फीकी रही मुशर्रफ की वतन वापसी

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Image caption जनरल मुशर्रफ ने अपनी ये तस्वीर ट्वीट की जिसमें वो कराची पहुँचने वाले जहाज़ की खिड़की से बाहर देख रहे हैं

लगभग चार साल के स्वनिर्वासन के बाद स्वदेश लौटे पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा है कि वो किसी भी तरह की राजनीतिक, कानूनी और सुरक्षा चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक मुशर्रफ़ ने दुबई से कराची यात्रा के दौरान विमान में संवाददाताओं से कहा कि ये उनके लिए भावनात्मक क्षण है क्योंकि वो चार साल बाद वतन लौट रहे हैं.

परंपरागत सलवार कमीज पहने मुशर्रफ़ ने कहा, “मेरे सामने कई चुनौतियां हैं. सुरक्षा चुनौतियां हैं, कानूनी चुनौतियां है और राजनीतिक चुनौतियां हैं. लेकिन मैं इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हूं.”

मुशर्रफ़ एमिरेट्स की उड़ान से दुबई से कराची पहुंचे ताकि इसी साल मई में होने वाले आम चुनावों में हिस्सा ले सकें.

मुशर्रफ़ ने सत्ता से हटने के बाद 2008 में ही पाकिस्तान छोड़ दिया था और तब से लंदन में स्वनिर्वासन की ज़िंदगी बिता रहे थे.

पाकिस्तान में हत्या के दो मामलों में उनके ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी के वारंट जारी किए जा चुके हैं. साथ ही चुनावी राजनीति में उन्हें कोई ख़ास कामयाबी न मिलने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं.

ऐसे में हर कोई यही सवाल पूछ रहा है कि वो फिर क्यों पाकिस्तान आए हैं.

मुशर्रफ़ को दो हफ्तों की अग्रिम ज़मानत मिल गई है और इसीलिए उनकी वतन वापसी मुमकिन हुई है.

दरअसल मुशर्रफ़ की वापसी के लिए ये अच्छा मौक़ा है. वो अपने ऊपर लगे आरोपों से बेदाग़ होकर निकलना चाहते हैं.

ख़तरों भरा रास्ता

Image caption नवाज शरीफ की पीएमएल (एन) पार्टी मुशर्रफ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करती रही है

दरअसल मुशर्रफ़ उस रास्ते पर लौट रहे हैं जो ख़तरों से भरा हुआ है.

उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो और बलोच नेता अकबर ख़ान बुगती की हत्या के मामलों में अदालत में पेश होना है.

इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर 2007 में हुई कार्रवाई के सिलसिले में भी उनकी अदालत में पेशी होनी है.

यही नहीं, 2007 में पूरी न्यायपालिका को बर्खास्त करने के मामले में उन्हें राजद्रोह के आरोपों का सामना करना पड़ सकता है.

वो तालिबान के निशाने पर भी है और जिस शहर कराची में रविवार को उनका विमान उतरा, वहां तालिबान का ख़ासा दबदबा है.

बहुत से लोग मानते हैं कि इन हालात में उनका पाकिस्तान आना एक बड़ा जुआ है.

माना जाता है कि पाकिस्तान लौटने से पहले मुशर्रफ़ ने अपने वकीलों, राजनीतिक सहयोगियों और पूर्व सैन्य अफ़सरों से तमाम हालात पर चर्चा की है.

नहीं कहलाएंगे भगोड़े

लगता है कि उनका न्यूनतम लक्ष्य गिरफ़्तारी से बचना और संसद की एक सीट जीतना है.

उनके समर्थक भी ये मान कर चल रहे हैं कि पाकिस्तानी व्यवस्था में दबदबा रखने वाली सेना अपने पूर्व प्रमुख को अदालत के चक्कर नहीं काटने देगी.

Image caption युवाओं में मुशर्रफ का कुछ हद तक समर्थन माना जाता है

माना जाता है कि मुशर्रफ़ को कराची जैसे शहरी क्षेत्र के उन युवा उद्यमियों और पेशेवर लोगों के बीच समर्थन प्राप्त है, जिन्हें उनके शासनकाल में फ़ायदा हुआ था.

जनवरी 2012 में जब उन्होंने दुबई से वीडियो लिंक के ज़रिए कराची में एक रैली की तो उन्हें सुनने के लिए बहुत से लोग उमड़े थे.

विश्लेषक मान रहे हैं कि एमक्यूएम जैसे राजनीतिक साझीदारी के बूते वे इस समर्थन के ज़रिए संसद की एक सीट भी जीत सकते हैं. बताया जाता है कि वो कुछ और भी राजनीतिक समीकरण बिठा रहे हैं, हालांकि इनके बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं है.

वैसे भले ही मुशर्रफ़ के साथ कुछ भी क्यों न हो, लेकिन इतना तो तय है कि इतिहास में उनका नाम एक भगोड़े के तौर पर दर्ज नहीं होगा.

न्यायिक संकट

हालांकि पाकिस्तान के लोगों के पास 1999 से 2008 तक मुशर्रफ़ के शासनकाल की बहुत कम अच्छी यादें हैं.

लोकतंत्र समर्थक समूहों ने 1999 में हुए उस तख्तापलट का विरोध किया था जिसकी बुनियाद पर वो सत्ता में आए थे.

बाद में वो अमरीका के नेतृत्व में "आतंकवाद विरोधी युद्ध" में शामिल हो गए, जो पाकिस्तान में बहुत अलोकप्रिय रहा.

लेकिन असली संकट की शुरुआत हुई मार्च 2007 में जब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ्तिख़ार चौधरी को बर्खास्त कर दिया गया. इसके विरोध में पूरे पाकिस्तान में वकील और नागरिक अधिकार समूह सड़कों पर निकल आए.

जुलाई 2007 में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर सैन्य कार्रवाई का हुक्म देने के फ़ैसले पर भी भारी विवाद हुआ. इसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए जिनमें ज्यादातर उस मदरसे में पढ़ने वाले छात्र थे.

Image caption मुशर्रफ 1999 में नवाज शरीफ की सरकार का तख्ता पलट कर सत्ता में आए थे

इससे पहले इस मस्जिद के मौलवियों ने इस्लामाबाद में म्यूजिक स्टोर्स, मसाज पार्लर और वेश्यालयों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया.

हालांकि ज्यादातर लोगों ने लाल मस्जिद पर हुई कार्रवाई का समर्थन किया लेकिन इसमें भारी संख्या में लोगों की मौत के कारण कुछ धार्मिक और चरमपंथी संगठन सरकार के ख़िलाफ़ एकजुट हो गए, जिसका नतीजा था तहरीके तालिबान या पाकिस्तानी तालिबान.

उसी साल दिसंबर में पाकिस्तान की सबसे ताक़तवर राजनेताओं में से एक बेनज़ीर भुट्टो एक हमले में मारी गईं.

2010 में संयुक्त राष्ट्र की एक जांच में मुशर्रफ़ पर आरोप लगा कि वो बेनज़ीर भुट्टो को उचित सुरक्षा देने में नाकाम रहे.

इससे पहले कि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ महाभियोग का मामला चलाती, उससे पहले उन्होंने अगस्त 2008 में राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

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