80 राजाओं का राजतिलक देखा है इस चर्च ने

  • 10 जनवरी 2013
Image caption पेरिस में सीन नदी के किनारे यह चर्च इतिहास का गवाह है

फ्रांस की राजधानी पेरिस में सीन नदी के तट पर बना एक ऐतिहासिक चर्च इन दिनों चर्चा का केंद्र है. ये चर्च ना तो दुनिया का सबसे ऊंचा चर्च है और ना ही सबसे बड़ा. लेकिन इसकी अपनी ख़ासियत हैं.

इस चर्च ने अपनी आंखों के सामने गुज़रते वक़्त के साथ इतिहास बनते देखा है. फ़्रांस के इतिहास की कई बड़ी घटनाओं का गवाह रहा है ये चर्च.

80 राजाओं का राजतिलक, दो साम्राज्यों का राजपाट, पांच गणतंत्रों का गठन और दो विश्व-युद्ध झेलना, ये सब किसी उपलब्धि से कम नहीं है.

इस चर्च की स्थापना 13वीं शताब्दी में हुई. फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान इसे लूटकर लगभग ध्वस्त कर दिया गया था.

'ऑवर लेडी ऑफ़ पेरिस'

ऑवर लेडी ऑफ़ पेरिस के नाम से मशहूर यह चर्च नए साल में अपने 850 साल पूरे कर रहा है. ये चर्च इस दौरान अपने अस्तित्व को बचाने में कामयाब रहा.

इस चर्च का निर्माण वर्ष 1163 में शुरू हुआ. इसे बनने में 180 साल लगे. जब ये खूबसूरत चर्च बनकर तैयार हुआ, तब इतिहास में उठापठक का दौर शुरू हो रहा था.

इस चर्च के सामने ही वर्ष 1431 में इंग्लैंड के दस साल के बीमार बालक किंग हेनरी छठे ने फ्रांस की गद्दी संभाली. फिर साल 1804 में इसी चर्च ने नेपोलियन को फ्रांस की सत्ता पर आसीन होते देखा.

इस चर्च की एक ख़ासियत यहां का संगीत भी है. चर्च का इतिहास बताता है कि संगीत यहां हमेशा से मौजूद रहा.

ऐसे नोट्रे डेम (ऑवर लेडी) में 850वीं वर्षगांठ के मौक़े पर संगीत आयोजनों की भी बड़ी तैयारी की गई है.

पूरे साल के दौरान संगीत की तीन गायक मंडलियां यहां अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करती रहेंगी.

इस संगीत आयोजन के निदेशक सिल्वायन डियूडोन ने बीबीसी को बताया, ''वर्ष 1163 में जब चर्च का निर्माण शुरू हुआ तब पेरिस एक तरह से बौद्धिकता, आध्यात्मिकता और संगीत का सबसे अहम केंद्र था.''

घंटी है ख़ासियत

Image caption चर्च के 850 साल पूरे होने पर इसे नये सिरे से सजाया संवारा जा रहा है

सिल्वायन डियूडोन कहते हैं, ''चर्च का संगीत-स्कूल काफ़ी प्रभावी था. हमने ये पाया है कि यहां यूरोप के तमाम देशों- स्पेन, इटली, जर्मनी और इंग्लैंड का असर दिखता है.''

लेकिन इसके अलावा चर्च की एक और ख़ास आवाज़ बेहद लोकप्रिय है. ये आवाज़ है यहां मौजूद घंटियों की. इसमें सबसे बड़ी घंटी चर्च के दक्षिणी टॉवर में वर्ष 1685 में लगाई गई थी. इस घंटी की आवाज़ से ही वर्ष 1944 में फ्रांस की आज़ादी को ध्वनित किया गया था.

लेकिन इस साल चर्च के उत्तरी टॉवरों पर छोटी घंटियां लगाई गईं. चर्च की स्थापना के वक़्त इन टॉवरों पर लगी घंटियों को फ़्रांसीसी क्रांति के समय तोप के गोलों के लिए उतारकर पिघला लिया गया था. बाद में इसमें जो घंटियां लगीं, वो उतनी बेहतर नहीं थीं, लिहाज़ा उन्हें बदला गया है.

बहरहाल, बदली हुई घंटियों में आठ घंटियां वेलेडिइउ-लेस-पोल्स में प्राचीन मिस्र के तौर-तरीक़ों से बनाई गई हैं. इसमें घोड़े के बाल और खाद का इस्तेमाल किया गया था.

चर्च के फाउंड्री के अध्यक्ष पॉल बेरगामो कहते हैं, ''इससे घंटी को बेहतर कवच मिला है जो बालू और सीमेंट के कवच से कहीं बेहतर है.''

आज की आधुनिकता का असर भी चर्च में दिखने लगा है. बेरगामो बताते हैं कि इन घंटियों को बजाने के लिए आधुनिकतम कंप्यूटरीकृत तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है.

परंपरा भी, आधुनिकता भी

Image caption इस चर्च का संगीत से रहा है ख़ास रिश्ता

फाउंड्री के अध्यक्ष पॉल बेरगामो कहते हैं, ''यह एक तरह से सबसे बेहतरीन तकनीक और सबसे बेहतरीन परंपरा का मिश्रण होगा. हम इसे इस बार ऐसे बजाएंगे जैसे यह फ्रांस की सबसे बेहतरीन घंटी होगी.''

इस साल होने वाले समारोह में स्थापत्य को लेकर भी काफ़ी तैयारी की गई है. चर्च के 850 साल पूरे होने के मौक़े पर पूरे चर्च में नए सिरे से रौशनी भी की जा रही है.

वैसे ये चर्च समय के साथ इतिहास में 'मास्टपीस' के तौर पर दर्ज हो चुका है. लिहाजा इसके 850 साल का जश्न भी ख़ास अंदाज़ में बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है.

इस चर्च पर 'द हंच बैक ऑफ नोट्रे डैम' नामक किताब लिख चुके विक्टर ह्यूगो कहते हैं, ''जब किसी में कला को देखने की समझ विकसित हो जाती है, तो वह कलाकृति की उम्र को भी समझने लगता है.''

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