तानी हमेशा से सबसे अधिक थे."

लॉर्ड पारेख ने बताया कि ब्रिटेन में हिन्दुस्तानियों की संख्या बढ़ते रहने के तीन कारण हैं – पहला ये कि शुरू-शुरू में भारत से लोगों को काम के लिए यहाँ बुलाया गया जिसे बाद में बंद कर दिया गया, दूसरा ये कि अफ़्रीकी देशों की आज़ादी के बाद वहाँ से भारतीय ब्रिटेन आकर बसे और तीसरा ये कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने काम के लिए भारत से पेशेवर लोगों को ब्रिटेन लाना शुरू किया.

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