सपनों की खातिर काबिलों का देश से पलायन

Image caption देश छोड़कर पलायन करने वाले अफगानों में ज्यादा संख्या पश्चिम के देशों में पनाह चाहने वालों की है

अफगानिस्तान सरकार को आजकल तालिबान और चरमपंथ के साथ-साथ एक नई समस्या का सामना करना पड़ रहा है. समस्या ये है कि सैकड़ों ऐसे लोग जो राजनयिक तैनाती पर या फिर सरकारी वज़ीफ़े लेकर देश के बाहर जा रहे हैं वो वापस नहीं लौट रहे.

इस वजह से देश के पुनर्निर्माण का काम प्रभावित हो रहा है. बीबीसी की एक तहक़ीक़ात में पता चला है कि ऐसी सरकारी यात्राओं पर जानेवालों में पत्रकार, छात्र, खिलाड़ी, राजनयिक और दूसरे सरकारी अधिकारी शामिल हैं.

ये जानकारी ऐसे समय सामने आई है जब अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना अफगानिस्तान छोड़ने की प्रक्रिया शुरु करनेवाली है और प्रतिभाशाली और क़ाबिल लोग देश से पलायन कर रहे हैं.

बीबीसी की जांच में एक ऐसी सूची सामने आई है जिससे पता चलता है कि आधिकारिक यात्रा पर विदेश गए अफ़गान राष्ट्रपति निवास के पांच कर्मचारी अब तक स्वदेश नहीं लौटे हैं.

इस बात की पुष्टि कूटनीतिक सूत्रों ने भी की है. एक अफ़गान अधिकारी के मुताबिक पिछले नौ महीनों में ग्यारह अफगान राजनयिक पश्चिमी देशों में अपना मिशन समाप्त करने के बाद भी नहीं लौटे हैं.

राजनयिकों का पलायन

अफगानिस्तान की संसद ने भी इस समस्या को लेकर एक अध्ययन करवाया है जिससे ये जानकारी सामने आई है कि विदेशों में सेवा के दौरान अपना पद छोड़कर पलायन करने वाले अधिकारियों की संख्या अनुमान से कहीं ज़्यादा है.

ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में अफगान राजदूत नासिर अहमद अनदिशा कहते हैं कि कई लोगों के लिए विदेश में रहना लुभावना होता है.

वे कहते हैं,"कई राजनयिक अफगानिस्तान नहीं लौटना चाहते क्योंकि यहां जीवन और काम की परिस्थितियां पश्चिमी मुल्कों से कठिन हैं. एक राजनयिक जो विदेश में दो तीन साल रह लेता है, उसकी ज़िंदगी बेहतर हो जाती है और उसे काबुल के मुकाबले ज्यादा महत्व मिल जाता है. अगर वो लौटता भी है तो उसे क्या मिल जाएगा. उनके बच्चों की ज़िंदगी कैसी होगी. इसीलिए वो लौटना नहीं चाहते."

अफगानिस्तान नहीं लौटने वालों में सिर्फ़ राजनयिक ही नहीं हैं. बीबीसी ने ऐसे 70 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की सूची तैयार की है जो यूरोप, अमरीका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से नहीं लौटे और वहां पनाह दिए जाने की मांग की.

मरियम ऐसी ही एक युवा पत्रकार हैं जो कुछ साल पहले तीन महीने के प्रशिक्षण के लिए यूरोप गई थीं. उनकी यात्रा को एक यूरोपीय एनजीओ ने प्रायोजित किया था.

दस साल पहले पाकिस्तान में शरणार्थी का जीवन बिताने के बाद जब वो अफगानिस्तान लौटी थीं तो उन्हें असुरक्षा और हिंसा का सामना करना पड़ा. शायद इसीलिए उन्होंने विदेश में रहने का फैसला लिया और नॉर्वे में शरण की मांग की.

वो कहती हैं,"जब मैंने नॉर्वे के हालात देखे तो सोचा कि मुझे वहीं रहना चाहिए और मैंने वहां की सरकार को समझाने की कोशिश की कि वो मुझे वहीं रहने दें. लेकिन ये भी सच है कि अगर मुझे वहां के मुकाबले 10 प्रतिशत भी सुविधाएं और सुरक्षा मिले तो मैं अफगानिस्तान लौटना चाहूंगी."

