सोशल नेटवर्किंग साइट्स से बदली पहचान

 बुधवार, 23 जनवरी, 2013 को 08:00 IST तक के समाचार

फ़ेसबुक और अन्य सोशल साइटों का इस्तेमाल बदल रहा है आम लोगों की पहचान.

सोशल नेटवर्किंग साइट मसलन फ़ेसबुक और ट्विटर आज कल आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन ये साइट्स महज आदतों में शुमार नहीं हुई हैं बल्कि इनसे आम लोगों का नजरिया बदल रहा है.

आप कौन हैं और दुनिया के किस कोने में रह रहे हैं, आपकी पहचान क्या है, अब इन सबको परिभाषित करने लगे हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स.

ब्रिटिश सरकार के मुख्य वैज्ञानिक की रिपोर्ट यही दावा करती है. ‘फ्यूचर आइडेंटिटी’ नामक इस रिपोर्ट को प्रोफेसर सर जॉन बेडिंगटन ने जारी किया है.

इसके मुताबिक आम लोगों की पहचान के जो परंपरागत तरीके रहे हैं, उन्हें सोशल साइट्स ने बेमानी बना दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक सोशल नेटवर्किंग साइट्स के इस्तेमाल के चलते आने वाले 10 सालों में दुनिया काफी हद तक बदल जाएगी.

बदल रही है पहचान

रिपोर्ट के मुताबिक इससे एक बड़ा बदलाव ये भी हुआ है कि सामुदायिक एकजुटता कम हो गई है. पहले जिन पैमानों पर समाज को एकजुट किया जाता था वे पैमाने अब लोगों पर बहुत ज़्यादा असर नहीं डाल रहे हैं.

मसलन धर्म, जाति, नौकरी और उम्र सोशल साइट पर आने वाले लोगों की पहचान की दृष्टिकोण के लिहाज से बहुत अहमियत नहीं रखते.

"अब लोग ज़्यादा समय तक सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनकी पहचान में बदलाव भी देखने को मिल रहा है."

प्रोफ़ेसर सर जॉन बेडिंगटन, ब्रिटिश शोधकर्ता

ये भी देखा गया है कि कुछ लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी काल्पनिक और सतही पहचान बना रहे हैं. लेकिन ये भी देखा गया है कि इन कोशिशों में वे अपनी पूर्वाग्रह से भरी पहचान से मुक्त होकर एक नई पहचान तलाश लेते हैं.

इसका पता शोधकर्ताओं को तब चला जब कुछ विकलांग लोगों ने उन्हें बताया कि ऑनलाइन गेम्स खेलना उन्हें सामाजिक तौर पर दूसरों के साथ बराबरी पर ला देता है.

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि निजी जीवन में जो लोग एकांतप्रिय होते हैं या कम आकर्षक पाए गए हैं वो सोशल साइट्स की दुनिया में कहीं ज़्यादा लोगों के सामने सहज रुप से ख़ुद को अभिव्यक्त कर पा रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक सोशल नेटवर्किंग साइट एक ओर समाज में बेहतर बदलाव ला रहे हैं तो दूसरी ओर ये आपको सामाजिक बहिष्कार की स्थिति तक भी पहुंचा सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक कहा गया है, “यह एक ओर सकारात्मक बल है जिसका फ़ायदा लंदन 2012 के ओलंपिक खेलों के आयोजन के दौरान दिखा. लेकिन दूसरी ओर यह एक विध्वंसक बल है, यह 2011 के दंगों में दिखा.”

बन रहा है नया समाज

हाल के दिनों में आम लोगों के बीच स्मार्ट फोन के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है. इसके चलते सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल भी सहज हुआ है. इससे अलग-अलग समूह के लोगों को सोशल नेटवर्किंग साइट के इस्तेमाल के जरिए एक मंच पर लाना आसान हो गया है.

जो दो लोग या समूह आपस में कभी मिले नहीं, वे भी सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए एक हो रहे हैं.

ये बातें भारतीय परिदृश्य में भी लागू होती हैं. दिल्ली की एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद जिस तरह लोग दिल्ली की सड़कों पर जुटे उसमें सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका बेहद अहम रही.

इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इंटरनेट से अब ज़्यादा लोग जुड़ रहे हैं और इससे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करने वाले लोग भी बढ़ रहे हैं और अब वे कहीं ज़्यादा देर तक साइट्स पर मौजूद होते हैं.

प्रोफेसर बेडिंगटन ने बीबीसी को बताया, “अब लोग ज़्यादा समय तक सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनकी पहचान में बदलाव भी देखने को मिल रहा है.”

ख़तरे भी कम नहीं

सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

वैसे इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोग अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी चीजों को काफी ज़्यादा शेयर कर रहे हैं. इससे कई बार उनके लिए मुश्किलें बढ़ रही हैं.

मसलन एक युवती को उसके नियोक्ता ने प्रमोशन देने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि उसने सोशल नेटवर्किंग साइट पर वैसी तस्वीरें डाल रखीं थीं जिनमें वह अपने विश्वविद्यालय के दिनों में अपने दोस्तों के साथ शराब पी रही थीं.

रिपोर्ट में ये भी आशंका जताई गई है अपराधी किसी के ख़िलाफ़ उनकी शेयर की गई जानकारी का बेज़ा इस्तेमाल कर सकते हैं. यानी अब ख़तरा प्राइवेसी भर की नहीं रहा, लेकिन लोगों में सोशल नेटवर्किंग इस्तेमाल करने की चाहत भी बढ़ रही है.

इस रिपोर्ट को तैयार करने के दौरान अलग-अलग तौर पर 20 बार इसकी समीक्षा की गई है, जिसमें ब्रिटेन और दुनिया भर के कंप्यूटर विज्ञान, अपराध विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञ शामिल हुए.

इस रिपोर्ट में ये भी कहा है कि 2011 में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में 60 फ़ीसदी लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मौजूद हैं जबकि 2007 में ये आंकड़ा 47 फ़ीसदी का था.

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