ब्रिटेन में बनारस का कुआँ

  • 4 जनवरी 2013

ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में भारत और ब्रिटेन के रिश्तों में मज़बूती की काफ़ी बात होती है, ख़ास तौर पर आज जब भारत की तरक्की की तूती बोल रही है.

मगर रिश्ते मीठे तब भी थे, जब भारत ग़ुलाम था. लंदन के पास महाराजा का कुआँ इसी इतिहास का एक गवाह है.

लंदन से 60 किलोमीटर दूर, चिल्टर्न पहाड़ियों के पास, स्टोक रो नाम के एक छोटे से गाँव में एक कुआँ है जिसका नाम है महाराजा का कुआँ.

इस कुएँ को बनारस के महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह बहादुर ने बनवाया था.

(देखिए ग्लोबल इंडिया में इस सप्ताहः महाराजा का कुआँ)

दोस्ती की कहानी

महाराजा के कुएँ पर एक किताब – डिपिन्ग इन्टू द वेल्स – लिखनेवाली एंजेला स्पेन्सर हार्पर कहती हैं कि इस कुएँ की कहानी 1857 के सिपाही विद्रोह के समय से शुरू होती है.

उस समय अंग्रेज़ों की सेना में एक अफ़सर थे एडवर्ड एंडरसन रीड और ग़दर को कुचलने में साथ दे रहे थे काशी के नरेश. एडवर्ड और महाराजा साथ लड़े और दोनों की दोस्ती हो गई.

एडवर्ड बाद में सरहदी सूबे के गवर्नर बने और वहाँ उन्होंने एक बार दो भाइयों की ज़मीन की लड़ाई सुलझाने के लिए उनकी ज़मीन ख़रीद पैसा बाँटा और उस ज़मीन पर कुआँ खुदवा दिया क्योंकि वहाँ पानी की बेहद कमी थी.

एंजेला बताती हैं,”काशी नरेश ने जब ये सुना तो उन्हें बड़ा अच्छा लगा और उन्होंने कहा मैं भी ऐसा कुछ करना चाहता हूँ पर यहाँ मुश्किल है, काफ़ी भीड़ है यहाँ, तो मैं तुम्हारे (एडवर्ड) के गाँव में कुआँ खुदवाउँगा.

दरअसल एडवर्ड ने राजा को बताया था कि उसके गाँव में पानी की कितनी कमी है और कैसे गर्मियों में बच्चों की रसोई के लिए रखा पानी पी जाने को लेकर पिटाई तक हो जाती है.

और फिर महाराजा ने कुएँ के लिए सारी राशि दी और एडवर्ड ने इंग्लैंड लौटकर अपने गाँव में कुआँ खुदवाया जिसका नाम रखा गया – महाराजा का कुआँ.

साफ़ पानी

कुआँ 368 फ़ीट गहरा है यानी कुतुब मीनार से भी अधिक जिसकी ऊँचाई 238 फ़ीट है. कहते हैं कि पानी की बाल्टी खींचकर निकालने में पहले 10 मिनट लग जाया करते थे.

और ये सारा का सारा कुआँ केवल एक आदमी ने खोद डाला था, हाथों से. कोई साल-सवा साल लगा पूरा कुआँ तैयार होने में.

काफ़ी गहरा होने के कारण कुएँ का पानी बेहद साफ़ था. पहले-पहल कुएँ में 15-20 फ़ीट पानी हुआ करता था. अभी वहाँ 50 फ़ीट पानी है.

अन्य सुविधाएँ सुलभ होने के कारण अब कुएँ की ज़रूरत नहीं रह गई है. पर इसने कोई 70 साल तक गाँव के लोगों की प्यास बुझाई. कुएँ से पहले वहाँ लोगों को पोखरों के पानी पर निर्भर रहना पड़ता था.

बनारस से संपर्क

Image caption अंग्रेज़ी सेना में अफ़सर महाराजा के दोस्त एडवर्ड एंडरसन रीड इलाक़े के बड़े ज़मींदार थे

1886 में एडवर्ड एंडरसन रीड की मृत्यु के बाद से स्टोक रो गाँव का बनारस से संपर्क लगभग समाप्त हो गया.

दोबारा संपर्क हुआ 72 साल बाद और वो भी संयोग से. 1958 में ऑक्सफ़ोर्ड से एक पर्यटक बनारस गया और तब महाराजा ने उससे कुएँ के बारे में पूछा.

ये सुनकर कि कुआँ अभी भी है, महाराजा सक्रिय हुए. 1961 में जब ब्रिटेन की महारानी एलिज़बेथ बनारस गईं तो महाराजा ने उनसे कुएँ की सौवीं वर्षगांठ पर कुछ विशेष करने का अनुरोध किया. महारानी अपने साथ गंगा का पानी ले गईं जिसे कुएँ में मिलाया गया.

सौवीं वर्षगांठ पर 1964 में महारानी के पति ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा प्रिंस फ़िलिप हेलिकॉप्टर से गाँव गए और वहाँ उन्होंने कुएँ को देखा. इस दिन कुएँ से पानी भी निकाला गया जिसे स्मृति के तौर पर गाँव में अभी भी सहेजकर बोतल में रखा गया है.

अब 2014 में कुएँ की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ पर कुएँ के ट्रस्टी वर्तमान महाराजा से संपर्क करना चाहते हैं.

हम उनसे अगले साल कुएँ की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के आयोजन के बारे में संपर्क करना चाहते हैं और हमें आशा है कि ये हो पाएगा.

ट्रस्ट की सदस्य कैथरीन हेल ने कहा,”हम उनसे कुएँ की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के आयोजन के बारे में संपर्क करना चाहते हैं और हमें आशा है कि ये हो पाएगा.”

बनारस का कुआँ

बीबीसी ने महाराजा के कुएँ के संबंध में बनारस के वर्तमान महाराजा अनंत नारायण सिंह से संपर्क किया मगर उन्होंने इस संबंध में कोई रूचि दिखाए बिना केवल इतना कहा कि उनके पूर्वजों ने जो किया, अच्छा किया और इस बारे में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं.

महाराजा ने ये भी नहीं कहा कि उनके पूर्वजों ने इंग्लैंड के कुएँ की याद में बनारस में भी ठीक वैसा ही एक कुआँ बनवाया है.

काशी हिन्दू विश्विविद्यालय के पास ही नगवाँ इलाक़े में ये कुआँ महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह बहादुर की पत्नी ने अपने पति की याद में 1891 में बनवाया था.

बीबीसी को इस कुएँ की जानकारी दी महाराजा के निजी सचिव डॉ. जयप्रकाश पाठक ने जिन्होंने बताया कि इस कुएँ पर लगी पट्टिका पर इंग्लैंड के कुएँ की बात लिखी है.

डॉक्टर पाठक ने बताया,”इस पट्टिका पर लगे शिलालेख पर लिखा है कि यह कूप महाराज बनारस द्वारा इंग्लैंड में निर्मित कूप जो महाराजा का कूप के नाम से विख्यात है, उसी का प्रतिरूप है“.

बनारस का कुआँ अभी भी लोगों के काम आ रहा है. इंग्लैंड के कुएँ से अब पानी नहीं निकलता, पर बदलाव का ये मूक साक्षी अभी भी प्यास बुझा रहा है, भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत और रजवाड़ों के रिश्तों को समझना चाहने वालों की.

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