ब्रिटेन में भेदभाव झेलते लाखों दलित

हाउस ऑफ लॉर्ड्स
Image caption ब्रितानी संसद के ऊपरी सदन में उठी मांग

भारत में जाति आधारित भेदभाव एक बड़ी समस्या रही है लेकिन ब्रिटेन में भी दलित समुदाय के लाखों लोग ये भेदभाव झेलने को मजबूर हैं.

ब्रितानी संसद के ऊपरी सदन 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स' के सदस्यों ने जाति की बुनियाद पर भेदभाव को खत्म करने की मांग की है.

ब्रितानी सांसदों ने एंटरप्राइजेज एंड रेग्यूलेटरी रिफॉर्म बिल में एक संशोधन विधेयक का समर्थन किया है जिसका उद्देश्य नस्लीय भेदभाव से जुड़े कानूनों में जाति को जोड़ना है.

सरकार ने ये कहते हुए इस कदम का विरोध किया है कि उसने शैक्षिक कार्यक्रम को ही इस तरह तैयार किया है कि जातिगत भेदभाव से निपटा जा सके.

लेकिन ऊपरी सदन के सांसदों का कहना है कि सिर्फ इतना करना पर्याप्त नहीं है और इसके लिए कानूनों को बदलना होगा. हाउस ऑफ लॉर्ड्स में सरकार को इस मुद्दे पर हुए मतदान में 256 के मुकाबले 153 से हार का सामना करना पड़ा.

‘नस्ली पूर्वाग्रह’

जब जाति संबंधी भेदभाव से जुड़े बिल पर संसद में बहस हो रही थी तो बाहर दलित समुदाय से जुड़े 400 से ज्यादा लोग विरोध जता रहे थे.

बिल में संशोधन का प्रस्ताव करने वाले ऑक्सफर्ड लॉर्ड हैरिस ऑफ पेंट्रेगार्थ के बिशप ने बताया कि ब्रितानी दलित आबादी अब चार लाख 80 हजार के आंकड़े तक पहुंच गई है और इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि शिक्षा, रोजगार और सरकारी सुविधाओं और सेवाओं में उन्हें भेदभाव झेलना पड़ता है.

बिशप ने कहा कि ब्रिटेन में इस तरह के भेदभाव को रोकने का कोई कानूनी उपाय नहीं है.

इस संशोधित बिल के समर्थन में जोर शोर से बोलने वाले पूर्व कंजर्वेटिव मंत्री लॉर्ड डेबेन ने कहा, “आप नाम बदल कर उन्हें अछूत से दलित कह सकते हैं, लेकिन आप इस तथ्य को नहीं बदल सकते हैं कि लोगों को खास समुदाय में पैदा होने के कारण बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.”

सरकार की तरफ बैरोनेस स्टोवेल ने कहा, “ब्रिटेन में जाति आधारित पूर्वाग्रह और भेदभाव के कुछ मामले देखने को मिल रहे हैं. हम इस तरह के सभी पूर्वाग्रहों और भेदभाव को खत्म करना चाहते हैं. हम इस बारे में कानून का दरवाजा बंद नहीं कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि समानता और मानवाधिकार आयोग इस तरह के मामलों को देखेगा.

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