जिन जासूसों ने दुनिया को बेवकूफ बनाया

  • 18 मार्च 2013

बीबीसी को पता चला है कि इराक पर अमरीकी और ब्रितानी हमले से पहले ही उच्च पदस्थ सूत्रों ने कह दिया था कि सद्दाम हुसैन के पास व्यापक विनाश के हथियार नहीं हैं.

दरअसल इराक पर हमला दो इराकी जासूसों के झूठों के आधार पर किया गया था.

उनकी मनगढ़ंत जानकारी और झूठ उस खुफिया जानकारी का आधार थे जिनके आधार पर इराक पर हमला किया गया. और इस मामले ने अब तक की सबसे बड़ी खुफिया नाकामी को जन्म दिया.

हमले से छह महीने पहले तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने सद्दाम हुसैन के कथित व्यापक विनाश के हथियारों से होने वाले खतरों के प्रति चेताया था.

उन्होंने इस तरह के हथियारों के बारे में खुफिया जानकारी के हवाले से कहा था, “कार्यक्रम बंद नहीं हुआ है. ये अब भी चल रहा है.”

उसी दिन 24 सितंबर 2002 को ब्रितानी सरकार ने पूर्व इराकी नेता सद्दाम के व्यापक विनाश के हथियारों पर विवादास्पद डॉज़ियर प्रकाशित किया था.

आम लोगों के लिए जारी इस डोज़ियर की भूमिका खुद प्रधानमंत्री ब्येलर ने लिखी थी ताकि पाठकों को भरोसा दिलाया जा सके कि सद्दाम हुसैन ‘बेशक’ लगातार व्यापक विनाश के हथियार बना रहे हैं.

लेकिन डोज़ियर में इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं था कि हथियारों के बारे में कोई संदेह है.

किसने किया गुमराह

Image caption लॉर्ड बटलर को भी ऐसे सबूत नहीं मिले कि सद्दाम के पास व्यापक विनाश के हथियार थे

उस वक्त ब्रितानी प्रधानमंत्री कार्यालय ने जिस खुफिया जानकारी का इस्तेमाल किया वो मनगढ़ंत, मनचाही और झूठों पर आधारित थी.

जैसा कि उस वक्त ब्रितानी सेना के प्रमुख जनरल सर माइक जैक्सन ने कहा, “खुफिया नज़रिए से जो चीज़ उस वक्त सोना दिख रही थी वो मिट्टी निकली. ये सोना दिख रही थी लेकिन वो था नहीं.”

युद्ध के बाद व्यापक विनाश के हथियारों के सिलसिले में पहली सरकारी जांच का नेतृत्व करने वाले लॉर्ड बटलर ने कहा कि ब्लेयर और खुफिया समुदाय ने ‘खुद को गुमराह’ किया.

लॉर्ड बटलर और सर माइक इस बात पर सहमत हैं कि ब्लेयर ने झूठ नहीं बोला क्योंकि उन्हें विश्वास था कि सद्दाम हुसैन के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं.

दरअसल इराकी सरकार से अलग होकर पाला बदलने वाले इराकी जासूस रफीद अहमद अलवान अल जनाबी ने दुनिया को मूर्ख बनाया था.

जनाबी 1999 में एक जर्मन शरणार्थी केंद्र में पहुंचे और उन्होंने खुद को केमिकल इंजीनियर बताया और इसीलिए जर्मन खुफिया सेवा बीएनडी का उनकी तरफ ध्यान गया.

उन्होंने कहा कि उन्होंने ट्रकों पर बनी चलती फिरती बायोलॉजिकल प्रयोगशालाएं देखीं. उनके मुताबिक किसी को पता न चले, इसलिए इन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था.

झूठ और मनगढ़ंत बातें

जर्मनों को जनाबी की बातों पर शक था और उन्होंने इसके बारे में अमरीकियों और ब्रितानियों से बात की.

ब्रितानी खुफिया सेवा एमआई6 को भी संदेह हुआ और इसका जिक्र उन्होंने सीआईए को भेजे संदेश में भी किया था.

लेकिन ब्रितानी और अमरीकी अधिकारियों ने जनाबी की बातों पर विश्वास किया जबकि बाद में जनाबी ने खुद मनगढ़ंत बातें करने और झूठ बोलने की बात मानी.

इस मामले में एक और जासूस का नाम लिया जाता है जिसने दुनिया को मूर्ख बनाया. पूर्व इराकी खुफिया अधिकारी मेजर मोहम्मद हारिस ने कहा कि ये उन्हीं का विचार था कि बायोलॉजिकल प्रयोगशालाओं को ट्रकों पर स्थापित किया जाए. उन्होंने ये भी दावा किया कि उन्होंने ही इसके लिए सात रेनो ट्रकों का आदेश भी दिया.

वो जॉर्डन चले गए थे जहां उनकी अमरीकी अधिकारियों से बात हुई.

माना जाता है कि मोहम्मद हारिस ने ये कहानी इसलिए बनाई क्योंकि उन्हें नए आशियाने की तलाश थी. लेकिन उनकी खुफिया जानकारी को युद्ध शुरू होने से 10 महीने पहले ही खारिज कर दिया गया था.

नहीं थे हथियार

Image caption बिल मरे का कहना है कि इस मामले में 'बेहतरीन खुफिया जानकारी का उपयोग' नहीं हुआ.

लेकिन सारी खुफिया जानकारी गलत नहीं थी. सद्दाम हुसैन से जुड़े दो उच्च पदस्थ सूत्रों से मिली जानकारी सही थी.

दोनों ने कहा कि इराक व्यापक विनाश की गतिविधियों में शामिल नहीं है.

सीआईए का सूत्र इराक के विदेश मंत्री नाजी साबरी थे.

सीआईए के एजेंट बिल मरे एक अरब पत्रकार के जरिए साबरी से मिली. उस वक्त पैरिस में सीआईए का काम देख रहे मरे ने इस काम के लिए इस पत्रकार को दो लाख डॉलर की रकम कैश दी थी.

उन्होंने कहा कि नाजी साबरी की इस बात में बहुत दिलचस्पी दिखती है कि कोई उनसे बात करे.

मरे ने साबरी से पूछे जाने वाली सवालों की एक सूची तैयार की जिनमें व्यापक विनाश के हथियार सबसे ऊपर थे.

मरे बताते हैं कि खुफिया जानकारी ये मिली कि सद्दाम हुसैन के पास 1990 के दशक के बचे कुछ रासायनिक हथियार हैं जो उन्होंने अपने वफादार कबीलों को रखने के लिए दिए हुए हैं. वो व्यापक विनाश के रासायनिक, जैविक और परमाणु हथियार हासिल करने का इरादा रखते थे. लेकिन उस वक्त उनके पास ये थे नहीं.

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