'श्रीलंकाई सैनिकों ने किया तमिलों का बलात्कार'

  • 26 फरवरी 2013
Srilanka
Image caption रिपोर्ट के मुताबिक 2006 में संघर्षविराम टूटने के बाद तमिलों के ख़िलाफ यौन हिंसा के मामलों में भारी इज़ाफ़ा हुआ था.

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि श्रीलंकाई सुरक्षा बलों ने हिरासत के दौरान तमिलों के साथ बलात्कार किया था.

रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2012 के बीच हिरासत में लिए गए पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार के मामलों का अध्ययन किया गया. इन लोगों को तमिल विद्रोहियों के साथ कथित संबंधों के कारण हिरासत में लिया गया था.

इस रिपोर्ट के आधार पर ह्यूमन राइट्स वॉच ने श्रीलंका सरकार से इन मामलों की जाँच कराने का आग्रह किया है. हालांकि श्रीलंका सरकार मानवाधिकार संगठनों के आरोपों को खारिज करती आई है.

देश में 26 सालों तक चले गृहयुद्घ के बाद 2009 में सेना ने तमिल विद्रोहियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी थी. माना जाता है कि तमिलों के लिए अलग देश की माँग कर रहे एलटीटीई के ख़िलाफ लड़ाई में लगभग एक लाख लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था.

निर्णायक लड़ाई में दोनों पक्षों ने एक दूसरे के ख़िलाफ मानवाधिकार हनन के आरोप लगाया था जब देश के उत्तरी इलाक़े में हज़ारों आम नागरिक युद्धक्षेत्र में फंस गए थे.

यौन अपराधों में इज़ाफ़ा

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2006 में संघर्षविराम टूटने के बाद सुरक्षा बलों की ओर से यौन अपराधों में भारी बढ़ोतरी हुई थी. इनमें से अधिकांश मामले राजनीति से प्रेरित थे.

रिपोर्ट में कहा गया है, “लड़ाई के दौरान और मई 2009 में संघर्ष समाप्त होने के बाद एलटीटीई के संदिग्ध सदस्यों और समर्थकों से ख़ुफिया सूचना उगलवाने के लिए सेना और पुलिस ने बलात्कार जैसा गैरक़ानूनी तरीक़ा अपनाया था.”

ह्यूमन राइट्स वॉच ने बलात्कार के 75 कथित मामलों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है. इनमें 31 पुरुष, 41 महिलाएं और 18 साल से कम आयु वाले तीन किशोर शामिल थे. इन सभी लोगों को तमिल विद्रोहियों के साथ संबंधों के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

मानवाधिकार संगठन ने ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, भारत, मलेशिया और इंडोनेशिया में रह रहे ऐसे लोगों का साक्षात्कार लिया जो श्रीलंका में हिरासत में रहे थे.

यह प्रक्रिया एक साल चली थी और सरकारी पाबंदियों के कारण इसे गुपचुप तरीके से अंजाम दिया गया था. यही वजह है कि हिरासत से बाहर आ चुके लोगों से ही संपर्क किया जा सका. फिलहाल हिरासत में रह रहे लोगों से बात नहीं हो सकी.

प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के मुताबिक यौन अपराधों में शामिल लोगों में श्रीलंकाई सेना, पुलिस और सरकार समर्थक तमिल अर्द्धसैनिक बलों के सदस्य शामिल हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, “इन सभी मामलों में सुरक्षा बलों ने बलात्कार और यौन हिंसा के साथ-साथ यातना और अमानवीय कृत्यों को भी अंजाम दिया.”

मानवाधिकार संगठनों पर कड़ी नज़र

Image caption श्रीलंका में गृहयुद्घ के दौरान हज़ारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था.

रिपोर्ट कहती है, “उत्तरी श्रीलंका में कभी एलटीटीई के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे इलाक़ों में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है और मानवाधिकार संगठनों पर कड़ी नज़र रखी जा रही है जिससे लोग मानवाधिकार हनन के मामलों को खुलकर नहीं बता पा रहे हैं.”

इन निष्कर्षों के आधार पर रिपोर्ट में श्रीलंका सरकार से अनुरोध किया गया है कि इन अपराधों में शामिल लोगों के ख़िलाफ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के अनुरूप कार्रवाई की जाए.

रिपोर्ट में साथ ही बिना आरोप या मुकदमे के हिरासत में रखने के क़ानून पर पाबंदी लगाने, मानवाधिकार संगठनों को देश के उत्तरी इलाक़े में जाने की अनुमति देने और आपातकाल तथा आतंकवाद निरोधक क़ानूनों के तहत बिना आरोप के हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने की सिफारिश की गई है.

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