हमला जो जिस्म नहीं ज़हन भी छलनी कर देता है...

  • 8 मार्च 2013
Image caption भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में एसिड अटैक के बहुत हमले होते हैं

महिला दिवस के मौके पर औरतों की दशा और दिशा से जुड़े कई मसलों पर बहस होती आई है. लेकिन एक मुद्दा ऐसा भी है जो आमतौर पर हाशिए पर ही रहा है- महिलाओं पर तेज़ाब फेंके जाने का मुद्दा. कम ही होता है जब ऐसी घटनाएँ अख़बारों की सुर्खियों में हो या चैनलों की हेडलाइन बने.

तेज़ाब हमले के बाद ज़िंदा लाश हूँ: अनु की कहानी

कुछ दिन पहले ही विनोदिनी नाम की युवती ने चेन्नई में दम तोड़ दिया. उस पर एक व्यक्ति ने नंवबर में तेजा़ब डाल दिया था. तीन महीनों तक वो जख्मों से लड़ती रही लेकिन आखिरकर हार गई. कुछ जगह खबर छपी लेकिन कोई बड़ा हो हल्ला नहीं हुआ.

भारत समेत दक्षिण एशियाई देशों में ये बेहद गंभीर समस्या है. एसिड अटैक न सिर्फ किसी महिला के चेहरे को खराब कर देता है या उसकी आँखों की रोशनी छीन लेता है लेकिन उसे समाज में दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है. हो सकता है उसकी जान न जाए, पर ज़िंदगी बेहद बोझिल और दर्दनाक होकर रह जाती है.

जिस्म पर लगे घाव तो सबको दिखते हैं लेकिन ज़हन पर लगे घाव किसी को नज़र नहीं आते. आत्मनिर्भर और ज़िंदादिली से भरपूर एक औरत देखते ही देखते असहाय, दूसरों पर आश्रित महिला बन जाती है. विकृत चेहरे से समझौता कर पाना आसान नहीं होता.

इस पर कोई आधिकारिक आँकड़ें तो नहीं मिल पाए लेकिन भारत में भी पिछले एक दशक में तेज़ाब हमलों में वृद्धि हुई है. स्वयंसेवी संस्था एसिड सरवाइवल ट्रस्ट इंटरनेशनल ( एएसटीआई) के मुताबिक भारत में हर साल एसिड अटैक के करीब 500 मामले होते हैं.

जिस्म ही नहीं ज़हन भी छलनी

बीबीसी ने पिछले कुछ दिनों में तेज़ाब से हमलों का शिकार हुई कुछ महिलाओं से बात कर उनकी आपबीती जानने की कोशिश की है. जितनी भी पीडितों के बारे में पढ़ा या बात हुई सबका यही मानना है कि तेज़ाब से हुआ हमला जिस्म ही नहीं ज़हन को भी अंदर छलनी कर जाता है.

एसिड सर्वाइवर्स ट्रस्ट इंटरनेशनल के अनुसार दुनिया के करीब 23 देशों में हाल के वर्षों में एसिड हमलों की घटनाएँ हुईं. इनमें अमरीका, ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के भी नाम हैं. लेकिन ये इन देशों में दूसरी जगहों की अपेक्षा हमलों की संख्या बेहद कम है. महिलाओं पर एसिड हमलों की सबसे अधिक घटनाएँ भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश के अलावा कंबोडिया में दर्ज की गई हैं.

ईरान में 2004 में शादी के लिए मना करने पर 24 साल की अमेना पर एक लड़के ने तेज़ाब फेंक दिया था जबकि कंबोडिया में 23 की विवियाना पर एसिड अटैक में उनका चेहरा, हाथ और छाती जल गई थी. ऐसी और कितनी ही घटनाएँ हैं जो महज़ आँकड़ें बन कर रही गई हैं.

विशेषज्ञ इस जुर्म के लिए लचर कानून व्यवस्था को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.

आमतौर पर इन हमलों की शिकार महिलाएं होती हैं. घरेलू हिंसा, टूटा प्रेम संबंध जैसे कई मामलों में गाज महिला पर आकर गिरती है. कई मामलों में देखा जाता है कि दोषी ज़मानत पर रिहा हो जाते हैं और उनकी ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है. जबकि पीड़ित की ज़िंदगी वहीं की वहीं थम कर रह जाती है.

लेकिन इस सब के बावजूद भारत जैसे देशों में एसिड अटैक के मामले सुर्खियों से दूर और सरकारी निगाह से परे कहीं भटकते रहते हैं.

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