बदल रही है लाहौर की रवायत?

  • 1 जनवरी 2013
लाहौर, पाकिस्तान
Image caption वर्ष 1912 में लाहौरः यह शहर सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध परंपरा के लिए मशहूर रहा है

लाहौर काफी लंबे अरसे से अपनी ऐतिहासिक परंपराओं, संस्कृति के प्रति प्रेम और विविध विरासत के लिए मशहूर रहा है. इस शहर की ख़ास बात यह भी है कि इसके कई हिस्सों के नाम हिंदू, ईसाई, सिख और दूसरे समुदाय के नाम पर रखे गए हैं.

यह रवायत अब बदल रही है. अब यहां की ज्यादातर सड़कें और कई अन्य जगहों के नाम बदलकर मुस्लिम धर्म से ताल्लुक रखने वाली मशहूर शख्सियतों के नाम पर रखा जा रहा है.

ऐसा लगता है कि किसी ने भी अभी तक इस बदलाव के रुझान पर कोई विशेष ऐतराज नहीं जताया. वैसे अब छोटे और थोड़े कम मशहूर यातायात मार्गों के नाम बदलने पर विभिन्न धार्मिक समूहों और शहर के नागरिक समाज के बीच एक बड़ा विवाद पैदा होने लगा है.

सितंबर में लाहौर की ज़िला सरकार ने यह घोषणा की कि शहर के शादमन क्षेत्र के फौव्वारा चौक का नाम बदलकर भारत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह के नाम पर रखा जाएगा और यह आज़ादी की लड़ाई में उनके बलिदान के लिए एक श्रद्धांजलि होगी.

बलिदान के लिए सम्मान

भगत सिंह को करीब 80 साल पहले शादमान चौक पर फांसी दी गई थी जब यह ब्रितानी हुकूमत के साम्राज्य का हिस्सा था. भगत सिंह अब भी हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के बेहद सम्मानित नायकों में से एक हैं.

Image caption इस चौराहे का नाम बदलने पर लाहौर में हंगामा खड़ा हो गया

भारत के सीमापार के भगत सिंह के प्रशंसक कई सालों से स्थानीय प्रशासन से इस चौक का नाम उनके नाम पर रखने की गुजारिश करते आ रहे हैं.

कई धार्मिक समूहों ने इस सुझाव का विरोध भी किया है क्योंकि भगत सिंह का ताल्लुक सिख धर्म से था.

चरमपंथी संगठन जमात-उद-दावा के एक प्रवक्ता का कहना है, "हम आज़ादी की लड़ाई में भगत सिंह के बलिदान का सम्मान करते हैं लेकिन मौजूदा वक्त में इस्लाम और ग़ैर इस्लाम के बीच विवाद है और हमारा यह मानना है कि पाकिस्तान में इस्लाम धर्म से जुड़े नाम, शख्सियतों और विचारधारा को ही बढ़ावा दिया जाना चाहिए."

इस चौक का नाम बदलने की गुज़ारिश को मंज़ूरी मिल गई है लेकिन इस फैसले का ज़ोरदार विरोध भी किया जा रहा है.

धार्मिक समूहों का कहना है कि वे इस चौक का नाम हरमत-ए-रसूल चौक रखेंगे और उन्होंने विरोध करने की धमकी भी दी है.

एक स्थानीय कारोबारियों के संगठन ने लाहौर हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एक याचिका दायर की है. याचिका दायर करने वाले एक कारोबारी ज़ाहिद का कहना है, "हम अपने बच्चों को यह कैसे बताएंगे कि यह नाम सिख धर्म से जुड़ा है? (भारत में) हिंदू हमारी मस्जिदों को तोड़ रहे हैं और हमारी सरकार उनके नाम पर चौराहे का नाम रख रही है."

उनके इस दावे के समर्थन में कम ही सबूत हैं कि भारत में मस्जिदें तोड़ी जा रही हैं लेकिन ऐसे संदेशों को पाकिस्तान में आसानी से समर्थन मिल जाता है.

गुम हो रहीं मूर्तियां

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान सार्वजनिक स्थलों पर कई मूर्तियां लगाई गई थीं हालांकि अब ज्यादातर को हटा दिया गया है.

इनमें से एक मूर्ति सर गंगा राम की थी जिन्होंने लाहौर में कई युगांतकारी दौर दिए. उनकी मूर्ति को 1947 के सांप्रदायिक दंगे के दौरान तोड़ दिया गया था.

दूसरी प्रमुख मूर्ति क्वीन विक्टोरिया की थी जिसे 1904 में मॉल रोड के चेरिंग क्रॉस स्क्वॉयर पर लगाया गया था. यह मूर्ति यहां 1974 तक थी लेकिन इस्लामिक समिट कॉन्फ्रेंस के वक्त इसे हटा दिया गया.

हालांकि बाद में लाहौर संग्रहालय में इसे रखा गया. दयाल सिंह. किंग एडवर्ड, भगत सिंह और लॉर्ड लॉरेंस की मूर्तियों का भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ.

प्रमुख पुरातत्वविद्, इतिहासकार और लाहौर संग्रहालय के पूर्व निदेशक सैफ-उर-रहमान दर का मानना है कि पाकिस्तान में मूर्तियां उतनी लोकप्रिय नहीं हैं. उनका कहना है, "पाकिस्तान में जिन्ना और लियाक़त अली खान की मूर्ति कहीं भी नहीं है."

दर का कहना है, "इतिहास एक निरंतरता है और कोई भी व्यक्ति इसे अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर अपना सकता है या ठुकरा सकता है लेकिन इतिहास को अपना मानने से इनकार नहीं किया जा सकता."

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