बेगुनाह क्यों स्वीकार रहे हैं गुनाह?

 गुरुवार, 3 जनवरी, 2013 को 12:21 IST तक के समाचार
जापान में लोगों को जबरस्ती जुर्म कबूलवाए जाने के मामले सामने आए हैं

क्या जापान में बेगुनाह लोगों को अपराध स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है? ये सवाल अब जापान के आम लोगों को परेशान कर रहा है.

हाल में जापान में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें बेगुनाह लोगों की गिरफ्तारी के सबूत मिले हैं और उन लोगों ने अपराध स्वीकार भी कर लिया है.

इसकी शुरुआत याकोहामा की एक वेबसाइट से हुई जब एक धमकी भरी पोस्ट वेबसाइट पर डाली गई.

इसमें लिखा गया था, “मैं गर्मियों से पहले प्राथमिक विद्यालय पर हमला कर सभी बच्चों को मार डालूंगा.”

इसके बाद इस तरह के कई मामले सामने आए और पुलिस की छानबीन के बाद चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया.

इस गिरफ्तारी में 19 साल के एक युवक को भी हिरासत में लिया गया जिसने अपराध को स्वीकार भी लिया.

लेकिन 9 अक्टूबर को असली अपराधी ने योजी ओचिआई नाम के एक वकील के पास ईमेल भेजा कि कैसे वो वायरस के ज़रिए किसी आम इंटरनेट उपभोक्ता के नाम से इस तरह के धमकी भरे ईमेल भेजते हैं.

पूछताछ पर सवाल

बेगुनाह शोजी सकुराई 29 साल तक जेल में रहना पड़ा

इसके बाद ये सवाल उठना लाज़मी था कि आखिर एक बेगुनाह को कैसे दोषी क़रार दिया जा सकता है.

तो आखिर किन परिस्थितियों में लोग उस अपराध को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं जो उन्होंने किए ही ना हों?

ओचियाई कहते हैं, “मेरे पास मेल आया तो मैं थोड़ा आश्चर्य में पड़ गया लेकिन इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि मासूम और बेगुनाह लोगों को अपराध स्वीकार करना पड़ रहा है.”

ओचियाई कहते हैं कि पिछले सालों में इस तरह के कई मामले सामने आए हैं.

उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि साइबर क्राइम के नाम पर होने वाले इस अपराध का शिकार कोई भी बेगुनाह हो सकता है जो इंटरनेट का इस्तेमाल करता हो.

ओचिआई ने जब इस पोस्ट को अपने ट्विटर अकाउंट पर डाला तो सैकड़ों लोगों ने जवाब लिखे और जिनमें ज्यादातर लोगों ने अपराधी से ज्यादा पुलिस की ज्यादा आलोचनात्मक की.

बेगुनाह को 29 साल की जेल

"पुलिस मुझसे दिन रात सवाल-जवाब करती रही और पांच दिन बाद जब मेरे पास मानसिक ताकत नहीं बची तो अंतत: मैंने स्वीकार कर लिया."

शोजी सकुराई, एक बेगुनाह जिसने 29 साल जेल में काट दिए

29 साल जेल में बिताने वाले शोजी सकुराई को उस हत्या और डकैती के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था जो उन्होंने किया ही नहीं था.

शोज़ी को जब गिरफ्तार किया था तो उनकी उम्र 20 साल थी और फिर अपनी बेगुनाही साबित करने में उन्हें 15 साल और लग गए.

शोजी कहते हैं, “मैं जब छोटा था तो काफी नटखट था और मैं और मेरे मित्र सुगियामा हत्या के मुख्य अभियुक्त बना दिए गए. हमारे साथ वैसा ही बर्ताव हुआ जैसे हम असली अपराधी हों.”

वो कहते हैं, “पुलिस मुझसे दिन रात सवाल-जवाब करती रही और पांच दिन बाद जब मेरे पास मानसिक ताकत नहीं बची तो अंतत: मैंने स्वीकार कर लिया.”

टोक्यो के टेंपल विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर जेफ किंग्स्टन कहते हैं. यह बहुत बड़ा साक्ष्य होता है. अगर आप किसी को अपराध स्वीकार करने के लिए तैयार कर लेते हैं तो अदालत उसे दोषी करार दे देती है.

जांच के सीमित अधिकार

जापान के जेल की एक तस्वीर.

जापान में कैदियों को बहुत नियमपूर्वक रहना पड़ता है.

जापान में अपराध के मामलों में सज़ा सुनाए जाने की दर 99 फ़ीसदी है और जिसमें ज्यादातर 'कबूलनामे' पर आधारित होते हैं.

इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि अपराध कबूलने के दौरान अभियुक्त को अपने बोझ को हल्का करने और पश्चाताप का मौका मिलता है. इससे उसकी सज़ा कम होने की संभावना भी होती है.

जापान की राष्ट्रीय पुलिस एजेंसी के लिए 25 साल से जासूस रहे योशिकी कोबायाशि कहते हैं कि जापान में पुलिस के सामने अपराध कबूलने की अवधारणा इसलिए भी है क्योंकि यहां पर पुलिस के पास जांच के सीमित अधिकार हैं और जांच से अधिक अपराधी के इकबालिया बयान को महत्व दिया जाता है.

लेकिन इसके बावजूद सवाल रह जाता है कि क्या सिर्फ इसलिए पुलिस के पास पर्याप्त जांच के अधिकार नहीं है तो किसी बेगुनाह पर गुनाह कबूलने का दबाव बनाया जाए. इस पर वकील योजी ओचिआई कहते हैं कि ये कहीं ना कहीं जापान की मनोवैज्ञानिक दिक्कत भी है.

उनका कहना है कि पारंपरिक तौर पर लोग ये मान कर चलते हैं कि वो प्रभावशाली लोगों के सामने खड़े नहीं हो पाएंगे इसलिए ज्यादातर मामले सामने ही नहीं आते.

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