नताल्‍या, 26 साल, रूस

नताल्‍या रुस में ही कहीं अपने पति और बेटी के साथ रहती है. उनके साथ 2007 में उस इंसान ने बलात्‍कार किया, जिससे उनकी एक महिला मित्र ने मिलवाया था. वे एक अपार्टमेंट में कुछ परिचितों से मिलने गए थे. उस महिला मित्र के वहां से निकल जाने के बाद नताल्‍या के साथ बलात्‍कार हुआ. उस बलात्‍कारी के दो दोस्‍त वहां मौजूद थे और उन्‍होंने इस बात की गवाही दी. वह आदमी दोषी पाया गया और उसे पांच साल कैद की सजा हुई. अब वह रिहा हो चुका है.

नताल्या की कहानी पढ़िए उनकी ही ज़ुबानी:

"ऐसा कुछ होने पर, कुछ औरतें अपना जीवन खत्‍म कर देना चाहती हैं, कुछ शराब में डूब जाती हैं. मैंने दोनों किया. जब मैं शराब पीती थी, सब कुछ भूल जाती थी.

मगर फिर, जब नशा उतरता है, आपको पहले से भी बुरा महसूस होता है. लगता है सब कुछ खत्‍म हो गया. फिर यह ख्‍याल आता है कि भविष्‍य में... अब कभी आपको वह साथी नहीं मिलेगा जिससे आपको प्‍यार हो जाएगा और जिससे आप शादी कर सकेंगे.

इस घटना के होने के एक या दो सप्‍ताह के बाद, मैंने अपनी बिल्डिंग की छठी मंजिल से कूद कर जान देने की कोशिश की. मेरे दोस्‍त को मेरी हालत का जब अंदाजा हुआ, उसने कहा कि मुझे इस बारे में कुछ करना चाहिए. मुझे किसी मनोविश्‍लेषक की मदद लेनी चाहिए.

मेरे दोस्‍त मुझे अकेला छोड़ने से डरते थे. हम सबने मिलकर, वूमेन हॉटलाइन को फ़ोन किया और उनके बताये अनुसार वूमेन क्राइसिस सेंटर पहुंचे. वहां सलाह दी गई कि मुझे पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करनी चाहिए, मगर मैं इससे खुद ही निपटना चाहती थी.

मैंने सोचा था कि अपने कुछ दोस्‍तों से उस आदमी को ढूंढने के लिए कहूंगी और फिर उसकी जमकर पिटाई करके अपना बदला ले लूंगी.

आखिर में हम अभियोजन पक्ष के वकील के पास गए. पुलिस में जाने के बाद अगला चरण यही होता है. मुझे लगा कि यह सबसे कारगर उपाय है - उन्‍होंने मामले पर फौरन काम करना शुरू कर दिया. उस अभियोक्‍ता ने हमें पुलिस के पास भेजा.

हैरानी की बात है कि पुलिस स्‍टेशन में मेरे साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं हुआ. उनका रवैया अच्‍छा था. क्राइसिस सेंटर के मनोविश्‍लेषक ने मेरा साथ दिया, पूछताछ के दौरान वह मेरे साथ बना रहा.

आमतौर पर, मैं अपने साथ हुए इस हादसे के बारे में किसी से बात नहीं करती थी. इसके बारे में अपनी मां तक को मैंने 2008 में जानकारी दी. वह रो पड़ी.

उसने बताया कि ऐसा ही कुछ उसके साथ भी हो चुका है. वह पूरी तरह मेरे साथ थी. मेरे पति इस बारे में जानते हैं. समय आने पर अपने पड़ोसियों को भी मैंने सब कुछ बता दिया.

मुझे लगता है कि अधिकारियों ने वह सब किया, जो वे कर सकते थे बल्कि मेरे मामले में ज्‍यादा ही प्रयास किया.

मुझे अच्‍छी तरह पता है कि रूस में ऐसा हमेशा नहीं होता. मैं भाग्‍यशाली निकली. जज मेरे हालात समझ रहे थे, वकील भी बढ़ि‍या आदमी था. वे सभी पुरुष थे. इस सच्‍चाई को जानने के बाद भी कि मैं एक छात्रा थी और वहां अपनी मर्जी से गई और खुद को मुसीबत में डाला था, सबने मेरी मदद की.

अंतत: जब फैसला सुनाया गया, ऐसा महसूस हुआ मानो सीने से कोई भारी बोझ हट गया हो.

मैं रो पड़ी. ये खुशी के आंसू थे. ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरा जीवन अब शुरू हो हुआ है और मैं क्राइसिस सेंटर कभी गई ही नहीं. उस समय मैं कानून की छात्रा थी, इसलिए मुझे अपने अधिकारों की भी जानकारी थी.

मैं शहर लौट गई. वहां अपने होने वाले पति से मिली. शादी की. और एक दूसरे शहर की ओर चल पड़े, जहां हम अभी रहते हैं. मेरी एक बेटी है. मैं आज कामयाब हूं."