क्या युवाओं में ज़्यादा ही आत्म विश्वास है?

सफ़लता
Image caption शोध कहता है कि कामयाबी पाने की होड़ हर जगह मची है.

सफलता और आत्मविश्वास के बीच क्या कोई ताल्लुक़ है? इसी तरह के कुछ सवालों से जुड़े शोध में यह बात सामने आई है कि अमरीकी विश्वविद्यालय के ज्यादातर छात्र यह सोचते हैं कि वे बेहद ख़ास हैं.

आमतौर पर आत्मसम्मान को अच्छा माना जाता है लेकिन अगर ख़ुद के प्रति ऐसी भावना ज्यादा बढ़ जाए तो क्या ऐसी सोच सफलता की राह में बाधा भी बन सकती है? इस बारे में कई तरह की राय ज़ाहिर की गई है.

वर्ष 1966 में शुरू हुए अमरीकी फ्रेशमैन सर्वेक्षण में अब तक क़रीब 90 लाख लोगों ने हिस्सा लिया. इस सर्वेक्षण में छात्रों से यह पूछा गया था कि वे ख़ुद को किस तरह आंकते हैं?

आत्मविश्वास या गु़मान?

पिछले चार दशक में नाटकीय तौर पर ऐसे छात्रों की संख्या में इज़ाफ़ा़ हुआ है जो शैक्षणिक योग्यता, सफलता पाने की लगन, गणितीय क्षमता और आत्मविश्वास के लिहाज़ से ख़ुद को 'औसत से ऊपर' आंकते हैं.

Image caption शोध से पता चला कि लोग पढ़ने में ज्यादा वक्त बिताकर सफल होने का दावा कर रहे हैं

अमरीका की मनोवैज्ञानिक जीन ट्वेंगी और उनकी सहकर्मियों ने सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण किया है.

शोध में पाया गया कि स्व-मूल्यांकन की कुछ विशेषताएं जो कम व्यक्तिपरक होती हैं, मसलन सहयोग करने की भावना, दूसरों को समझने और आध्यात्मिकता जैसे गुण वक़्त के साथ बदले हैं या कम हुए हैं.

ट्वेंगी कहती हैं कि फ्रेशमैन सर्वेक्षण भले ही दर्शाता हो कि छात्रों में यह भावना बढ़ रही है कि उनमें लेखन क्षमता है लेकिन सामान्य मूल्यांकन से भी यह अंदाज़ा मिल जाता है कि 1960 के दशक के बाद वास्तव में छात्रों की लेखन क्षमता घटी है.

1980 के दशक के आख़िर में लगभग आधे छात्रों का कहना था कि उन्होंने एक हफ्ते में छह या इससे ज्यादा घंटे पढ़ाई की लेकिन वर्ष 2009 तक इस आंकड़े में एक-तिहाई इज़ाफ़ा हुआ. इसके साथ ही इस दौरान वैसे छात्रों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ जिन्होंने ख़ुद सफल होने का दावा किया.

आत्ममुग्धता है घातक

ट्वेंगी के एक दूसरे अध्ययन के मुताबिक़, 1979 के बाद से अमरीकी छात्रों में आत्मकेंद्रित होने और आत्ममुग्धता की भावना 30 फ़ीसदी तक बढ़ी है. कई लोगों का तर्क है कि यह ज़रूरी भी है लेकिन ट्वेंगी और उनकी सहकर्मी इसे नकारात्मक और घातक मानती हैं.

ट्वेंगी का कहना है, ''हमारी संस्कृति सुशील और नम्र व्यवहार को प्रोत्साहित करती है और ख़ुद के बारे में शेख़ी बघारने की भावना को अच्छा नहीं माना जाता.''

उनका कहना है कि परवरिश के बदलते तरीक़े, मशहूर होने की बढ़ती ख्वाहिश, सोशल मीडिया और आसानी से क़र्ज़ मिल जाने की वजह से लोग जितने सफल हैं, उससे कहीं ज्यादा सफल नज़र आते हैं, इस तरह आत्मकेंद्रित और आत्ममुग्ध होने की भावना बढ़ रही है.

Image caption शोध से पता चला कि लोगों में आत्मकेंद्रित होने की भावना बढ़ रही है

पिछले दो दशक में ज्यादा आत्मविश्वास, खु़द को प्यार करने और खु़द पर यक़ीन करने की भावना को ही सफलता का मूलमंत्र मान लिया जाता है. दिलचस्प बात यह है कि यह भरोसा बड़ी मज़बूती से स्थापित हो रहा है.

कैसे मिली प्रेरणा

कई किताबों से भी ऐसे विचारों को बल मिला है कि हमारे अंदर यह ख़ूबी है कि हम बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं, हमें खु़द में बस थोड़ा और आत्मविश्वास लाने की ज़रूरत है.

क़रीब 15,000 जर्नल ने भी अपने लेख में आत्म-सम्मान की बढ़ती भावना और वास्तविक ज़िदगी की सफलता मसलन शैक्षणिक सफलताएं, रोज़गार के मौक़े, लोकप्रियता, बेहतर स्वास्थ्य, खु़शी, क़ानून और सामाजिक नियमों को समर्थन देने की भावना के बीच ताल्लुक़ को समझने और विश्लेषण करने की कोशिश की है.

सफलता की दर

हालांकि ऐसे प्रमाण कम ही मिले हैं कि आत्म-सम्मान बढ़ने से सकारात्मक नतीजे और ठोस सफलता मिलती है.

ट्वेंगी कहती हैं, ''आपको यह भरोसा करना होता है कि आप कुछ कर सकते हैं और इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि आप ख़ुद को महान मानने लगें.''

उन्होंने एक मिसाल दी है कि अगर कोई व्यक्ति तैराकी सीखने की कोशिश कर रहा है तो उसका यह भरोसा उसके लिए घातक हो सकता है कि वह बेहतरीन तैराक है.

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