मैं, मेरी दादी और स्वामी विवेकानंद

  • 19 जनवरी 2013
स्वामी विवेकानंद
Image caption विवेकानंद ने पश्चिम का परिचय योग और ध्यान से कराया था.

पश्चिम को योग और ध्यान से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद के बारे में वहां कम ही लोग जानते हैं लेकिन भारत में इस बंगाली बुद्धिजीवी का अब भी बहुत सम्मान किया जाता है. इस महीने उनके जन्म के 150 साल पूरे होने जा रहे हैं.

सीधे चलते हैं न्यूयॉर्क एक ऐतिहासिक इमारत में.

बजरी पर कार के टायरों की चरमराहट, आने वाले तूफान की आशंका और हवाओं के साथ झूमते पेड़....

न्यूयॉर्क में दादी मां के घर की ऐसी कई भूली-बिसरी यादें मेरे जेहन में रह गई हैं.

और भी कई चीजें याद आती हैं. किसी स्वामी के बारे में हल्के में कही गई वो बात कि ये सोफा स्वामी का था, इसी कमरे में स्वामी सोया करते थे.

अपने कुत्ते के लिए मैं जिस बड़े से देवदार के पेड़ की टहनियां चुना करती थी, उस पेड़ को स्वामी का देवदार' कहा जाता था.

बातें और भी थीं. विक्टोरियन युग की महिलाओं की हैट और लंबे लिबास वाली धुंधली पड़ती तस्वीरें और उनके साथ खड़ा असाधारण व्यक्तित्व वाला एक हिंदुस्तानी युवक.

उस युवक ने सर पर साफा बांध रखा था और उसकी आंखें बेहद प्रभावशाली थीं.

अतीत के झरोखे से

Image caption कश्मीर में ली गई स्वामी विवेकानंद की तस्वीर.

1970 के दशक में मेरे लिए इन बातों के कोई मायने नहीं थे. मेरा नजरिया हाल में उस वक्त बदला जब मुझे मालूम चला कि वह स्वामी भारत के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक शिक्षकों में से एक थे.

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम को पूरब के दर्शन से परिचित कराया था. मेरे परिवार ने उस ज़माने में उन्हें अपने घर में रहने के लिए आमंत्रित किया था और स्वामी जी के काम के प्रकाशन में उनकी सहायता की थी.

वे एक बंगाली बुद्धिजीवी थे और हिंदू आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे. प्राचीन ग्रंथों की जटिल बातों को एक सहज और सरल से संदेश के जरिये पारिभाषित करने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को ही जाता है.

उन्होंने कहा था कि सभी धर्म बराबर हैं और ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर रहता है. शिकागो में हुए धर्मों के विश्व संसद से उन्हें दुनिया भर में ख्याति मिली.

इस धर्म संसद में विवेकानंद ने सहिष्णुता के पक्ष में और धार्मिक हठधर्मिता को खत्म करने का आह्वान किया. अजीब इत्तेफाक था कि वह तारीख 11 सितंबर की थी.

धर्म संसद में भाषण

‘अमरीका के भाईयों और बहनों’ कहकर उन्होंने अपनी बात शुरू की थी. प्रवाहपूर्ण अंग्रेजी में असरदार आवाज के साथ भाषण दे रहे उस संन्यासी ने गेरूए रंग का चोगा पहन रखा था.

पगड़ी पहने हुए स्वामी की एक झलक देखने के लिए वहां मौजूद लोग बहुत उत्साह से खड़े हो गए थे. इस भाषण से स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता बढ़ गई और उनके व्याख्यानों में भीड़ उमड़ने लगी.

ईश्वर के बारे में यहूदीवाद और इसाईयत के विचारों के आदी हो चुके लोगों के लिए योग और ध्यान का विचार नया और रोमांचक था.

अमरीका प्रवास के दौरान अपनी लंबी यात्राओं के बीच स्वामी विवेकानंद रिज़ली में हमारे घर ठहरा करते थे. सौ साल के बाद वह घर हमारे पूर्वजों के बाद अब स्वामी विवेकानंद के अनुयायियों के पास है.

जब मैं उस घर में लौटी तो कुछ छोटे-छोटे मगर अहम बदलावों को देखकर मुझे हैरत हुई. जिस घर में मैं उछल कूद मचाया करती थी अब वह जगह पूजास्थल के तौर पर इस्तेमाल की जा रही थी.

आध्यात्म की अनुभूति

Image caption रिज़ली हाउस, जहां विवेकानंद अपने अमरीका प्रवास के दौरान रहे थे.

झोपड़ीनुमा छत वाले उस घर की खूबसूरती को बरकरार रखने के लिए कई श्रद्धालु स्वेच्छा से लगे हुए थे.

उनके लिए यह महज किसी संपत्ति की देखभाल करना नहीं था, बल्कि वो इसे एक पवित्र स्थान समझते हैं.

विचारवान लोग यहां आते हैं और प्राचीन हिंदू ग्रंथों व वेदों के बारे में परिचर्चा करते हैं. यह सब कुछ शांति के साथ चलता रहता है. न्यू इंग्लैंड के इस हृदय स्थल में कहीं भारत पनप रहा है.

न्यू-जर्सी से आए एक भारतीय जोड़े ने बताया कि वह विवेकानंद की मौजूदगी को महसूस करना चाहते हैं. रामकृष्ण परमहंस की अनुयायी कैलिफोर्नियाई नन को वहां प्रव्राजिका गीताप्रणा के नाम से जाना जाता है. वहां रिट्रीट सेंटर चला रहीं प्रवराजिका गीताप्रणा ने मुझे पूरी जगह दिखाई.

घर में साथ टहलते हुए प्रवराजिका ने बताया, “उनका बिस्तर भारत भेज दिया गया है लेकिन यह वही कमरा है जहां वो सोया करते थे, इस भोजन कक्ष में वह खाना खाया करते थे”.

गीताप्रणा ने मुझे स्वामी का देवदार वृक्ष दिखाया और कहा कि इसे तुम्हारी परदादी ने लगाया था.

स्वामी विवेकानंद मेरी परदादी को 'जोई-जोई' कहा करते थे. वह उम्र भर उनकी दोस्त और अनुयायी रहीं.

उन दिनों कम ही देखा जाता था कि श्वेत महिलाएं और भारतीय एक साथ यात्राएं करते हों.

भारत में विवेकानंद को संत की तरह की पूजा जाता है लेकिन पश्चिम में अब भी वे लगभग अनजान हैं.

लेकिन प्रवराजिका कहती हैं, “मुझे नहीं लगता कि उन्हें बुरा लगेगा क्योंकि वो ना तो पूजे नहीं जाना चाहते थे और न ही अंनतकाल तक याद किए जाना चाहते थे. वह बस इतना चाहते थे कि लोग अपने भीतर के ईश्वर को खोज लें.”

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