अबू धाबी के भारतीय दुकानदारों का दर्द

Image caption पिछले एक महीने में अबू धाबी में कई किराना दुकानें बंद हो गई हैं.

अबू धाबी में छोटी किराना दुकानों के ज़रिए अपनी ज़िन्दगी बनाने वाले भारतीय अब वहां से लौटने को मजबूर हो रहे हैं.

दरअसल यूएई की हुकूमत सभी किराना दुकानों को एक मानक रूप देना चाहती है, यानि साफ-सफाई, माप-तोल, सुरक्षा वगैरह का एक ऊंचा स्तर.

मगर इसकी मार छोटे दुकानदारों पर पड़ रही है जिसमें ज्यादातर भारतीय मूल के लोग हैं.

पहली जनवरी से खाद्य विभाग के ये नए नियम लागू हुए और कुछ दुकानदारों ने इनके मुताबिक बदलाव भी किए. मगर हर दुकानकार के पास या तो इतने पैसे नहीं हैं या उनकी दुकान इतनी बड़ी नहीं है.

ऐसे लोगों के लिए दुकान के दरवाज़े ही बंद नहीं हुए बल्कि यूएई में रहने का विकल्प भी ख़त्म हो गया है क्योंकि वहाँ के क़ानून के हिसाब से कारोबार बंद होने के बाद उन्हें देश छोड़ना पड़ेगा.

सभी दुकानों का ऊंचा स्तर

अबू धाबी के टैंकर माई के छोटे से इलाक़े में किराने की 20 दुकानें बंद हो चुकी हैं.

भारत से बीस साल पहले अबूधाबी गए सुलेमान की दुकान भी इनमें से एक है. उन्हें अपनी दुकान को नए क़ानून के मुताबिक़ बनाने के लिए लगभग साढ़े बारह लाख रुपए चाहिए जो उनके पास नहीं हैं.

सुलेमान कहते हैं, “नया क़ानून आ गया है, नए क़ानून के मुताबिक़ हमें नई छत डालनी होगी, अपने तराज़ू और काउंटर बदलने होंगे, यहाँ तक कि शेल्फ़ भी बदलना होगा, वे चाहते हैं कि सब कुछ अच्छा दिखे और हर दुकान का स्टैंडर्ड एक जैसा हो.”

Image caption सुलेमान के मुताबिक उनके पास नए नियम लागू करने के लिए पैसे नहीं हैं.

वहीं अबू धाबी फूड कंट्रोल अथॉरिटी का कहना है कि ये बदलाव बहुत ज़रूरी हैं.

मोहम्मद जलाल अल रायसी ने बीबीसी को बताया, “यह बदलाव खाने के सामान को साफ़ सुथरा और सुरक्षित बनाने के लिए है. यह सारे बदलाव उपभोक्ताओं की सुविधा को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं. हर दुकान में सुरक्षा, सफ़ाई, माप-तौल और रख-रखाव के स्तर अलग-अलग हैं जिनमें हम एकरूपता लाना चाहते हैं.”

उपभोक्ताओं के लिए?

केरल से यूएई पहुँचे मोहम्मद बरसों से किराना दुकान चला रहे हैं, उन्होंने अपनी दुकान नए क़ानून के मुताबिक बना ली है.

मोहम्मद कहते हैं, “पहले मुझे पूरा यकीन नहीं था, फूड कंट्रोल अथॉरिटी ने सब कुछ समझाया फिर मैंने बदलाव करने का फ़ैसला किया, बदलाव के बाद से बिक्री बढ़ी है और ग्राहक भी खुश हैं.”

मगर स्थानीय निवासी, जिनमें से तकरीबन पचास प्रतिशत भारतीय हैं, इस बदलाव से ख़ुश नहीं, क्योंकि उनके आसपास की ज़्यादातर किराना दुकानें बंद हो गई हैं.

लोगों के मुताबिक अब अगर टेलीफ़ोन कार्ड जैसी छोटी सी चीज़ ही ख़रीदनी हो तो बहुत दूर जाना होता है जिसमें पेट्रोल और वक्त का भी हर्जाना होता है.

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