'कविता' ने किया आजा़द, आसमां छूने चली सलमा

  • 7 अप्रैल 2013
Image caption सलमा की सगाई की तस्वीर, उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ 11 साल की उम्र में उसकी सगाई हो गई थी

लंदन की डॉ्क्यूमेंट्री फ़िल्म निर्देशक किम लॉंजिनौटो असामान्य और अक्सर पीड़ित महिलाओं की ज़िंदगी को सामने लाती हैं. लेकिन एक भारतीय लड़की की कहानी ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वो न चाहते हुए भी इस पर फ़िल्म बनाने पर मजबूर हो गईं.

लॉजिनौटो बताती हैं कि दक्षिण भारत में 13 साल की एक लड़की को घर में कैद कर दिया गया. उसका कसूर सिर्फ़ इतना था कि वह मुस्लिम समाज में पैदा हुई थीं, जिसमें रिवाज था कि तरुणाई में पहुंचते ही युवतियों के घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी जाती है. यहां तक कि स्कूल भी नहीं जाने दिया जाता.

शब्दों का सहारा

तो अगले 25 साल तक बस शब्दों ने ही इस लड़की को सहारा दिया. वो तब तक छुप कर कविताएं लिखती रहीं, जब तक उन्हें किसी तरह बाहर नहीं पहुंचा पाईं और छद्मनाम सलमा के साथ वो छप गईं. इससे आखिर उसकी आवाज़ आजा़द हो गई.

लॉजिनौटो ने उस पर सलमा नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई है.

वो कहती हैं, “मैं ये कहानी बताने को बेताब थी क्योंकि दुनिया भर में लाखों लड़कियों को यह झेलना पड़ रहा है लेकिन कोई इसके बारे में बात नहीं करता.”

सलमा रात को टॉयलेट में कैलेंडर के टुकड़ों के पीछे छंद लिखा करतीं और फिर तौलिए के डिब्बे में अपनी कलम छुपा दिया करतीं.

वो बहुत मुश्किल से काग़ज़ के इन टुकड़ों को बाहर पहुंचा पातीं. आखिरकार एक दिन उनकी मां ने ये कविताएं एक प्रकाशक को भेजीं और वो छप गईं.

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नेल्सन मंडेला जैसी हीरो

लॉजिनौटो को सलमा की कहानी नेल्सन मंडेला से मिलती हुई लगी. रॉबैन द्वीप में कैद के दौरान उन्होंने भी अपनी आत्मकथा टॉयलेट पेपर के टुकड़ों में लिखकर बाहर पहुंचाई थी.

किम कहती हैं, “सलमा ने भी ठीक यही किया. लाखों लोग नेल्सन मंडेला की रिहाई के लिए कोशिश कर रहे थे लेकिन सलमा के बारे में कोई नहीं जानता था.”

वो कहती हैं, “मुझे लगता है कि वो नेल्सन मंडेला की तरह ही एक हीरो है. वो लाखों में एक हैं.”

एक जानी-पहचानी कवि होने के साथ ही सलमा अपने गांव की प्रधान भी बन गईं. उनके पति ने उन्हें प्रोत्साहित किया.

लॉजिनौटो के अनुसार, “उनके परिवार ने अवश्यंभावी के आगे सर झुका दिया. वो समझ गए थे कि अब वो उन्हें रोक नहीं सकते.”

सलमा मंत्री बन गईं तो उनके पति ने ग्राम प्रधान की ज़िम्मेदारी संभाल ली. अब क्योंकि उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई है तो सलमा अपना ज़्यायादर समय कविता और लघु कथाएं लिखने में लगा रही हैं.

ये डॉक्यूमेंट्री लंदन के ह्यूमन राइट्स वॉच फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाई गई और बहुत पसंद की गई. ‘सलमा’ जून में होने वाले शेफ़ील्ड फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी दिखाई जाएगी और ब्रिटेन भर में इसे प्रदर्शित किया जाएगा.

क्योंकि इसके अधिकार चैनल 4 के पास हैं इसलिए अगले साल इसे चैनल पर भी दिखाया जाएगा.

सबसे डरावना अनुभव

Image caption किम लॉजिनौटो

बीबीसी से बात करते हुए लॉजिनौटो कहती हैं कि दबी-कुचली महिलाओं के लिए काम करने से कई बार नैतिक दुविधा भी सामने आती है.

वो कहती हैं कि केन्या में महिलाओं के गुप्तागों के ऑपरेशन (एफ़जीएम) पर डॉक्यूमेंट्री बनाने के दौरान उन्हें ऐसी ही दुविधा से गुज़रना पड़ा.

किम के अनुसार वो फारढोसा मोहमद नाम की डॉक्टर के साथ सीन शूट कर रही थीं. फारढोसा दस साल से अपनी संस्कृति के विरुद्ध जाकर एफ़जीएम के खिलाफ़ बोल रही थीं.

लेकिन वो इस सीन को शूट करवाने पर अडिग थीं. उन्होंने कहा कि अगर कैमरा टीम मौजूद रहेगी तो बच्चियों का ऑपरेशन अधिकतम सफ़ाई के साथ किया जाएगा.

किम कहती हैं, “मैं जानती हूं कि अगर वो (डॉक्टर फारढोसा) वहां नहीं होती तो कई बच्चियों की तो खून बहने से मौत ही हो जाती.”

लेकिन फिर भी यह बहुत डरावना अनुभव था, किन के शब्दों में, “लेकिन जब यह ऑपरेशन हो रहा था तो लड़की बुरी तरह चीख रही थी, वह दरअसल मेरे पैर पर ही लटकी हुई थी.”

लॉजिनौटो कहती हैं, “मुझे बहुत ख़राब लग रहा था. मैं एक राक्षसी सा महसूस कर रही थी. मैं इसे रोकना चाहती थी लेकिन मैंने ऐसा किया नहीं, मैंने वो सीन शूट किया.”

वो कहती हैं कि मैं कभी भी उस दृश्य को शूट करने के बारे में सहज नहीं हो पाऊंगी.

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