छोटी सी घटना ने छेड़ी नस्लवाद पर बड़ी बहस

Image caption जेरेमी फर्नांडेज से इस घटना के बाद छह हजार लोगों ने संपर्क किया है

जेरेमी फर्नांडेज ऑस्ट्रेलिया में खबरों की दुनिया का जाना माना नाम है लेकिन आजकल वो खुद सुर्खियों में हैं.

पिछले दिनों उनके साथ बस में हुई एक छोटी सी घटना ने देश में नस्लवाद को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है.

जेरेमी की जन्म मलेशिया में हुआ था और उनके पूर्वजों का संबंध दक्षिण भारत से रहा है. जेरेमी की उम्र 13 साल थी जब उनका परिवार ऑस्ट्रेलिया जा कर बस गया.

अब जेरेमी ऑस्ट्रेलिया के सरकारी टीवी चैनल एबीसी के जाने माने न्यूज एंकर हैं और उनकी कामयाबी ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले प्रवासी लोगों के लिए एक मिसाल है.

लेकिन पिछले दिनों उन्हें नस्लवाद का सामना करना पड़ा जिस पर अब ऑस्ट्रेलिया में गरमागरम बहस हो रही है.

'सबसे मुश्किल 15 मिनट'

जेरेमी बताते हैं कि वो सिडनी में एक बस में सफर कर रहे थे कि एक छोटी सी लड़की उनकी दो साल की बेटी को चिकोटी काट रही थी और तंग कर रही थी. इससे बचने के लिए जेरेमी ने अपनी बेटी के ऊपर हाथ रख लिया. लेकिन वो लड़की फिर भी नहीं मानी. उसने जेरेमी को चिकोटी काटनी जारी रखी.

उन्होंने ये कहते हुए बच्ची को समझाने की कोशिश की, “ये मेरा हाथ है.” इसके बाद लड़की की मां भी इस मामले में शामिल हो गई.

जेरेमी बताते हैं, “उसने मुझे गालियां देनी शुरू कर दीं. मुझ पर आरोप लगाया कि मैं सीट के पीछे हाथ ले जाकर उसकी बेटी को छू रहा हूं, जबकि मैंने ऐसे कुछ भी नहीं किया था.”

इसके बाद तो नस्लवादी टिप्पणियों की झड़ी लग गई. जेरेमी बताते हैं, “वो मेरी जिंदगी के सबसे मुश्किल 15 मिनट थे.” जेरेमी की बेटी ने भी ये सब गालियां सुनीं.

बस से उतरते हुए उन्होंने ड्राइवर से इसका जिक्र किया. इस पर ड्राइवर बोला, “दोस्त, गलती तुम्हारी है. तुम्हें दूसरी जगह बैठ जाना चाहिए था.”

जेरेमी ने इस वाकये का जिक्र ट्विटर पर किया और ये बात जंगल में आग की तरह फैल गई.

उन्होंने लिखा, “जो भी ये समझता हूं कि नस्लवाद खत्म हो गया है, तो ये उसकी भूल है. ये बड़े दुख की बात है कि 2013 में भी एक सांवले व्यक्ति को अपनी बच्ची को यह समझाना पड़ता है कि नस्लवादी टिप्पणियों पर कैसे संयम बनाए रखें.”

Image caption सिडनी में 2005 में विभिन्न गुटों के बीच मतभेद ने दंगों का रूप ले लिया था

पिछले शुक्रवार से लगभग छह हजार लोगों ने जेरेमी से संपर्क किया है.

उचित प्रतिनिधित्व नहीं

ऑस्ट्रेलिया में 1788 में गोरे लोगों की बस्तियां बसने के बाद से ही नस्लवाद एक समस्या रही है.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऑस्ट्रेलिया की 75 लाख की आबादी में 90 प्रतिशत एंग्लो-सेल्टिक यानी ब्रितानी और आयरिश मूल के थे.

तब से ऑस्ट्रेलिया की आबादी तिगुनी हो गई है और इनमें से 45 प्रतिशत ऐसे हैं जिनके माता पिता में से कोई एक देश से बाहर जन्मा है.

ऑस्ट्रेलिया इस तरह विविध आबादी वाला देश है कि वहां 260 भाषाएं बोली जाती हैं. ऐसे में वहां नस्लवादी भेदभाव और असंवेदनशीलता के मामले आम हैं.

बहुसंस्कृतिवाद पर किताब लिखने वाले टिम सौटफॉमासेन नस्लवादी घटनाओं के लिए वरिष्ठ प्रबंधन, सेना और संसद में प्रवासी लोगों का उचित प्रतिनिधित्व न होने को जिम्मेदार बताते हैं.

वो कहते हैं कि संसद में सिर्फ तीन सांसदों का होना गैर-यूरोपीय होना कार्यस्थलों पर नस्लवादी भेदभाव की समस्या को रेखांकित करता है.

खुद सौटफॉमासेन लाओस से ऑस्ट्रेलिया गए शरणार्थी माता पिता की संतान हैं और उन्हें कई बार नस्लवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा है और इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब में विस्तार से किया है.

लेकिन वो कहते हैं, “जेरेमी जैसे वाकये हर रोज होते हैं लेकिन वो पूरी तरह ऑस्ट्रेलियाई समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.”

जेरेमी फर्नांडेज भी इस बात से सहमत हैं और कहते हैं कि “ऑस्ट्रेलिया एक नस्लवादी देश नहीं है”, लेकिन इस तरह की घटनाएं हतोत्साहित करती हैं. वो कहते हैं, “अगर एक महीने में एक बार भी ऐसी घटना होती है तो साल में 12 बार आपको ऐसे हालात से गुजरना पड़ता है.”

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