इराक की दास्ताँ बयाँ करते मासूम लड़की के जख्म

मारवा शिमारी
Image caption मारवा ने हिम्मत नहीं हारी है पर उसे मुश्किलों भरा सफर तय करना है.

ये कहानी ऐसी लड़की की है जिसने 22 साल के जीवन में ही जिंदगी के कई मौसम देख लिए हैं. उसके जख्म इतने गहरे हैं कि पुरानी यादों की कश्मकश उसे आज भी बेचैन करती है.

एक तरह से ये कहानी केवल इराकी लड़की मारवा की ही नहीं, बल्कि ठीक दस साल पहले इराक पर हुए अमरीकी-ब्रितानी हमले की है.

मारवा शिमारी को अब यह याद नहीं आता कि कब उसने अपना बचपन खो दिया था.

उसे तो ये भी ठीक से याद नहीं कि पहली उसे कब एहसास हुआ कि उसके दाहिने पैर को उसके घुटने के बहुत ऊपर से अलग कर दिया गया है.

यह 10 साल पहले की बात है जब लहूलुहान इराक़ में अमरीकी फौज़ बगदाद की तरफ कूच कर रही थी.

उस रोज बगदाद के आसमान पर काले बादलों का घना साया था.

आसमां से कहर बरसा

धमाकों के शोर के बीच दहशत के माहौल में जी रहे शहरी घरों में जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे.

चारों ओर हो रही बमवर्षा और धमाकों की आवाजों से विचलित, बगदाद के बाहरी इलाके की बस्ती के एक अस्थायी मकान में रह रही मारवा ने तय किया शायद मकान से बाहर निकलना सुरक्षा की बेहतर गारंटी हो.

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बारह साल की मारवा अपनी छोटी बहन अदरा के साथ घर से बाहर निकली और दौड़ती चली गई. भागती हुई दोनों बहनों को दूर और पास फटते बमों के धमाकों, लड़ाकू विमानों की डरावनी आवाजों और विस्फोटों की चमक ने बुरी तरह डरा दिया.

दोनों बहने दौड़ती चली जा रही थीं जब एक धमाका हुआ. अदरा की तो इसमें जान चली गई लेकिन मारवा जिंदगी में दोबारा दौड़ने से हमेशा के लिए वंचित हो गईय

क्या हुआ हमले के दिन?

Image caption मारवा पर बम हमले के दिन ही कैम्पबेल भी घायल हुई थी.

जिस दिन मारवा की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई, उसी दिन बग़दाद के आसमां में घने बादलों के ऊपर कहीं अमरीकी वायु सेना की कैप्टन किम कैम्पबेल भी अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल जंग लड़ रही थीं.

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हालांकि कैप्टन किम की मुश्किलों का जमीन पर चल रही अमरीकी फौज की गतिविधियों से कोई सरोकार न था.

एक ओर जहां बगदाद के पश्चिम में स्थित एक सड़क पर अमरीकी अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर मरीन टुकड़ियां सद्दाम सिटी की तरफ से बगदाद के पूर्व से लगे कारोबारी इलाके की तरफ बढ़ रही थीं.

बगदाद की हिफाजत से जुड़े एक शख्स ने अमरीकी ताकत का जायजा लेने के बाद ये कहा था,“दियाला नदी में टैंकों को तैरते हुए देखने के बाद हम समझ गए थे कि ये जंग हम हार चुके हैं.”

‘ए-10 थंडरबोल्ट लड़ाकू विमान’

उस दिन बगदाद के आसमां में ‘ए-10 थंडरबोल्ट लड़ाकू विमान’ उड़ा रही कैम्पबेल के निशाने पर मारवा का घर नहीं था बल्कि बगदाद का दिल कहा जाने वाला सद्दाम हुसैन का महल था.

सद्दाम सिटी की तरफ से हुई इराक़ी सेना की जवाबी कार्रवाई में उसका लड़ाकू विमान क्षतिग्रस्त हो गया और वे खुद भी घायल हो गईं.

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चोट लगने के बावजूद वो 300 मील के फासले पर स्थित अपने एयरबेस तक सकुशल लौटने में कामयाब रहीं.

जंग के अपने कायदे होते हैं और कभी-कभी तो उसका कोई कायदा नहीं होता.

जंग दोनो लड़कियों ने देखी पर ये और बात है कि मारवा शिमारी कैप्टन किम कैम्पबेल की तरह खुशनसीब नहीं थी.

लंबे अरसे तक इराक़ की कहानी को अमरीकी सैन्य अधिपत्य को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जाता रहा है.

मारवा की नई लड़ाई

मारवा और उसकी बहन पर बम गिरने के बाद वे बेहोश हो गईं.

जब उन्हें होश आया तो वो अस्पताल में थीं. वो कहती हैं, “सच कहूं तो मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सिर्फ इतना कि मैं तकलीफ में थी और दर्द से कराह रही थी. मैं किसी भी चीज के बारे में ठीक से सोचने की स्थिति में नहीं थी. मैं दिन भर बस रोते हुए गुजार देती थी.”

कभी स्कूल में बेहद शरारती रही मारवा के लिए यह एक नई लड़ाई की शुरुआत थी.

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अस्पताल से घर और घर से अस्पताल, उसकी जिंदगी इन सबके बीच कहीं सिमट कर रह गई थी.

इराक़ में मारे गए आम लोगों के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन एक अनुमान के मुताबिक जिस हफ्ते मारवा घायल हुई थीं, उस दौरान दो हजार से ज्यादा इराक़ी मारे गए थे.

'मैंने सैकड़ों घायलों को देखा'

Image caption जवाहिरी अल सद्र अस्पताल के सबसे बड़े डॉक्टर हैं.

