नज़रबंद रखने वाली सेना से है सू ची को लगाव

 रविवार, 27 जनवरी, 2013 को 19:29 IST तक के समाचार
सू ची

सू ची नेशनल लीग फॉर सॉलिडैरिटी की नेता हैं.

बर्मा की सैनिक सरकार ने लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची को 15 साल तक घर में नजरबंद रखा लेकिन इसके बावजूद उनका अपने देश की सेना से लगाव बरकरार है.

बीबीसी के एक रेडियो कार्यक्रम डेजर्ट आइलैंड डिस्क के लिए प्रस्तोता क्रिस्टी यंग से बातचीत में सू ची ने कहा कि बौद्ध धर्म के प्रति उनकी आस्था से उन्हें बर्मा के तानाशाह शासन का विरोध करने में सहायता मिली.

सू ची ने यह भी बताया कि संसद की सदस्यता लेने के समय भी यह आस्था उनके लिए मददगार रही.

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सू ची के पिता आंग सान को आधुनिक बर्मा का निर्माता कहा जाता है. उन्होंने ही बर्मा की सेना की भी नींव रखी थी.

सू ची के इस इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग बर्मा में ही उनके घर पर दिसंबर के महीने में की गई थी.

सेना से लगाव

"यह सच है, मुझे सेना से लगाव है"

सू ची, बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता

इंटरव्यू में सू ची ने स्वीकार किया, “यह सच है, मुझे सेना से लगाव है”.

उन्होंने कहा, “यह कहने के लिए मुझे लोग पसंद नहीं करेंगे. मेरी आलोचना करने वाले कई लोग हैं जैसा कि वे मुझे सेना के प्रचार का चेहरा कहते रहे हैं.”

सू ची ने बताया, “जिंदगी के इस मोड़ पर किसी चीज के लिए ‘पोस्टर गर्ल’ के तौर पर देखा जाना चापलूसी करने जैसा है. लेकिन मुझे लगता है कि यह सच है. मुझे सेना से बहुत लगाव है क्योंकि मुझे हमेशा यह लगा कि यह मेरे पिता की सेना है”.

सूची ने कहा कि बर्मा में सेना की भयानक कारगुजारियों के दौरान उन्हें उम्मीद थी कि वह खुद ही अपना सुधार करेंगी.

वर्ष 1990 में बर्मा में चुनाव के पहले सू ची को घर में नजरबंद कर दिया गया था. तब वह इंग्लैंड से अपनी मां की देखभाल के लिए स्वदेश वापस ही लौटी थीं.

बर्मा में सैनिक शासन के दौरान सू ची 15 वर्ष नज़रबंद रही थीं

राजनीतिक अशांति के दौरान पांच लाख लोगों के विरोध प्रदर्शन को संबोधित करने के बाद सेना ने उन पर कार्रवाई की थी.

राजनीतिक नजरबंदी

सू ची इंग्लैंड में अपने अकादमिशियन पति माइकल अरीस और दो बेटों के साथ रह रही थीं.

अरीस को सू ची से मिलने के लिए वीजा देने से इनकार कर दिया गया था. वर्ष 1999 में उनकी कैंसर से मृत्यु हो गई थी.

स्वदेश वापसी के बाद सू ची कभी अपने पति से नहीं मिल पाईं. साक्षात्कार में उन्होंने इससे जु़ड़ी भावनाएं भी जाहिर कीं.

नवंबर 2010 के चुनाव के ठीक बाद राजनीतिक बंदी सू ची को रिहा कर दिया गया. इस चुनाव के बाद बर्मा में सैन्य शासन का औपचारिक रूप से अंत हो गया.

देश की राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने वाली सू ची की पार्टी ने अप्रैल 2012 के उपचुनाव के बाद संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है.

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