छात्रों का पलायन

Image caption तालिबान चरमपंथियों के लगातार हो रहे हमलों की वजह से अफगानिस्तान के लोगों का जीवन कठिन हो गया है.

कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक अमरीका ने साल 2011 में विदेश मंत्रालय का युवा आदान-प्रदान और शिक्षण कार्यक्रम सात साल के बाद रोक दिया था क्योंकि इस कार्यक्रम के तहत हाई स्कूल की पढ़ाई करने अमरीका गए 260 में से आधे विद्यार्थी अफगानिस्तान नहीं लौटे थे.

अफगानी छात्रों का एक समूह जो पोस्ट ग्रैजुएशन की पढ़ाई के लिए अमरीका गया था, उसके सदस्य जब वज़ीफ़े की समाप्ति के बाद अफगानिस्तान लौटे तो उन्होंने अमरीका में रह गए अपने समकक्षों की वापसी के लिए अभियान चलाना शुरू कर दिया. इस समूह का नेतृत्व करनेवाली आर्या निजात छात्रों के विदेशों में रुकने की प्रवृत्ति को लेकर चिंतीत हैं.

"जब अनुभवी और पढ़े-लिखे अफ़गान बाहर जाते हैं और नहीं लौटते तो इसका लोगों पर बुरा असर होता है. देश में बढ़ रहे निराशावाद, डर और असुरक्षा की एक वजह ये भी है कि शिक्षित और अनुभवी अफगान नागरिकों का देश से पलायन बढ़ रहा है."

अफगान छात्रों को मिलनेवाले वज़ीफ़े और प्रायोजित विदेश यात्राओं के ग़लत इस्तेमाल से देश के दूसरे अफगानी लोगों के लिए अवसर कम हो रहे हैं. विदेशों में अफ़गानियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम निलंबित हो रहे हैं और आधिकारिक यात्राओं पर विदेश जानेवाले लोगों की वीज़ा शर्तें भी कठोर कर दी गई हैं.

सरकार की चिंता

अफगानिस्तान में तैनात नैटो की सेना ने पुष्टि की है कि जिन अफगान पत्रकारों को संगठन की बैठकों को कवर करने के लिए यूरोप और अमरीका भेजा गया उनमें से कम से कम छह पत्रकार बाहर ही रह गए. काबुल में तैनात एक नैटो प्रवक्ता डोमिनिक मेडले का कहना है कि ऐसी घटनाएं चिंताजनक हैं.

वे कहते हैं, "ये विश्वास तोड़ने जैसी बात है. अगर आप लोगों को नए हुनर सीखने और अनुभव हासिल करने के लिए दुनिया की बेहतरीन जगहों पर जाने का मौका देते हैं और जब ऐसे लोग लौट कर नहीं आते तो विश्वास का हनन होता है."

वीज़ा नियमों में कड़ाई की वजह से अफगान खिलाड़ियों का एक समूह भी प्रभावित हुआ है जिसके देश लौटने का रिकॉर्ड ख़राब था. पिछले एक दशक में कम से कम साठ अफगान खिलाड़ियों ने प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने और प्रशिक्षण के लिए की गई अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का इस्तेमाल उन देशों में पनाह मांगने के लिए किया, इनमें मुक्केबाज़, क्रिकेटर और फुटबॉल खिलाड़ी शामिल हैं.

लेकिन अधिकारी अब इस चलन पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहे हैं. अब ये सुझाव दिया जा रहा है कि राजनयिकों को काबुल में ऐसी सुविधाएं दी जानी चाहिए ताकि उन्हें बाहर जाने से रोका जा सके.

लेकिन सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बरकरारा हैं और अंतरराष्ट्रीय सेना की 2014 में अफगानिस्तान से वापसी की तैयारी चल रही है. इस बीच केवल आर्थिक सुविधाओं के बल पर बेहतर जीवन की चाह में अफगानिस्तान से बाहर जाने की कोशिश कर रहे लोगों को रोक पाना इतना आसान नहीं होगा.

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