कैडरों का विश्वास जीतना प्रचंड की चुनौती

  • 2 फरवरी 2013
नेपाल
Image caption नेपका माओवादी पार्टी में आपसी मतभेद दूर करना सम्मेलन में बड़ी चुनौती है

नेपाल में सशस्त्र विद्रोह के बाद से पहली बार माओवादियों का ये महाधिवेशन हो रहा है.

इस दौरान नेपाल के माओवादियों ने सशस्त्र संघर्ष से लेकर शांतिपूर्ण संघर्ष और लोकतंत्र तक का सफ़र तय किया है.

काठमांडू स्थित पत्रकार सीके लाल पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड के लिए अपने कार्यकर्ताओं से ये कहना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा कि अब सशस्त्र संघर्ष अप्रासंगिक हो गया है और अब आगे का संघर्ष शांतिपूर्ण और निर्वाचन प्रणाली के तहत होगा.

दूसरी बात ये कि सशस्त्र संघर्ष से शांतिपूर्ण राजनीति में आने के बाद माओवादियों में विभाजन हो गया है. इसका एक धड़ा जो कि मोहन वैद्य के नेतृत्व में है, वो अभी भी सशस्त्र संघर्ष का पक्षधर है.

प्रचंड की चुनौती

ऐसे में प्रचंड के सामने ये भी बड़ी चुनौती है कि वो अपने कार्यकर्ताओं को ये बताने में कैसे कामयाब होंगे कि उन्हीं के नेतृत्व में असली माओवादी पार्टी है और इसी में सभी का भविष्य सुरक्षित है.

इसके अलावा प्रचंड को अपने दूसरे कार्यकाल के लिए अपने कार्यकर्ताओं का समर्थन लेने के लिए भी ये फ़ोरम काफ़ी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रचंड और मौजूदा प्रधानमंत्री और पार्टी के उपाध्यक्ष डॉक्टर बाबूराम भट्टाराई के बीच मतभेद की ख़बरें आती रहती हैं.

माओवादी लड़ाकों को सेना में भर्ती करने का मामला अभी ठंडा नहीं पड़ा है.

Image caption माओवादी कैडरों को सेना में भर्ती करना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है

शुरुआत में तो ये संख्या 33 हज़ार थी लेकिन फ़िलहाल दो हज़ार के क़रीब लोग ऐसे हैं जिन्हें सेना में भर्ती करना सरकार और पार्टी के सामने बहुत बड़ी चुनौती है.

लाल कहते हैं कि नेपाल अब गणतंत्र बना है और इसमें सिर्फ़ माओवादियों का ही योगदान नहीं था बल्कि दूसरे राजनीतिक दल भी इसमें शामिल थे. ऐसे में पूर्व माओवादी लड़ाकों सेना में समायोजन अब भी बहुत बड़ी समस्या है.

संविधान

नेपाल में संविधान सभा के गठन का मामला भी लटका हुआ है. नेपाल की राजनीति अभी साफ़ तौर पर दो ख़ेमों में बँटी हुई है.

एक ख़ेमे का नेतृत्व माओवादी कर रहे हैं जिनका ये सम्मेलन है और दूसरी संसदीय पार्टी नेपाली कांग्रेस है. इन दोनों के बीच में समझदारी के बग़ैर संविधान सभा का निर्वाचन असंभव दिखता है.

इसलिए जब तक इनके बीच लेन-देन के लिए माओवादी नेतृत्व नया जनादेश लेकर नहीं आता तो ये जोखिम ले नहीं सकते और बिना इनके जोखिम लिए हल नहीं निकल सकता.

इसके साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आश्वस्त करने के लिए भी ये सम्मेलन एक महत्वपूर्ण अवसर बनेगा और पुष्प दहल कमल और बाबूराम भट्टाराई को इसका लाभ उठाना चाहिए.

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