यह इराक़ का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि तेल की इतनी दौलत का मालिक होने के बावजूद, हमले के दौरान वहां स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली का यह आलम था कि उसके अस्पताल हताहतों की देख-रेख के लिए नाकाफी थे.

शहर के अल सद्र जनरल अस्पताल के सबसे बड़े डॉक्टर वियाम रशद अल जवाहिरी साल 2003 के काले दिनों को याद करते हुए कांपने लगते हैं और कहते हैं,“मुझे उस दौर की याद मत दिलाइए. ये बातें बहुत बेचैन करती हैं.”

जब डॉक्टर जवाहिरी से यह पूछा गया कि बम धमाकों और गोलियों से घायल होने वाले कितने लोगों का उन्होंने इलाज किया होगा तो उनका जवाब था, “मैं ये नहीं कहूंगा कि वे हजारों थे पर मैंने कई सौ लोगों को देखा था. एक नौजवान मेरे पास लाया गया था जिसके सीने पर गोली लगने से बना जख्म था.”

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अस्पताल में लाशों और मरणासन्न लोगों के बीच फर्क करने में मुश्किल आ रही थी और सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि कौन मदद के दायरे से बाहर निकल गया है और कौन नहीं.

साल 2003 के बाद सबा कुसौर

मारवा जिस बस्ती में रहती थीं - सबा कुसौर - वहाँ साल 2003 में हुई बमबारी के बाद से शायद ही कभी किसी गांववासी ने किसी अमरीकी को देखा होगा.

जब कुछ महीनों के बाद वहां अमरीकी फौज पहुंची तो गांव वाले आशंकित हो गए. सैनिकों को मारवा शिमारी के घर में तलाशी के दौरान कुछ नहीं मिला था.

फौजियों के आने से मारवा तब सहम गई थी. उसने देखा कि उसकी मां भी सहम कर घर से बाहर की ओर दौड़ गई थी.

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अतीत के उस मंजर को याद करते हुए मारवा कहती है, “जब कोई पहली बार अपनी मां को डरा हुआ देखता है तो वह उसके बचपन का सबसे डरावना लम्हा होता है.”

मारवा का हाल

अल सद्र अस्पताल में मारवा के लिए निराशा, मायूसी और अंधेरे के अलावा कुछ न था.

उसके पिता इराक़ में अमरीकियों के पहुंचने से दो साल पहले गुजर गए थे और मां डायबिटीज की मरीज थी.

मां की बिगड़ती तबियत के बीच मारवा के भाई-बहन इतने छोटे थे कि उनसे समझदारी की उम्मीद करना बेमानी था.

इन हालात में मारवा इस कदर अकेली पड़ गई कि उसे दिलासा देने तक के लिए कोई न था.

लेकिन तभी अचानक इस बुरे दौर में मारवा के पास मदद पहुंच गई. यूरोप की राहत संस्थाएँ बाहर इलाज के लिए जाने में लाचार लोगों के पास मदद लेकर आईं.

जर्गन तोडेनहोफर की कोशिश

कई यूरोपीय लोगों की तरह जर्गन तोडेनहोफर भी इराक़ की लड़ाई के विरोधी थे.

इराक़ की कई यात्राएं और अमरीकी विदेश नीति के नतीजों पर किताबें लिखने से पहले जर्गन तोडेनहोफर जर्मनी की संसद के 18 सालों तक सदस्य रह चुके थे.

जर्गन को मारवा के बारे में बच्चों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ से पता चला.

मारवा के बारे में जर्गन कहते हैं, “मारवा इस लड़ाई की प्रतीक बन गई हैं. जिन लोगों ने यह लड़ाई शुरू की थी, उनके लिए भले ही यह खत्म हो गई हो लेकिन मारवा की जंग जारी रहेगी.”

इलाज के लिए जर्मनी भेजा

साल 2004 या शायद 2005 में तोडेनहोफर ने मारवा और उसकी मां को जर्मनी भेजा.

तोडेनहोफर मारवा की मदद के मसले पर यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने पांच लाख रुपए की लागत से शिमारी परिवार के लिए एक घर भी खरीद दिया.

उन्होंने मारवा के परिवार को एक दुकान खोलने में भी मदद की.

पर मरने के ठीक पहले मारवा की मां ने अपने पुराने घर की मरम्मत के लिए नया घर बेच दिया.

'बच्ची का पैर लौट पाएँगे ब्लेयर, बुश?'

काफी दौड़भाग और इलाज के बाद पहले जर्मनी और फिर अमरीका के डॉक्टर मारवा की हालत में सुधार ला पाए.

आधुनिक यूरोप में किसी लड़की का अपने पैरों पर खड़ा होना भले ही सुनने में अच्छा लगे पर मारवा की बस्ती सबा कुसौर के रूढ़ीवादी शिया समाज में इसे अच्छी नजर से नहीं देखा गया.

इराक़ युद्ध में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टॉनी ब्लेयर की भूमिका की तोडेनहोफफर तीखी आलोचना करते हैं.

वे कहते हैं, “वे अब बेहतरीन जिंदगी जी रहे हैं. बुश पेटिंग करते हैं, किताब लिख रहे हैं. ब्लेयर मध्य-पूर्व में शांति दूत की भूमिका निभा रहे हैं. और तब मारवा पर नजर जाती है. उसके लिए यह एक अंतहीन सिलसिला है. आप उस नन्ही बच्ची को उसका पैर कभी वापस नहीं कर सकते. उसे कोई नहीं अपनाएगा. और उसका कभी अपना घर नहीं बस पाएगा. यह अपराध है.”

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