बलात्कार के बाद की पीड़ा

लॉरा न्‍यूमेन अन्‍नापोलिस, मैरीलैंड में रहती हैं. इनके साथ 18 साल की उम्र में बलात्‍कार हुआ. अपराधी जेल में है. लॉरा तथा अन्‍य महिलाओं पर यौन हमलों के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहा है.

पढ़िए उनकी कहानी उनकी ही ज़ुबानी:

"मैं तब कम्‍युनिटी कॉलेज में थी. खर्चा चलाने के लिए वेटर का काम करती थी. उस दिन शाम को जब घर आयी, मेरा रूममेट अपनी प्रेमिका से मिलने गया हुआ था. वह मेरे ही रेस्‍तरां में काम करता था. मैं घर पर अकेली थी.

तब रात के करीब बारह या एक बज रहे होंगे. मैं सो रही थी. तभी अपार्टमेंट में हुए किसी शोरगुल से मेरी नींद खुली. मुझे लगा कि मेरा रूममेट लौट आया है. जैसे ही मैं उठने लगी, मेरे चेहरे को किसी ने तकिये से दबा दिया और सिर पर बंदूक तान दी. ऐसी हालत में मेरा बलात्‍कार किया गया.

वे बहुत ही बुरे दिन थे. मुझे साफ़ दिख रहा था कि मेरे घर वालों को मेरे साथ हुई बलात्‍कार की घटना पर विश्‍वास नहीं था और यह भी स्‍पष्‍ट हो गया था कि पुलिस भी मेरा यकीन नहीं कर रही है. उन्‍हें लग रहा था कि मेरा बलात्‍कार नहीं हुआ और मैं अपने गर्भ को छुपाने के लिए कोई नाटक कर रही हूं. मेरे केस की छानबीन कभी नहीं हुई.

इन सबका परिणाम यह हुआ कि मैं भयंकर तनाव में रहने लगी. क्‍योंकि एक तो मैं अकेली ही इस मुसीबत का सामना कर रही थी, और दूसरे, ऐसी परिस्थिति के लिए मानसिक रूप से मैं कतई तैयार नहीं थी.

मुझे घर वापस जाने के लिए मजबूर किया जाने लगा. आप सोचिए कि वे मेरे साथ हुए बलात्‍कार को सच नहीं मान रहे थे. वे कुछ भी और मान सकते थे मगर ये नहीं कि मेरा बलात्‍कार हुआ होगा.

इस तरह के माहौल में रहने को मजबूर होना बेहद तनाव भरा साबित हो रहा था.

जब तक मैं 21 साल की नहीं हो गई, तब तक मैं घर से बाहर निकलने में असमर्थ रही. फिर कई कई सालों का लंबा संघर्ष. कभी वो भी वक्‍त था जब खाना भी मुहाल था. कभी किसी से नजदीकी संबंध नहीं बनाए, सबसे दूरियां बनाए रखीं.

लंबे समय तक लगातार डर में जीती रही. मैं कहना चाहूंगी कि कुछ भी नहीं बदला है, वही परिस्थितियां आज भी हैं. सभी रेप सर्वाइवर जिनसे मैं मिली हूं, लगातार भय में जी रहे हैं. यह भय ताउम्र उनका पीछा नहीं छोड़ता.

मैं इसे मौत से बदतर जिंदगी कहूंगी. इससे अच्‍छा तो आप मुझे मार ही डालो. इन सबसे उबर पाना बहुत मुश्किल है. आप भले ही इस हालात को पूरी तरह बदल नहीं सकते, मगर मुझे लगता है कि इस अपराध की धारणा को बदलने का सबसे जरूरी उपाय है, बलात्‍कार की शिकार औरतें इस अपराध के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें.

कुछ मौकों पर आपको तय करना होता है. या तो आप आगे बढें या वहीं ठहर जाएं. मेरे लिए तब एक-एक पल एक-एक दिन के बराबर था. अब मैं 23 साल की हो चुकी थी.

मैंने अपना ध्‍यान पूरी तरह कैरियर बनाने और खुद के लिए जिंदगी संवारने में लगा दिया था. मैंने खूब मेहनत की और लंबे समय तक काम किया. अपनी सारी ऊर्जा को निजी संबंध बनाने में नहीं, बल्कि अपने कैरियर में लगाया. एमबीए किया.

कड़ी मेहनत की बदौलत एक के बाद एक सफल नौकरी पाती चली गई. और 30 साल की होते-होते खुद को आर्थिक रूप से बिल्‍कुल सुरक्षित कर लिया.

तो बलात्‍कार के 19 साल गुजर जाने के बाद भी मैं उस केस को फिर से शुरू करने के प्रति दृढ़संकल्‍प थी. सालों साल मैंने जो कोशिश की, मैं उसके बारे में दृढ़ नहीं थी, मगर मेरी दृढ़ता करियर शुरू करने और बिजनेस में सफल होने के रूप में सामने आई.

पुलिस मेरे केस को दोबारा शुरू करे, इस मकसद से मैंने मुहिम चलाई. मैने सबकी मदद ली और अंतत: मुझे उस जासूस का नाम मिला जो पुराने और ठंडे पड़ चुके मामलों को उठाता था. उसने मेरा केस अपने हाथों में लिया और तीन दिनों में सुलझा दिया.

वारदात के समय के सारे सबूत लगभग नष्‍ट हो चुके थे. लेकिन उंगलियों के निशान, जो कि लंबे समय तक रहते हैं, उसके चलते अपराधी की शिनाख्‍त हो सकी. वहां मौजूद उंगलियों के निशान उस व्‍यक्ति के थे, जो अक्‍सर जेल आता-जाता रहता था.

अपराधी को जब सजा सुनाई गई, ऐसा लगा मानो मैं किसी कैद से आज़ाद हो गई.

आज़ादी सबसे अच्‍छा शब्‍द है मेरे लिए क्‍योंकि अब कोई घेरा नहीं था. जब न्‍याय हुआ, तो कोई बोझ हटा. यह सब मेरे लिए बहुत उत्साहित करने वाला था. अब बस मैं एक सप्‍ताह के लिए सो जाना चाहती थी. यह बेहद महत्‍वपूर्ण था मेरे लिए, जीवन बदल देने वाला.

जिस दिन अभियोग पत्र दाखिल किया गया, उसी दिन ऐसा हुआ कि मैं अपने भावी पति से मिली. यह मात्र संयोग था. अत: मैंने 39 साल की उम्र में शादी की. अब मेरे दो बच्‍चे हैं, एक बेटा और एक बेटी."